विजयादशमी 2026: दिल्ली, बंगाल और त्रिपुरा में 'सिंदूर खेला' रस्म के साथ दुर्गा पूजा का भावभीना समापन
सारांश
मुख्य बातें
विजयादशमी के पावन अवसर पर 21 अक्टूबर 2026 को दिल्ली, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में बंगाली हिंदू महिलाओं ने पारंपरिक 'सिंदूर खेला' रस्म के साथ दुर्गा पूजा को विदाई दी। इस रस्म में महिलाओं ने एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाया, मिठाइयाँ बाँटीं और देवी दुर्गा से परिजनों की सुख, समृद्धि एवं सुरक्षा की कामना की।
दिल्ली में उत्सव का रंग
नई दिल्ली के आरामबाग पूजा समिति के पंडाल में सिंदूर खेला बड़े उत्साह के साथ मनाया गया। इसके अलावा चित्तरंजन पार्क में भी महिलाओं ने इस परंपरा में सक्रिय भागीदारी की — यह इलाका अपनी भव्य दुर्गा पूजा के लिए राजधानी में विशेष पहचान रखता है।
उत्सव में शामिल एक महिला ने कहा, 'हम सभी यहाँ रहने वाले बंगाली प्रवासी हैं और हम एक परिवार की तरह मिलकर माँ दुर्गा की पूजा करते हैं।' यह भावना दर्शाती है कि सिंदूर खेला सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि प्रवासी समुदाय के लिए सांस्कृतिक पहचान और एकजुटता का प्रतीक भी है।
कोलकाता और बीरभूम में उमड़ा उत्साह
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मुदियाली क्लब के पंडाल में महिलाओं की भारी भीड़ ने सिंदूर खेला मनाया। बीरभूम जिले में भी इस परंपरा की धूम रही, जहाँ महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाते हुए अपने परिवारों की भलाई और सुरक्षा के लिए प्रार्थना की।
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा मिला हुआ है, जिससे इस त्योहार और इससे जुड़ी रस्मों का वैश्विक महत्व और भी बढ़ जाता है।
त्रिपुरा में विसर्जन और 'डाक डोले' रस्म
दक्षिण त्रिपुरा के पूजा पंडालों में भी महिलाओं ने सिंदूर खेला में हिस्सा लिया, जबकि देवी दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन की तैयारियाँ समानांतर चलती रहीं। पुजारियों ने विसर्जन से जुड़ी विधियाँ पूरी कीं और पारंपरिक 'डाक डोले' रस्म के अंतर्गत महिलाएँ देवी के पवित्र कलश को पुजारी के घर तक ले गईं।
सिंदूर खेला की परंपरा और सांस्कृतिक महत्व
'सिंदूर खेला' — शाब्दिक अर्थ 'सिंदूर से खेलना' — बंगाली हिंदू समुदाय में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन विजयादशमी को मनाई जाने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण रस्मों में से एक है। रस्म की शुरुआत में महिलाएँ देवी के माथे और चरणों पर सिंदूर अर्पित करती हैं और विदाई प्रार्थनाओं में सम्मिलित होती हैं। इसके बाद वे परस्पर सिंदूर लगाकर मिठाइयाँ बाँटती हैं और सुख-समृद्धि की शुभकामनाएँ देती हैं।
यह रस्म उस मान्यता पर टिकी है कि दुर्गा पूजा के दौरान माँ दुर्गा अपने मायके आती हैं और विजयादशमी को कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के पास लौट जाती हैं। देवी को एक बेटी की तरह स्नेहपूर्वक विदा करने की यह परंपरा त्योहार को गहरे पारिवारिक भावों से जोड़ती है।
परंपरागत रूप से यह रस्म विवाहित बंगाली हिंदू महिलाओं से जुड़ी रही है, हालाँकि कुछ आयोजक इसे अब और अधिक समावेशी रूप दे रहे हैं। विजयादशमी के साथ ही 'बिजोया' की शुभकामनाओं का सिलसिला भी प्रारंभ हो जाता है, जिसमें लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं और आने वाले वर्ष में आशीर्वाद माँगते हैं।
भक्ति, परंपरा और एकजुटता का संगम
सिंदूर खेला में भक्ति, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यह रस्म दुर्गा पूजा के समापन को महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सामूहिक भावनात्मक अनुभव में बदल देती है। आने वाले वर्षों में यह परंपरा और व्यापक होती जाएगी, क्योंकि देश भर में फैले बंगाली समुदाय इसे नई पीढ़ियों तक पहुँचाने में जुटे हैं।