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असम चुनाव 2026: हिमंत बिस्वा सरमा का लक्ष्य — भाजपा को अकेले दम पर पूर्ण बहुमत दिलाना

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असम चुनाव 2026: हिमंत बिस्वा सरमा का लक्ष्य — भाजपा को अकेले दम पर पूर्ण बहुमत दिलाना

सारांश

हिमंत बिस्वा सरमा के लिए यह चुनाव महज जीत का नहीं, बल्कि भाजपा को असम में पहली बार अकेले दम पर पूर्ण बहुमत दिलाने का है। 2016 और 2021 — दोनों बार 60 सीटों पर अटकी भाजपा को इस बार सरमा उस मनोवैज्ञानिक दीवार को तोड़ना चाहते हैं जो सहयोगियों पर निर्भरता खत्म करे।

मुख्य बातें

हिमंत बिस्वा सरमा का लक्ष्य भाजपा को 126 सदस्यीय असम विधानसभा में अकेले पूर्ण बहुमत दिलाना है।
2016 और 2021 — दोनों चुनावों में BJP ने 60 सीटें जीतीं, लेकिन बहुमत के लिए सहयोगियों पर निर्भर रही।
2016 में BJP का वोट शेयर 29.51% ; 2021 में बढ़कर 33.21% हुआ।
सरमा मई 2021 में मुख्यमंत्री बने और NEDA के तहत सात पूर्वोत्तर राज्यों में BJP का नेतृत्व किया।
2011 जनगणना के अनुसार असम में 61.50% हिंदू और 34.22% मुसलमान; घुसपैठ का मुद्दा चुनावी केंद्र में रहा।
मुख्यमंत्री बदलाव की रिपोर्टों को अब तक BJP शीर्ष नेतृत्व ने आधिकारिक रूप से नकारा नहीं, लेकिन पुष्टि भी नहीं की।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के लिए आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजे महज जीत-हार का मामला नहीं हैं — उनका असली लक्ष्य भारतीय जनता पार्टी (BJP) को 126 सदस्यीय असम विधानसभा में बिना किसी सहयोगी के पूर्ण बहुमत दिलाना है। यानी 60 सीटों की वह मनोवैज्ञानिक सीमा तोड़ना, जो पार्टी पिछले दो चुनावों में पार नहीं कर पाई।

पिछले चुनावों का इतिहास

2016 में जब BJP पहली बार असम में सत्ता में आई, तो उसने अपने दो प्रमुख सहयोगियों — असम गण परिषद (AGP) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) — के समर्थन से सरकार बनाई। उस चुनाव में BJP ने 89 सीटों पर चुनाव लड़ा और 60 सीटें जीतीं, जबकि उसका वोट शेयर लगभग 29.51 प्रतिशत रहा — यह उसकी पहले जीती गई मात्र पाँच सीटों की तुलना में ऐतिहासिक उछाल था।

AGP ने 30 सीटों पर चुनाव लड़कर 14 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 8.14 प्रतिशत रहा। BPF ने 13 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और लगभग सभी सीटें जीत लीं। उधर, कांग्रेस ने 122 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन वह सिमटकर 26 सीटों पर आ गई और उसका वोट शेयर 30.96 प्रतिशत रहा।

2021 में भी 60 की दीवार बरकरार

2021 के विधानसभा चुनाव में BJP ने फिर से 60 सीटें जीतीं — बहुमत से ठीक एक कदम पीछे। हालाँकि इस बार उसका वोट शेयर बढ़कर 33.21 प्रतिशत हो गया। AGP ने 29 सीटों में से केवल नौ जीतीं। वहीं, यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) — जो 2016 में कांग्रेस के साथ गठबंधन में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी — ने इस बार BJP के साथ मिलकर छह सीटें जीतीं।

गौरतलब है कि BJP के पहले असम मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को बाद में केंद्र में बुलाकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, और मई 2021 में हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री बने।

सरमा का राजनीतिक सफर और विचारधारा में बदलाव

सरमा असम कांग्रेस के भीतर एक प्रभावशाली रणनीतिकार के रूप में उभरे थे। 2015 में उन्होंने दो मुख्य कारणों का हवाला देते हुए कांग्रेस छोड़ी — पहला, पार्टी में 'परिवार-केंद्रित' नेतृत्व को लेकर विवाद, और दूसरा, उनका यह आरोप कि कांग्रेस ने असमिया पहचान और क्षेत्रीय हितों को उचित प्राथमिकता नहीं दी।

