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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: आज़ादी के बाद का सबसे रणनीतिक प्रोजेक्ट, 'विकसित भारत 2047' को मिलेगा बल — लेफ्टिनेंट जनरल सी.ए. कृष्णन

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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: आज़ादी के बाद का सबसे रणनीतिक प्रोजेक्ट, 'विकसित भारत 2047' को मिलेगा बल — लेफ्टिनेंट जनरल सी.ए. कृष्णन

सारांश

लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सी.ए. कृष्णन का दावा है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट आज़ादी के बाद का सबसे रणनीतिक प्रोजेक्ट हो सकता है — मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी किनारे पर स्थित यह द्वीप भारत के 75% ट्रांसशिपमेंट को स्वदेशी बना सकता है और 2047 तक विकसित भारत के सपने को समुद्री ताकत से जोड़ सकता है।

मुख्य बातें

लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सी.ए.
कृष्णन ने 3 मई 2026 को राष्ट्र प्रेस से बातचीत में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को भारत के आज़ादी के बाद के इतिहास का सबसे रणनीतिक प्रोजेक्ट बताया।
ग्रेट निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी किनारे पर इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह से मात्र लगभग 180 किमी की दूरी पर स्थित है।
भारत का लगभग 75 प्रतिशत ट्रांसशिपमेंट अभी कोलंबो और सिंगापुर के रास्ते होता है, जिसे यह परियोजना स्वदेशी बना सकती है।
परियोजना में एक मज़बूत नौसैनिक अड्डा और ग्रीनफील्ड एयरबेस शामिल हैं, जो समुद्री निगरानी क्षमता को बेहतर बनाएंगे।
कृष्णन ने पर्यावरण विरोधियों से परियोजना का विरोध न कर पर्यावरण मंजूरी शर्तों के सख्त पालन पर ध्यान देने की अपील की।
'शोम्पेन' और 'निकोबारी' जनजातियों की सुरक्षा परियोजना के नियोजन ढाँचे का हिस्सा बताई गई।

लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सी.ए. कृष्णन ने 3 मई 2026 को बेंगलुरु में राष्ट्र प्रेस से विशेष बातचीत में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को भारत के रणनीतिक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यह परियोजना देश को समुद्री क्षेत्र में निर्णायक उपस्थिति दिलाएगी और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को मज़बूती प्रदान करेगी।

मलक्का जलडमरूमध्य और भारत की रणनीतिक स्थिति

लेफ्टिनेंट जनरल कृष्णन ने कहा, "यह प्रोजेक्ट भारत के लिए बहुत ज़्यादा रणनीतिक महत्व रखता है। इसके महत्व को समझने के लिए हमें मलक्का जलडमरूमध्य की भूमिका को भी समझना होगा।" उन्होंने बताया कि यह जलडमरूमध्य हिंद महासागर को प्रशांत महासागर और दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है, जिससे यह चीन से लेकर दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व, यूरोप और अमेरिका तक के वैश्विक समुद्री व्यापार का एक अहम मार्ग बन जाता है।

उन्होंने बताया कि ग्रेट निकोबार द्वीप इस मार्ग के पश्चिमी किनारे पर स्थित है, जो इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह से मात्र लगभग 180 किमी की दूरी पर है। यह निकटता वैश्विक व्यापार के एक बड़े हिस्से को इन तटों के बेहद करीब से गुज़रने पर मजबूर करती है, जो इस द्वीप के रणनीतिक महत्व को और उजागर करती है।

आर्थिक और सैन्य लाभों का पैकेज

कृष्णन ने कहा, "यह एक रणनीतिक लाभों का पैकेज है, जो हमें वरदान के रूप में मिला है। यह दशकों से हमारे पास मौजूद है, लेकिन इसका ज़्यादातर इस्तेमाल नहीं हो पाया है।" उन्होंने बताया कि भारत का लगभग 75 प्रतिशत ट्रांसशिपमेंट अभी कोलंबो और सिंगापुर के रास्ते होता है। यदि यह परियोजना योजना के अनुसार विकसित होती है, तो इसका एक बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही संभाला जा सकता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह परियोजना एक मज़बूत नौसैनिक अड्डा और एक ग्रीनफील्ड एयरबेस प्रदान करेगी, जिससे भारत की समुद्री उपस्थिति और सुदृढ़ होगी। "2047 तक, जब भारत एक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है, तो हमारे पास पर्याप्त रणनीतिक प्रभाव होना चाहिए — यह आक्रामकता के बारे में नहीं है, बल्कि ऐसी क्षमता रखने के बारे में है जिससे हमारे प्रभाव का सम्मान हो," उन्होंने कहा।

मलक्का संकट की स्थिति और वैकल्पिक मार्ग

एक काल्पनिक परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए कृष्णन ने कहा कि अगर मलक्का जलडमरूमध्य में कोई बाधा आ जाए, तो यह दुनिया के लिए विनाशकारी होगा, क्योंकि सुंडा जलडमरूमध्य या लोम्बोक जलडमरूमध्य जैसे वैकल्पिक मार्ग क्षमता में इसके बराबर नहीं हैं और इनसे कई दिनों की देरी व लॉजिस्टिक बाधाएँ पैदा होंगी। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि निकट भविष्य में ऐसी स्थिति की संभावना कम है, क्योंकि सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच कोई सैन्य या वैचारिक प्रतिद्वंद्विता नहीं है।

उन्होंने बताया कि मलक्का क्षेत्र की स्थिति होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे अन्य रणनीतिक चोक पॉइंट्स की तुलना में अपेक्षाकृत स्थिर है, और एकमात्र अप्रत्याशित जोखिम व्यापक वैश्विक तनावों से उत्पन्न हो सकता है।

