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सिंदूर खेला 2026: विजयादशमी पर 400 साल पुरानी बंगाली रस्म, पान के पत्ते से देवी को भावभीनी विदाई

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सिंदूर खेला 2026: विजयादशमी पर 400 साल पुरानी बंगाली रस्म, पान के पत्ते से देवी को भावभीनी विदाई

सारांश

विजयादशमी पर मां दुर्गा की विदाई सिर्फ प्रतिमा विसर्जन नहीं — यह 400 साल पुरानी 'सिंदूर खेला' की भावनात्मक परंपरा है, जहाँ सुहागिन महिलाएं पान के पत्ते से देवी के आँसू पोंछती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सौभाग्य की कामना करती हैं। यह रस्म अब बंगाल से निकलकर विश्वभर के बंगाली समुदायों तक पहुँच चुकी है।

मुख्य बातें

सिंदूर खेला की परंपरा लगभग 400 वर्ष पुरानी है और पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है।
विजयादशमी, 20 अक्टूबर 2026 को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन से पहले यह रस्म संपन्न की जाएगी।
सुहागिन महिलाएं पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श कर भावपूर्ण विदाई देती हैं; इस अनुष्ठान को 'देवी बोरोन' कहा जाता है।
सामाजिक बदलाव के चलते अब विधवा, किन्नर और तलाकशुदा महिलाएं भी इस उत्सव में शामिल होने लगी हैं।
धुनुची नृत्य भी इस अवसर पर किया जाता है और यह परंपरा अब देशभर में फैल चुकी है।
यह रस्म अब बंगाल, मुंबई सहित देश-विदेश के बंगाली समुदायों में समान उत्साह से मनाई जाती है।

सिंदूर खेला — पश्चिम बंगाल की 400 वर्ष पुरानी सांस्कृतिक विरासत — विजयादशमी, 20 अक्टूबर 2026 को मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन से ठीक पहले देशभर के बंगाली समुदायों में पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न की जाएगी। नवमी तिथि के साथ शक्ति उपासना के नौ दिन पूरे हो चुके हैं, और अब विदाई की यह भावपूर्ण रस्म उस उत्सव की परिणति है जो इस वर्ष पश्चिम बंगाल में विशेष बड़े पैमाने पर आयोजित हुई।

सिंदूर खेला की परंपरा और पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा अपने मायके अर्थात पृथ्वी लोक पर विराजती हैं और विजयादशमी के दिन भगवान शिव के धाम कैलाश लौट जाती हैं। इसी भाव को आत्मसात करते हुए सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा की प्रतिमा के चरणों और मस्तक पर सिंदूर अर्पित करती हैं, और पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श कराकर आँसू पोंछते हुए भावपूर्ण विदाई देती हैं।

इस विशेष विदाई अनुष्ठान को 'देवी बोरोन' कहा जाता है। मान्यता है कि यह रस्म मां दुर्गा को ससुराल विदा करने की वेदना और स्नेह दोनों को एकसाथ अभिव्यक्त करती है — ठीक उसी तरह जैसे एक बेटी को माँ के घर से विदाई दी जाती है।

रस्म का विस्तृत स्वरूप

मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद, विवाहित महिलाएं एक-दूसरे के माथे, गालों और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं और परस्पर सुख, सौभाग्य तथा समृद्धि की कामना करती हैं। इस उत्सव में महिलाएं परंपरागत रूप से लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी और चूड़ियाँ पहनती हैं।

इसी दौरान धुनुची नृत्य भी किया जाता है, जिसमें धुनुची (मिट्टी के पात्र में जलती धूप) के साथ ताल पर नृत्य किया जाता है। मान्यता है कि इस नृत्य से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं। यह नृत्य अब धीरे-धीरे बंगाल की सीमाओं से बाहर निकलकर पूरे देश में प्रचलित हो रहा है।

