भागवत के हिंदू-मुस्लिम एकता बयान पर अयोध्या के संत बोले — यह संघ नहीं, निजी विचार
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के हिंदू-मुस्लिम एकता संबंधी बयान पर अयोध्या के प्रमुख संतों ने 30 अगस्त को तीखी प्रतिक्रिया दी है। संतों का कहना है कि यह बयान RSS के संगठनात्मक रुख का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि भागवत का व्यक्तिगत विचार है। इस विवाद ने हिंदुत्व विचारधारा के भीतर मुस्लिम समावेश के प्रश्न को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
संतों की प्रमुख प्रतिक्रियाएँ
तपस्वी छावनी के पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या धाम से कहा, 'आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि यह सोचना कि मुसलमानों को भारत में नहीं रहना चाहिए, हिंदू धर्म नहीं है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यह बयान संघ का नहीं, बल्कि मोहन भागवत का निजी बयान है। यह सनातन धर्म, राष्ट्र और मानवता के खिलाफ है।'
परमहंस आचार्य ने आगे कहा कि यदि सांस्कृतिक आत्मसमर्पण की यही नीति होती, तो देश का विभाजन न हुआ होता। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस व्यक्तिगत बयान को संगठन की आधिकारिक नीति न समझा जाए।
महंत राजू दास का संतुलित रुख
महंत राजू दास ने भागवत के बयान में एक सीमित सहमति जताई। उन्होंने कहा, 'संघ प्रमुख की ओर से सही कहा गया है कि मुसलमान के बिना देश अधूरा है — लेकिन यह बात उन मुसलमानों के लिए है जिन्हें राष्ट्र से प्रेम है और संविधान से लगाव है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग देश के विभाजन की बात करते हैं या संविधान को नहीं मानते, उनके लिए यह बात लागू नहीं होती।
महंत राजू दास ने कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उनके अनुसार, 'धर्म के आधार पर देश का बंटवारा करके कांग्रेस ने महापाप किया था और हिंदुस्तान को धर्मशाला बना दिया।' उन्होंने कहा कि भारत में रहने वाले सभी लोग हिंदुस्तानी हैं।
एक अन्य संत का दृष्टिकोण
एक अन्य संत ने भागवत के बयान को 'भावनात्मक' करार देते हुए उसका सम्मान करने की बात कही। उनका कहना था कि भारतीय सनातन परंपरा मानवता को अपना अभिन्न हिस्सा मानती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की धर्मनिरपेक्षता की नींव सनातन संस्कृति और परंपरा में है, और हिंदुत्व को अपनी विचारधारा पर दृढ़ रहना चाहिए।
विवाद का व्यापक संदर्भ
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भागवत के किसी बयान ने हिंदुत्व संगठनों के भीतर असहमति उत्पन्न की हो। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब देशभर में सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय पहचान को लेकर व्यापक बहस जारी है। संतों की यह प्रतिक्रिया दर्शाती है कि हिंदुत्व विचारधारा के भीतर मुस्लिम समावेश के प्रश्न पर एकमत नहीं है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि RSS इन असहमतियों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करता है या नहीं।