19 अक्टूबर 2026
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महाअष्टमी पर बेलूर मठ में कुमारी पूजा: हजारों श्रद्धालु उमड़े, अनुशासित आयोजन की सराहना

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महाअष्टमी पर बेलूर मठ में कुमारी पूजा: हजारों श्रद्धालु उमड़े, अनुशासित आयोजन की सराहना

सारांश

बेलूर मठ की 125वीं दुर्गा पूजा वर्षगांठ पर महाअष्टमी की कुमारी पूजा हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में शांतिपूर्वक संपन्न हुई — ठीक उस समय जब उत्तर कोलकाता की पंडाल भगदड़ में 19 लोग जान गँवा चुके थे। बेलूर मठ का 'वीआईपी-मुक्त' भीड़ प्रबंधन मॉडल अब एक मिसाल बनकर उभरा है।

मुख्य बातें

बेलूर मठ में महाअष्टमी, 19 अक्टूबर 2026 को कुमारी पूजा हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में पूर्ण अनुशासन के साथ संपन्न हुई।
इस वर्ष मठ अपनी दुर्गा पूजा की 125वीं वर्षगांठ मना रहा है, जिससे भक्तों का उत्साह विशेष रूप से अधिक रहा।
17 अक्टूबर को उत्तर कोलकाता के एक सामुदायिक पंडाल में भगदड़ में 19 लोगों की मौत के बाद बेलूर मठ की सुव्यवस्थित भीड़ नियंत्रण प्रणाली की व्यापक प्रशंसा हुई।
भक्तों और पर्यवेक्षकों ने मठ की सफलता का श्रेय वीआईपी संस्कृति और विशेष पासों के पूर्ण अभाव को दिया।
बेलूर मठ में कुमारी पूजा की शुरुआत 1901 में स्वामी विवेकानंद द्वारा की गई थी, जब पहली बार नौ कन्याओं की पूजा की गई थी।

बेलूर मठ में महाअष्टमी के पावन अवसर पर 19 अक्टूबर 2026 (सोमवार) को हजारों श्रद्धालु कुमारी पूजा के पवित्र अनुष्ठान के साक्षी बनने के लिए एकत्रित हुए। रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के इस वैश्विक मुख्यालय में पूजा पूर्ण अनुशासन और आध्यात्मिक गरिमा के साथ संपन्न हुई। यह आयोजन इसलिए भी विशेष रहा क्योंकि इस वर्ष बेलूर मठ अपनी दुर्गा पूजा की 125वीं वर्षगांठ मना रहा है।

मुख्य घटनाक्रम

सोमवार की सुबह से ही बड़ी संख्या में भक्त कोलकाता तथा अन्य राज्यों से विशेष रूप से इस अवसर पर पहुँचे। 125वीं वर्षगांठ के कारण इस बार उत्साह सामान्य वर्षों से कहीं अधिक देखा गया। कुमारी पूजा अनुष्ठान के अंतर्गत एक युवती की पूजा देवी माँ के अवतार के रूप में की जाती है — यह परंपरा प्रत्येक स्त्री में दिव्य माँ को पहचानने के श्री रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक विश्वास को मूर्त रूप देती है।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, बेलूर मठ में पहली कुमारी पूजा 1901 में आयोजित की गई थी, जब नौ कन्याओं की पूजा की गई थी। तब से यह अनुष्ठान महाअष्टमी पर संस्था के दुर्गा पूजा समारोह का अभिन्न अंग बन गया है।

भीड़ प्रबंधन की हुई प्रशंसा

यह आयोजन ऐसे समय में हुआ है जब उत्तर कोलकाता के एक सामुदायिक दुर्गा पूजा पंडाल में 17 अक्टूबर को भीड़ प्रबंधन में गंभीर चूक के कारण भगदड़ मच गई थी, जिसमें 19 लोगों की जान चली गई थी। इस पृष्ठभूमि में बेलूर मठ की सुव्यवस्थित भीड़ नियंत्रण प्रणाली की व्यापक सराहना हुई।

पर्यवेक्षकों ने सवाल उठाया कि जब बेलूर मठ हर वर्ष हजारों की भीड़ को अनुशासित तरीके से संभाल लेता है, तो कम भीड़ वाले सामुदायिक आयोजनों में भीड़ नियंत्रण की इतनी कठिनाई क्यों होती है।

वीआईपी संस्कृति का अभाव — भक्तों की राय

मठ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "श्री रामकृष्ण परमहंस, उनकी आध्यात्मिक संगिनी माँ शारदा और स्वामी विवेकानंद के अनुयायी वर्षों से कुमारी पूजा को उत्साह और भक्ति के साथ मनाते आ रहे हैं।" उन्होंने आगे कहा कि इस वर्ष भी आयोजन की पवित्रता और सुसंगठित स्वरूप में कोई कमी नहीं आई।