सामाजिक बदलाव और समावेश

गौरतलब है कि परंपरागत रूप से इस उत्सव में विधवा, किन्नर या तलाकशुदा महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता था। हालांकि, सामाजिक चेतना और बदलती सोच के कारण कुछ वर्षों से समाज के सभी वर्गों की महिलाएं सिंदूर खेला उत्सव में सहभागी होने लगी हैं। यह बदलाव बंगाली समाज की समावेशी दृष्टि का परिचायक माना जा रहा है।

यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब देशभर में सार्वजनिक उत्सवों में सामाजिक समानता को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विस्तार

सिंदूर खेला अब केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रही। मुंबई सहित देश के अन्य प्रमुख शहरों और विदेशों में बसे बंगाली समुदायों के बीच यह रस्म उतनी ही धूमधाम से मनाई जाती है। मुंबई में फिल्म और मनोरंजन जगत की हस्तियाँ भी प्रतिवर्ष बड़े पैमाने पर इस रस्म में शामिल होती हैं।

सिंदूर खेला बंगाली संस्कृति में 'स्त्री शक्ति', एकता और उत्साह का प्रतीक मानी जाती है। 400 वर्षों की यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है — और हर वर्ष विजयादशमी पर इसका आयोजन इस बात की पुष्टि करता है कि भारतीय लोक संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह बंगाली स्त्री-शक्ति का वह सामाजिक दस्तावेज़ है जिसने 400 वर्षों में खुद को बदलते समाज के साथ ढाला है। विधवा और किन्नर महिलाओं को शामिल करने की दिशा में हुआ बदलाव बताता है कि परंपराएं तब टिकती हैं जब वे समावेशी होती हैं। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि मुंबई और विदेशों तक इस रस्म का विस्तार सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने की बंगाली समुदाय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है — न कि महज नॉस्टेल्जिया को।
RashtraPress
19 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सिंदूर खेला क्या है और यह कब मनाई जाती है?
सिंदूर खेला पश्चिम बंगाल की एक 400 वर्ष पुरानी परंपरा है, जो दुर्गा पूजा के अंतिम दिन विजयादशमी पर मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन से ठीक पहले मनाई जाती है। इसमें विवाहित महिलाएं देवी को सिंदूर अर्पित कर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और पारस्परिक सौभाग्य की कामना करती हैं।
'देवी बोरोन' रस्म क्या होती है?
'देवी बोरोन' सिंदूर खेला के दौरान निभाई जाने वाली विशेष विदाई रस्म है, जिसमें महिलाएं पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श कराकर भावपूर्ण विदाई देती हैं। यह रस्म मां दुर्गा को मायके से ससुराल विदा करने की भावना को व्यक्त करती है।
क्या सिंदूर खेला में अब सभी महिलाएं हिस्सा ले सकती हैं?
परंपरागत रूप से विधवा, किन्नर और तलाकशुदा महिलाओं को इस रस्म से दूर रखा जाता था, लेकिन सामाजिक बदलाव के कारण कुछ वर्षों से सभी महिलाएं इस उत्सव में सहभागी होने लगी हैं। यह बदलाव समाज की बदलती समावेशी सोच का परिणाम माना जा रहा है।
धुनुची नृत्य क्या है और इसका क्या महत्व है?
धुनुची नृत्य सिंदूर खेला के दौरान मिट्टी के पात्र में जलती धूप (धुनुची) के साथ किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य है। मान्यता है कि इस नृत्य से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं, और यह परंपरा अब बंगाल से निकलकर पूरे देश में फैल चुकी है।
सिंदूर खेला केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित है या और भी जगह मनाई जाती है?
यह रस्म अब केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रही — मुंबई, दिल्ली सहित देश के प्रमुख शहरों और विदेशों में बसे बंगाली समुदायों में भी इसे उतने ही उत्साह से मनाया जाता है। मुंबई में फिल्म जगत की हस्तियाँ भी प्रतिवर्ष इस रस्म में बड़ी संख्या में शामिल होती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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