17 अक्टूबर 2026
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कोलकाता में महासप्तमी पर दुर्गा पूजा उत्सव, पंडालों में उमड़ी लाखों भक्तों की भीड़

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कोलकाता में महासप्तमी पर दुर्गा पूजा उत्सव, पंडालों में उमड़ी लाखों भक्तों की भीड़

सारांश

महासप्तमी पर कोलकाता एक जीवंत उत्सव के कैनवास में बदल गया है — गंगा घाटों पर नबपत्रिका स्नान की सदियों पुरानी परंपरा से लेकर जगमगाते पंडालों तक, बंगाली संस्कृति की यह अनूठी झलक हर साल लाखों भक्तों और पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है।

मुख्य बातें

कोलकाता में 17 अक्टूबर 2026 को महासप्तमी पर दुर्गा पूजा पंडालों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी।
गंगा घाटों पर पारंपरिक नबपत्रिका स्नान (कलाबोऊ) की विधि संपन्न हुई — यह सदियों पुरानी बंगाली परंपरा है।
ढाक की थाप, शंख ध्वनि और मंत्रोच्चार के बीच रात से ही पंडाल दर्शन का सिलसिला जारी रहा।
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी महाषष्ठी की शाम तमलुक में पूजा समारोहों में शामिल हुए।
कोलकाता की दुर्गा पूजा यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज है।

कोलकाता में 17 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि की महासप्तमी के अवसर पर दुर्गा पूजा का उत्सव अपने चरम पर पहुँच गया है। शहर की सड़कें जगमगाती रोशनी और रंग-बिरंगे पूजा पंडालों से सजी हैं, जहाँ भक्तों की लंबी कतारें देर रात से ही लगनी शुरू हो गई थीं। शनिवार की सुबह भी उत्सव का यही उमंग भरा माहौल बरकरार रहा।

पंडालों में उत्सव का माहौल

कंधों पर कैमरे और हाथों में मोबाइल फोन लिए श्रद्धालु रातभर एक पंडाल से दूसरे पंडाल की ओर बढ़ते रहे। कुछ लोग सेल्फी लेने में व्यस्त थे, तो कुछ परिवार के साथ त्योहार के खास पलों को कैद करते दिखे। ढाक (पारंपरिक ढोल) की गूँजती थाप ने उत्सव के माहौल में और जान डाल दी।

रात की नींद को भुलाकर हर उम्र के लोग पंडाल दर्शन के लिए निकले — आँखों में आश्चर्य, चेहरों पर मुस्कान और दिलों में उत्सव की खुशी के साथ। महासप्तमी के दिन कोलकाता किसी जीवंत कैनवास की तरह नज़र आ रहा है, जिस पर भक्ति और उल्लास के रंग एक साथ बिखरे हुए हैं।

नबपत्रिका स्नान: सदियों पुरानी परंपरा

महासप्तमी की सुबह पुजारियों और भक्तों ने गंगा घाटों पर पारंपरिक 'नबपत्रिका स्नान' की विधि संपन्न की। ढाक की थाप, शंख ध्वनि और पवित्र मंत्रोच्चार के बीच नौ पौधों के समूह — जिसे 'कलाबोऊ' भी कहा जाता है — को विधि-विधान के साथ स्नान कराया गया। इसके बाद इसे लाल किनारे वाली सफेद साड़ी पहनाकर पूजा पंडालों में स्थापित किया गया।

गौरतलब है कि सदियों पुरानी यह परंपरा प्रकृति और देवी दुर्गा की आराधना के बीच के गहरे संबंध को दर्शाती है और बंगाली संस्कृति की पहचान बनी हुई है।

