18 अक्टूबर 2026
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भाग्यलक्ष्मी मंदिर में अष्टमी पर मित्रांगण पथक की ढोल-ताशा वादन सेवा, चारमीनार के पास गूँजी भक्ति

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भाग्यलक्ष्मी मंदिर में अष्टमी पर मित्रांगण पथक की ढोल-ताशा वादन सेवा, चारमीनार के पास गूँजी भक्ति

सारांश

हैदराबाद के पहले मराठी ढोल-ताशा समूह मित्रांगण पथक ने अष्टमी पर चारमीनार स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर में पारंपरिक वादन सेवा अर्पित की। 11 साल पुराने इस समूह का यह आयोजन हैदराबाद की बहुसांस्कृतिक पहचान का जीवंत उदाहरण है।

मुख्य बातें

मित्रांगण पथक ने 18 अक्टूबर 2026 को भाग्यलक्ष्मी मंदिर में अष्टमी पर पारंपरिक ढोल-ताशा वादन सेवा अर्पित की।
यह समूह हैदराबाद का पहला मराठी ढोल-ताशा पथक है, जिसकी स्थापना 11 वर्ष पूर्व हुई थी।
भाग्यलक्ष्मी मंदिर 16वीं सदी के ऐतिहासिक चारमीनार की दक्षिण-पूर्वी मीनार के ठीक बगल में स्थित है।
नवरात्रि के दौरान मंदिर को 30 से 50 फीट की ऊँचाई तक फूलों और रोशनी से सजाया जाता है।
आयोजन में देश की समृद्धि, किसान कल्याण और मानवता की शांति के लिए प्रार्थनाएँ की गईं।

हैदराबाद के ऐतिहासिक चारमीनार के निकट स्थित भाग्यलक्ष्मी माता मंदिर में 18 अक्टूबर 2026 को दुर्गाष्टमी के पावन अवसर पर शहर के पहले मराठी ढोल-ताशा समूह मित्रांगण पथक ने पारंपरिक वादन सेवा अर्पित की। ढोल और ताशे की लयबद्ध थाप से मंदिर परिसर एक ऊर्जावान आध्यात्मिक वातावरण में डूब गया और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस अनूठे आयोजन के साक्षी बने।

मित्रांगण पथक और इसकी विरासत

मित्रांगण ढोल-ताशा पथक हैदराबाद का पहला और सबसे लोकप्रिय पारंपरिक महाराष्ट्रीयन ढोल-ताशा समूह है, जिसकी स्थापना लगभग 11 वर्ष पूर्व की गई थी। यह समूह नवरात्रि, गणेशोत्सव और अन्य हिंदू पर्वों पर भक्तिभाव से वादन सेवा करता आया है। दक्षिण भारत के एक प्रमुख शहर में महाराष्ट्रीयन सांस्कृतिक परंपरा का इस प्रकार जीवंत बने रहना सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है।

वादन सेवा का आध्यात्मिक महत्व

पारंपरिक ढोल-ताशा वादन सेवा एक जीवंत भक्ति अनुष्ठान है जो शारदीय नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से युवा टोलियों द्वारा संपन्न किया जाता है। इसमें भारी पारंपरिक ढोल और तीव्र ध्वनि वाले ताशे का उपयोग होता है, जो मिलकर एक शक्तिशाली आध्यात्मिक माहौल निर्मित करते हैं। अष्टमी, अर्थात नवरात्रि का आठवाँ दिन, देवी दुर्गा की उपासना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इस दिन मंदिरों में धार्मिक उत्साह अपने चरम पर होता है।

भाग्यलक्ष्मी मंदिर की विशेषता

श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर देवी लक्ष्मी को समर्पित एक पवित्र हिंदू मंदिर है, जो 16वीं सदी के ऐतिहासिक चारमीनार की दक्षिण-पूर्वी मीनार के ठीक बगल में स्थित है। नवरात्रि के दौरान इस मंदिर को 30 से 50 फीट की ऊँचाई तक फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। ढोल की थाप और मंदिर की इस अलौकिक सजावट का संगम श्रद्धालुओं के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है।