सरमा ने दावा किया है कि उस समय असम कांग्रेस के अधिकांश विधायक उन्हें ही तरुण गोगोई के बाद अगला मुख्यमंत्री देखना चाहते थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने परिवार-केंद्रित उत्तराधिकार को प्राथमिकता दी। BJP में आने के बाद वह पूर्वोत्तर में पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक बन गए और उन्होंने नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) का सात पूर्वोत्तर राज्यों में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।

घुसपैठ का मुद्दा और सामाजिक ध्रुवीकरण

सरमा ने बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को एक बड़ी सामाजिक चिंता के रूप में प्रमुखता से उठाया है, जिससे स्थानीय और बंगाली-भाषी मुसलमानों के बीच तनाव की खबरें आती रही हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में 61.50 प्रतिशत हिंदू और 34.22 प्रतिशत मुसलमान हैं। कुछ वर्गों का दावा है कि मुस्लिम आबादी का अनुपात तब से काफी बढ़ गया है, हालाँकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

सरमा ने मुसलमानों को 'मियां' कहकर संबोधित किया है — एक शब्द जो आम तौर पर सम्मानजनक उपाधि माना जाता है, लेकिन जिसके राजनीतिक संदर्भ पर आलोचकों ने सवाल उठाए हैं। ध्रुवीकरण के आरोपों के बावजूद, उन्होंने सार्वजनिक रूप से

संपादकीय दृष्टिकोण

तो वह खुद को BJP के भीतर एक राष्ट्रीय स्तर के नेता के रूप में स्थापित कर लेंगे। लेकिन असम की जटिल जनसांख्यिकी और गठबंधन की राजनीति को देखते हुए, केवल वोट शेयर बढ़ाना काफी नहीं होगा — सीटों में सीधा रूपांतरण ज़रूरी है। घुसपैठ और पहचान के मुद्दों पर उनकी आक्रामक राजनीति ने समर्थन तो जुटाया है, लेकिन इसने असम के भीतर सामाजिक विभाजन को भी गहरा किया है — जो दीर्घकालिक शासन के लिए एक चुनौती बनी रहेगी।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिमंत बिस्वा सरमा असम चुनाव में भाजपा के लिए क्या लक्ष्य लेकर चल रहे हैं?
सरमा का लक्ष्य भाजपा को 126 सदस्यीय असम विधानसभा में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत दिलाना है, यानी कम से कम 64 सीटें जीतना। 2016 और 2021 दोनों चुनावों में BJP 60 सीटों पर अटकी रही और सहयोगियों की मदद से सरकार बनाई।
असम में भाजपा ने 2016 और 2021 में कितनी सीटें जीती थीं?
भाजपा ने 2016 में 89 में से 60 सीटें जीतीं और वोट शेयर 29.51% रहा। 2021 में भी 60 सीटें जीतीं, लेकिन वोट शेयर बढ़कर 33.21% हो गया — दोनों बार बहुमत के लिए सहयोगी दलों की ज़रूरत पड़ी।
हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में क्यों शामिल हुए?
सरमा ने 2015 में कांग्रेस छोड़ी, यह आरोप लगाते हुए कि पार्टी में 'परिवार-केंद्रित' नेतृत्व को प्राथमिकता दी जाती है और असमिया पहचान व क्षेत्रीय हितों की अनदेखी होती है। उन्होंने दावा किया कि तरुण गोगोई के बाद अधिकांश विधायक उन्हें मुख्यमंत्री देखना चाहते थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें आगे नहीं बढ़ाया।
असम में मुख्यमंत्री बदलाव की चर्चाओं का क्या आधार है?
हाल की कुछ रिपोर्टों में मुख्यमंत्री पद में बदलाव की संभावना जताई गई है, लेकिन अब तक भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने न तो इसकी पुष्टि की है और न ही किसी विकल्प को अंदरूनी तौर पर चुने जाने का संकेत दिया है। चुनाव परिणामों के बाद पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व अंतिम फैसला करेगा।
असम में घुसपैठ का मुद्दा चुनाव में कितना अहम है?
2011 की जनगणना के अनुसार असम में 61.50% हिंदू और 34.22% मुसलमान हैं। सरमा ने बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है, जो स्थानीय मतदाताओं की एक बड़ी चिंता रही है। आलोचकों का कहना है कि इससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा है।
राष्ट्र प्रेस
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