19 अक्टूबर 2026
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संधि पूजा 2026: कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल के पंडालों में 48 मिनट के पावन काल में हुई चामुंडा आराधना

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संधि पूजा 2026: कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल के पंडालों में 48 मिनट के पावन काल में हुई चामुंडा आराधना

सारांश

अष्टमी और नवमी के मिलन-बिंदु पर केवल 48 मिनट के लिए खुलने वाला यह पवित्र संधि-काल बंगाल की दुर्गा पूजा का सर्वोच्च क्षण होता है — जब हजारों पंडालों में एक साथ शंख, ढाक और मंत्रों की त्रिवेणी बहती है और चामुंडा स्वरूप की आराधना से बुराई पर अच्छाई की विजय का पौराणिक क्षण पुनः जीवित होता है।

मुख्य बातें

19 अक्टूबर 2026 को कोलकाता समेत पूरे पश्चिम बंगाल के दुर्गा पूजा पंडालों में संधि पूजा संपन्न हुई।
यह पूजा अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के प्रारंभिक 24 मिनट — कुल 48 मिनट — में होती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी काल में देवी दुर्गा ने चामुंडा रूप धारण कर असुरों चंड और मुंड का वध किया था।
पूजा में चंडी पाठ , दुर्गा सप्तशती और रुद्र चंडी का विशेष पाठ किया गया।
संधि पूजा के उपरांत अब महानवमी और फिर विजयादशमी विसर्जन की तैयारियाँ शुरू हो गई हैं।

कोलकाता समेत समूचे पश्चिम बंगाल में 19 अक्टूबर 2026 को अष्टमी और नवमी तिथि के संधि-काल पर संधि पूजा पूरी श्रद्धा एवं विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। इस 48 मिनट के पवित्र अनुष्ठान में भक्तों ने देवी दुर्गा के चामुंडा स्वरूप की विशेष आराधना की, मंत्रोच्चार किया और शंखनाद से समूचे पंडाल-प्रांगण को भक्तिमय बना दिया।

संधि पूजा का धार्मिक महत्व

दुर्गा पूजा की समस्त रीतियों में संधि पूजा का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार यह अनुष्ठान अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रारंभिक 24 मिनट — कुल 48 मिनट — में संपन्न होता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार इसी संधि-काल में देवी दुर्गा ने चामुंडा का विकराल रूप धारण कर चंड और मुंड नामक दो असुरों का संहार किया था। इसीलिए इस पूजा में देवी के चामुंडा स्वरूप की ही उपासना की जाती है।

मुख्य घटनाक्रम: पंडालों में उमड़ा जनसैलाब

संधि-काल में कोलकाता के विख्यात पंडालों से लेकर गली-मोहल्लों की छोटी पूजा समितियों तक श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। ढाक की मधुर थाप, शंख की गूँज और सैकड़ों दीपों की जगमगाहट से समूचा वातावरण भक्ति से आलोकित हो उठा। पुजारियों ने पूर्ण शास्त्रीय विधान के अनुसार माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की, जबकि उपस्थित श्रद्धालुओं ने हाथ जोड़कर सुख, समृद्धि और शक्ति का आशीर्वाद माँगा।

चंडी पाठ और रुद्र चंडी का विशेष स्थान

शाक्त परंपरा में संधि पूजा के दौरान चंडी पाठ को विशेष महत्व दिया जाता है। देवी माहात्म्य — जिसे दुर्गा सप्तशती के नाम से भी जाना जाता है — के पाठ के माध्यम से भक्त देवी की असीम शक्ति, राक्षसों के संहार और बुराई पर अच्छाई की विजय का स्मरण करते हैं। इसके अतिरिक्त इस विशेष अवसर पर रुद्र चंडी का पाठ भी किया जाता है, जो देवी की शक्ति और महिमा का गुणगान करता है।

आम जनता पर असर और आस्था का जन-ज्वार

मान्यता है कि संधि-काल में की गई पूजा से भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। यह ऐसे समय में आया है जब बंगाल की दुर्गा पूजा को UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में स्थान मिल चुका है, जिससे इस उत्सव का वैश्विक महत्व और भी बढ़ गया है। गौरतलब है कि हर वर्ष इस अनुष्ठान में लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं, जो इसे न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक अपूर्व आयोजन बनाते हैं।

क्या होगा आगे

संधि पूजा के सफलतापूर्वक संपन्न होने के साथ ही दुर्गा पूजा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई है। अब महानवमी की पूजा की तैयारियाँ प्रारंभ हो गई हैं और उसके उपरांत विजयादशमी पर देवी प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ इस महापर्व का समापन होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

और संधि पूजा इसका सबसे दुर्लभ 48 मिनट का क्षण है। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर भीड़ और सजावट तक सिमट जाती है, जबकि इस अनुष्ठान का गहरा शास्त्रीय आधार — शाक्त परंपरा, देवी माहात्म्य और असुर-संहार की पौराणिकता — उतनी गहराई से नहीं बताया जाता। यह वह क्षण है जो बंगाल की सामूहिक आस्था को एक साझा स्मृति में पिरोता है।
RashtraPress
19 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संधि पूजा क्या है और यह क्यों खास है?
संधि पूजा दुर्गा पूजा का सबसे पवित्र अनुष्ठान है, जो अष्टमी और नवमी तिथि के मिलन-बिंदु पर मात्र 48 मिनट तक होती है। पौराणिक मान्यता है कि इसी काल में देवी दुर्गा ने चामुंडा रूप धारण कर चंड और मुंड असुरों का वध किया था, इसीलिए इस पूजा में देवी के चामुंडा स्वरूप की आराधना की जाती है।
संधि पूजा 2026 कब और कहाँ संपन्न हुई?
संधि पूजा 19 अक्टूबर 2026 को कोलकाता समेत पूरे पश्चिम बंगाल के दुर्गा पूजा पंडालों में संपन्न हुई। बड़े प्रसिद्ध पंडालों से लेकर गली-मोहल्लों की छोटी पूजा समितियों तक में यह अनुष्ठान विधि-विधान के साथ किया गया।
संधि पूजा में 48 मिनट का क्या महत्व है?
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार इस पूजा में अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के प्रारंभिक 24 मिनट — कुल 48 मिनट — शामिल होते हैं। मान्यता है कि इसी संधि-काल में की गई पूजा सर्वाधिक फलदायी होती है और भक्तों की समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
संधि पूजा में कौन-से पाठ किए जाते हैं?
संधि पूजा के दौरान चंडी पाठ, देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) और रुद्र चंडी का पाठ किया जाता है। इन पाठों के माध्यम से भक्त देवी की असीम शक्ति और राक्षसों पर उनकी विजय का स्मरण करते हैं।
संधि पूजा के बाद दुर्गा पूजा के अगले चरण क्या होंगे?
संधि पूजा संपन्न होने के बाद महानवमी की पूजा की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। महानवमी के उपरांत विजयादशमी पर देवी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा, जिसके साथ इस वर्ष की दुर्गा पूजा का समापन होगा।
राष्ट्र प्रेस
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