सामाजिक भावना और प्रार्थना

इस अवसर पर देश की समृद्धि, किसानों के कल्याण और संपूर्ण मानवता की शांति एवं सद्भावना के लिए विशेष प्रार्थनाएँ की गईं। नवरात्रि की शाम आरती के दौरान चारमीनार के आसपास का पूरा क्षेत्र श्रद्धालुओं से भर जाता है। आयोजकों ने इस वर्ष भी वादन सेवा और महा आरती का लाभ लेने के इच्छुक लोगों को समय से पूर्व पहुँचने की सलाह दी।

आगे की राह

मित्रांगण पथक की इस सेवा ने एक बार पुनः यह स्थापित किया कि हैदराबाद की बहुसांस्कृतिक पहचान में मराठी परंपराएँ गहराई से रची-बसी हैं। नवरात्रि के शेष दिनों में भी मंदिर में भव्य आयोजन अपेक्षित हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि हैदराबाद की उस बहुसांस्कृतिक विरासत का प्रमाण है जो तेलुगू, मराठी और उर्दू परंपराओं को एकसाथ जीवंत रखती है। यह उल्लेखनीय है कि चारमीनार जैसे ऐतिहासिक स्मारक के साए तले एक महाराष्ट्रीयन समूह ग्यारह वर्षों से निर्बाध रूप से अपनी सेवाएँ दे रहा है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर ऐसे सूक्ष्म सांस्कृतिक सेतुओं को अनदेखा कर देती है, जो वास्तव में सामाजिक एकता की असली कहानी बयान करते हैं।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मित्रांगण ढोल-ताशा पथक क्या है?
मित्रांगण ढोल-ताशा पथक हैदराबाद का पहला और सबसे लोकप्रिय पारंपरिक महाराष्ट्रीयन ढोल-ताशा समूह है, जिसकी स्थापना लगभग 11 वर्ष पूर्व हुई थी। यह समूह नवरात्रि सहित प्रमुख हिंदू पर्वों पर पारंपरिक वादन सेवा प्रस्तुत करता है।
भाग्यलक्ष्मी मंदिर कहाँ स्थित है?
भाग्यलक्ष्मी मंदिर हैदराबाद के पुराने शहर में 16वीं सदी के ऐतिहासिक चारमीनार की दक्षिण-पूर्वी मीनार के ठीक बगल में स्थित है। यह देवी लक्ष्मी को समर्पित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है।
ढोल-ताशा वादन सेवा अष्टमी को ही क्यों होती है?
दुर्गाष्टमी यानी अष्टमी, शारदीय नवरात्रि का आठवाँ दिन होती है और इसे देवी दुर्गा की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन मंदिरों में धार्मिक उत्साह अपने चरम पर होता है और ढोल-ताशा वादन सेवा इस आध्यात्मिक ऊर्जा को और बढ़ा देती है।
नवरात्रि में भाग्यलक्ष्मी मंदिर कैसे सजता है?
नवरात्रि के दौरान भाग्यलक्ष्मी मंदिर को फूलों और रोशनी से 30 से 50 फीट की ऊँचाई तक सजाया जाता है। महा आरती और हवन जैसे धार्मिक अनुष्ठान भी इस अवधि में आयोजित होते हैं।
मंदिर जाने वालों के लिए क्या सलाह है?
नवरात्रि की शाम की आरती और वादन सेवा के दौरान चारमीनार के आसपास का पूरा क्षेत्र अत्यधिक भीड़भाड़ वाला हो जाता है। इसलिए आयोजकों ने श्रद्धालुओं को समय से पूर्व पहुँचने की सलाह दी है।
राष्ट्र प्रेस
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