प्रत्येक वर्ष मठ में आने वाली एक भक्त ने बताया, "एक कारण यह है कि बेलूर मठ के अधिकारियों ने कभी भी वीआईपी संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया। इसके विपरीत, सामुदायिक दुर्गा पूजाओं में वीआईपी पास की व्यवस्था वर्षों से चली आ रही है, जिससे भीड़ प्रबंधन और भी कठिन हो जाता है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि मठ का वातावरण इतना पवित्र है कि भक्त घंटों प्रतीक्षा करने में संकोच नहीं करते और प्रभाव का इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं करते।

कुमारी पूजा की आध्यात्मिक विरासत

स्वामी विवेकानंद ने मातृशक्ति के प्रतीक के रूप में एक युवती की पूजा करने की इस परंपरा को बेलूर मठ में आरंभ किया था। पारंपरिक भक्ति, शास्त्रसम्मत विधियाँ और स्वामी विवेकानंद से जुड़ी परंपराओं के समन्वय ने इस समारोह को मठ की धार्मिक विरासत में विशिष्ट स्थान दिलाया है।

गौरतलब है कि यह अनुष्ठान महिलाओं की शक्ति और गरिमा के प्रति सम्मान का भी प्रतीक है। उनके अनुयायी इसे सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव और नारी की गरिमा को मान्यता देने के आह्वान के रूप में देखते हैं।

आगे क्या

17 अक्टूबर की पंडाल भगदड़ के बाद शहर भर के बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन व्यवस्थाओं पर प्रशासनिक ध्यान केंद्रित हुआ है। बेलूर मठ की घटना ने यह बहस और तेज की है कि सामुदायिक आयोजकों को व्यवस्थित भीड़ नियंत्रण के लिए मठ के अनुभव और मॉडल से क्या सीखना चाहिए। दुर्गा पूजा उत्सव के शेष दिन भी सुरक्षित और सुव्यवस्थित तरीके से संपन्न हों, इसके लिए प्रशासन सतर्क बना हुआ है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह है कि उसे कैसे सम्मान के साथ संभाला जाए। वीआईपी पास की अनुपस्थिति एक सांस्कृतिक चुनाव है, और बेलूर मठ दशकों से यह चुनाव करता आया है। सामुदायिक आयोजकों के लिए यह सबक सरल है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक दबावों के चलते इसे अपनाना कठिन साबित होता है। असली परीक्षा यह है कि क्या प्रशासन इस त्रासदी को केवल एक घटना मानकर भूल जाएगा, या सभी बड़े सार्वजनिक आयोजनों के लिए बाध्यकारी भीड़ प्रबंधन मानक तय किए जाएँगे।
RashtraPress
19 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेलूर मठ में कुमारी पूजा क्या है और इसे कब शुरू किया गया था?
कुमारी पूजा वह अनुष्ठान है जिसमें महाअष्टमी के दिन एक युवती की पूजा देवी माँ के अवतार के रूप में की जाती है। बेलूर मठ में इसकी शुरुआत 1901 में स्वामी विवेकानंद ने की थी, जब पहली बार नौ कन्याओं की पूजा की गई थी।
इस वर्ष बेलूर मठ की दुर्गा पूजा विशेष क्यों है?
इस वर्ष बेलूर मठ अपनी दुर्गा पूजा की 125वीं वर्षगांठ मना रहा है, जिससे देश-विदेश से बड़ी संख्या में भक्त विशेष रूप से इस अवसर पर पहुँचे। इस मील के पत्थर ने उत्सव के महत्व और भव्यता दोनों को बढ़ा दिया।
बेलूर मठ की भीड़ व्यवस्था को इतनी प्रशंसा क्यों मिल रही है?
17 अक्टूबर को उत्तर कोलकाता के एक सामुदायिक पंडाल में भगदड़ में 19 लोगों की मौत के बाद बेलूर मठ का शांतिपूर्ण और अनुशासित आयोजन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। भक्तों और पर्यवेक्षकों ने इसका श्रेय मठ की वीआईपी-मुक्त नीति और सुव्यवस्थित प्रबंधन को दिया।
सामुदायिक पंडालों की तुलना में बेलूर मठ भीड़ को बेहतर क्यों संभाल पाता है?
भक्तों के अनुसार, बेलूर मठ ने कभी भी वीआईपी संस्कृति या विशेष पासों को प्रोत्साहन नहीं दिया, जो सामुदायिक पंडालों में भीड़ नियंत्रण को जटिल बना देते हैं। इसके अलावा, मठ का पवित्र वातावरण भक्तों को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने के लिए प्रेरित करता है।
कुमारी पूजा का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व क्या है?
यह अनुष्ठान प्रत्येक स्त्री में दिव्य माँ को देखने की श्री रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा को मूर्त रूप देता है और नारी शक्ति व गरिमा का प्रतीक है। स्वामी विवेकानंद ने इसे मातृशक्ति के सम्मान के रूप में बेलूर मठ में स्थापित किया था।
राष्ट्र प्रेस
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