निगरानी क्षमता और रणनीतिक जागरूकता

कृष्णन ने बताया कि आज जहाज़ — जिनमें पनडुब्बियाँ और सर्वेक्षण जहाज़ भी शामिल हैं — मलक्का जलडमरूमध्य से होते हुए बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर में प्रवेश कर सकते हैं, और भारत की तरफ से उन पर निगरानी सीमित है। ग्रेट निकोबार के बुनियादी ढाँचे के साथ, भारत को ऐसी गतिविधियों की कहीं ज़्यादा बेहतर जानकारी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारत पूरी तरह कानूनी ढाँचे के भीतर काम करेगा।

उन्होंने भौगोलिक महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि ग्रेट निकोबार सुमात्रा से लगभग 180–190 किमी, फुकेत से लगभग 500 किमी, पेनांग से 700 किमी और सिंगापुर से लगभग 1,250 किमी की दूरी पर है। इसके विपरीत, यह चेन्नई से लगभग 1,600 किमी और कोलकाता से 2,000 किमी दूर है, जो इसके रणनीतिक झुकाव को स्पष्ट करता है।

विरोध, पर्यावरण और जनजातीय समुदाय

लेफ्टिनेंट जनरल कृष्णन ने परियोजना के विरोध पर कहा कि पर्यावरण को लेकर चिंतित लोगों के लिए बेहतर तरीका यह है कि वे परियोजना का विरोध न करें, बल्कि यह सुनिश्चित करें कि पर्यावरण मंजूरी में रखी गई सभी शर्तों का सख्ती से पालन हो। उन्होंने यह भी कहा कि हमें सतर्क रहना चाहिए और जाँचना चाहिए कि क्या कोई गतिविधि बाहरी फंडिंग या निर्देशों से प्रभावित हो रही है, चाहे वह कार्यकर्ताओं, एनजीओ या राजनीतिक संस्थाओं के माध्यम से हो।

उन्होंने बताया कि ग्रेट निकोबार में 'शोम्पेन' और 'निकोबारी' जनजातियों सहित मूल निवासियों की आबादी कम है, और परियोजना क्षेत्र के भीतर केवल कुछ विशिष्ट बसावट वाले इलाके ही आते हैं। इन समुदायों की सुरक्षा परियोजना की शर्तों और नियोजन ढाँचे का हिस्सा है।

कृष्णन ने अंत में कहा, "ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को तो आना ही है — मेरी राय में, यह भारत के आज़ादी के बाद के इतिहास में सबसे ज़्यादा रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में से एक हो सकता है।" यह परियोजना भारत को न केवल एक मज़बूत समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करेगी, बल्कि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक गंभीर दावा है जिसे साक्ष्य के बिना स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। यह सच है कि ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति असाधारण रणनीतिक मूल्य रखती है और 75% ट्रांसशिपमेंट का विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना भारत की आर्थिक संप्रभुता के लिए चिंताजनक है। लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या सरकार 'शोम्पेन' जैसी विशेष रूप से संवेदनशील जनजातियों की सुरक्षा और पर्यावरण शर्तों का पालन कागज़ों से आगे ज़मीन पर सुनिश्चित कर पाती है — क्योंकि अतीत में ऐसी बड़ी परियोजनाओं में यही सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हुई है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसमें ग्रेट निकोबार द्वीप पर एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, नौसैनिक अड्डा, ग्रीनफील्ड एयरबेस और टाउनशिप विकसित करने की योजना है। यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी किनारे पर स्थित है, जो इसे वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत के लिए रणनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सी.ए. कृष्णन के अनुसार, यह द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी किनारे पर इंडोनेशिया के सबांग बंदरगाह से मात्र लगभग 180 किमी दूर है, जिससे वैश्विक समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा इसके करीब से गुज़रता है। यह परियोजना भारत की समुद्री निगरानी क्षमता को बेहतर बनाएगी और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को बल देगी।
भारत का 75% ट्रांसशिपमेंट विदेशी बंदरगाहों से क्यों होता है और ग्रेट निकोबार इसे कैसे बदलेगा?
कृष्णन के अनुसार, भारत का लगभग 75 प्रतिशत ट्रांसशिपमेंट अभी कोलंबो और सिंगापुर के रास्ते होता है क्योंकि देश के पास इस क्षेत्र में उपयुक्त गहरे पानी का बंदरगाह नहीं है। ग्रेट निकोबार पर प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट इस निर्भरता को कम कर सकता है और वैश्विक शिपिंग ट्रैफिक को भी आकर्षित कर सकता है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का पर्यावरण और जनजातियों पर क्या असर होगा?
कृष्णन ने कहा कि परियोजना क्षेत्र में 'शोम्पेन' और 'निकोबारी' जनजातियों सहित मूल निवासियों की आबादी कम है और उनकी सुरक्षा परियोजना के नियोजन ढाँचे का हिस्सा है। उन्होंने पर्यावरण चिंताओं पर कहा कि विरोध के बजाय पर्यावरण मंजूरी में रखी गई शर्तों के सख्त पालन पर ध्यान देना चाहिए।
क्या मलक्का जलडमरूमध्य बंद होने का खतरा है?
कृष्णन के अनुसार निकट भविष्य में ऐसी स्थिति की संभावना कम है, क्योंकि सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच कोई सैन्य या वैचारिक प्रतिद्वंद्विता नहीं है। हालाँकि उन्होंने कहा कि व्यापक वैश्विक तनावों से उत्पन्न जोखिम को नकारा नहीं जा सकता, और मलक्का की स्थिति होर्मुज़ जलडमरूमध्य की तुलना में अपेक्षाकृत स्थिर है।
राष्ट्र प्रेस
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