क्या अमेरिकी टैरिफ से कोयंबटूर-तिरुपुर के उद्योग संकट में हैं?
सारांश
Key Takeaways
- कोयंबटूर और तिरुपुर के उद्योग संकट में हैं।
- अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने से रोजगार में कमी आई है।
- नई बाजारों की पहचान आवश्यक है।
चेन्नई, 17 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। कभी भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में से एक माने जाने वाले कोयंबटूर और तिरुपुर इस समय अपने सबसे कठिन समय से गुजर रहे हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ बढ़ाने के कारण यहां की फैक्ट्रियों, श्रमिकों और निर्यात पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
ये दोनों शहर मिलकर तमिलनाडु और अन्य राज्यों के लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करते थे। लेकिन अगस्त 2025 में अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर टैरिफ को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने के बाद से हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।
उद्योग के जानकारों के मुताबिक, अनुमान है कि कपड़ा और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में अब तक दो लाख से अधिक लोगों की नौकरियां चली गई हैं। यदि कास्टिंग, पंप और औद्योगिक वाल्व जैसे सहायक उद्योगों को भी जोड़ा जाए, तो प्रभावित व्यक्तियों की संख्या तीन लाख से अधिक हो सकती है।
कई छोटी और मझोली फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। कई स्थानों पर काम के घंटों में कमी की गई है और नए ऑर्डर भी तेजी से घट रहे हैं। इसका सीधा असर निर्यात पर भी पड़ रहा है।
एक निजी मिल में परिधान निर्यात और व्यापार विकास के उपाध्यक्ष धनबालन के अनुसार, पहले कोयंबटूर और तिरुपुर से अमेरिका को हर साल लगभग 1.7 अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात होता था। अब यह आंकड़ा लगभग एक अरब डॉलर कम हो चुका है।
उन्होंने कहा कि यदि भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैरिफ जारी रहता है, तो अगले एक वर्ष में अमेरिका को कपड़ा निर्यात लगभग पूरी तरह से रुक सकता है।
उद्योग का कहना है कि समस्या केवल 50 प्रतिशत टैरिफ तक सीमित नहीं है। इसके अलावा अन्य शुल्क भी लगाए जाते हैं, जिससे अंतिम कीमत और बढ़ जाती है, जिसे डिलीवर ड्यूटी पेड (डीडीपी) कीमत कहा जाता है।
इस कारण से अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे हो जाते हैं। वहीं, चीन और बांग्लादेश जैसे देश लगभग 30 प्रतिशत कम लागत में अपने सामान बेच पा रहे हैं, जिससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ गई है।
अब स्थिति और भी गंभीर हो गई है क्योंकि खबरें हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उन देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने पर विचार कर रहे हैं, जो रूस से तेल खरीदना जारी रखते हैं।
धनबालन ने कहा कि जब 50 प्रतिशत टैरिफ मुश्किल है, तो 500 प्रतिशत टैरिफ की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यदि ऐसा हुआ, तो अमेरिका को निर्यात और भी घटेगा और बेरोजगारी तेजी से बढ़ेगी।
अमेरिकी बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच निर्यातक अब भारत सरकार और उद्योग संगठनों से नए बाजारों पर ध्यान देने की मांग कर रहे हैं।
धनबालन के अनुसार, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन को अब प्राथमिक बाजार बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उद्योगों के अस्तित्व के लिए अब बाजारों में विविधता लाना बेहद आवश्यक हो गया है।
वैश्विक व्यापार में बढ़ते तनाव के बीच कोयंबटूर और तिरुपुर के लाखों श्रमिकों का भविष्य इस समय गंभीर संकट में नजर आ रहा है।