मुख्यमंत्री की महाषष्ठी में भागीदारी

इससे पहले, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी महाषष्ठी की शुभ संध्या पर आयोजित पूजा समारोहों में शामिल हुए। उन्होंने एक्स पर लिखा, 'दुर्गा पूजा की महाषष्ठी के पावन अवसर पर संध्या के समय तमलुक के निमतौड़ी भारत संघ, पूर्व मेदिनीपुर जिला पुलिस लाइन और तमलुक के हमारा परिवार की ओर से आयोजित मां दुर्गा पूजा के शुभारंभ समारोह में उपस्थित रहा। मैंने मां की आरती कर, मां के चरणों में पुष्प अर्पित कर प्रणाम किया और सभी के कल्याण के लिए प्रार्थना की। जगत जननी मां गौरी के चरणों में प्रार्थना करता हूं कि मां सभी का मंगल करें।'

आगे के दिन और उत्सव की भव्यता

महाअष्टमी और महानवमी के साथ यह उत्सव अपने और ऊँचे शिखर पर पहुँचेगा। कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में स्थान प्राप्त है, जो इसे वैश्विक स्तर पर भी एक अनूठा सांस्कृतिक उत्सव बनाती है। आने वाले दिनों में भीड़ और बढ़ने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यूनेस्को-मान्यता प्राप्त एक सांस्कृतिक घटना है जो हर साल शहर की आर्थिक और सामाजिक नब्ज को भी दर्शाती है। नबपत्रिका स्नान जैसी परंपराएँ यह याद दिलाती हैं कि यह उत्सव तकनीकी चकाचौंध और सेल्फी संस्कृति के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री की भागीदारी राजनीतिक सहभागिता का प्रतीक भी है, जो बंगाल में सांस्कृतिक उत्सवों के इर्द-गिर्द बनती राजनीति को रेखांकित करती है। असली सवाल यह है कि इस भव्यता को बनाए रखने के लिए बुनियादी ढाँचा, भीड़ प्रबंधन और सांस्कृतिक संरक्षण पर ध्यान किस हद तक दिया जा रहा है।
RashtraPress
17 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महासप्तमी क्या है और यह दुर्गा पूजा में क्यों महत्वपूर्ण है?
महासप्तमी शारदीय नवरात्रि का सातवाँ दिन है और दुर्गा पूजा उत्सव का एक प्रमुख दिन माना जाता है। इस दिन नबपत्रिका स्नान की विधि के साथ देवी दुर्गा की औपचारिक पूजा शुरू होती है और पंडालों में भक्तों की भीड़ चरम पर पहुँचती है।
नबपत्रिका स्नान या कलाबोऊ क्या होता है?
नबपत्रिका स्नान एक प्राचीन बंगाली परंपरा है जिसमें नौ पौधों के समूह — जिसे 'कलाबोऊ' कहते हैं — को गंगा घाट पर विधि-विधान से स्नान कराया जाता है। इसके बाद इसे लाल किनारे वाली सफेद साड़ी पहनाकर पूजा पंडाल में स्थापित किया जाता है, जो प्रकृति और देवी दुर्गा की पूजा के संबंध को दर्शाता है।
कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को की मान्यता कब और क्यों मिली?
कोलकाता की दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया है, क्योंकि यह बंगाली समाज की सामूहिक पहचान, कला, संगीत और धार्मिक परंपराओं का अनूठा संगम है। यह मान्यता इसे वैश्विक सांस्कृतिक महत्व का उत्सव बनाती है।
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी किन कार्यक्रमों में शामिल हुए?
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी महाषष्ठी की शाम तमलुक के निमतौड़ी भारत संघ, पूर्व मेदिनीपुर जिला पुलिस लाइन और हमारा परिवार द्वारा आयोजित मां दुर्गा पूजा के शुभारंभ समारोहों में उपस्थित रहे। उन्होंने एक्स पर इसकी जानकारी साझा की।
महासप्तमी के बाद दुर्गा पूजा उत्सव कब तक चलेगा?
महासप्तमी के बाद महाअष्टमी और महानवमी के साथ उत्सव अपने चरम पर पहुँचता है, और विजयादशमी (दशहरा) पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ पाँच दिवसीय उत्सव का समापन होता है।
राष्ट्र प्रेस
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