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दुर्गा पूजा 2026: कोलकाता के पंडाल, परंपराएँ और लाल-पाड़ साड़ी की सांस्कृतिक विरासत

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दुर्गा पूजा 2026: कोलकाता के पंडाल, परंपराएँ और लाल-पाड़ साड़ी की सांस्कृतिक विरासत

सारांश

दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं — यह बंगाल की सामूहिक आत्मा का उत्सव है। भव्य पंडालों से लेकर लाल-पाड़ साड़ी तक, हर परंपरा में सदियों की सांस्कृतिक विरासत समाई है। जानिए, क्यों यह त्योहार आज भी बंगाली पहचान का सबसे मज़बूत धागा बना हुआ है।

मुख्य बातें

कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान अलग-अलग मोहल्लों में अस्थायी पंडाल ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और समसामयिक थीम पर सजाए जाते हैं।
महालया के अवसर पर प्रतिमा की आँखें बनाने की रस्म चक्षु दान दुर्गा पूजा की तैयारियों का पहला अहम पड़ाव है।
संध्या आरती में धनुची नृत्य और विजयादशमी पर सिंदूर खेला उत्सव की प्रमुख लोक-परंपराएँ हैं।
लाल-पाड़ साड़ी — लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी — बंगाली पारंपरिक पहनावे की प्रतीक है; लाल रंग शक्ति और सफेद रंग पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
यह साड़ी कपास व रेशम में बनती है और तांत जैसी पारंपरिक बुनाई शैली इसकी विशेष पहचान है।
पारंपरिक बंगाली लुक में सोने के आभूषण — हार, झुमके, चूड़ियाँ — साड़ी के साथ अनिवार्य रूप से पहने जाते हैं।

कोलकाता में दुर्गा पूजा 2026 के आगमन के साथ ही पश्चिम बंगाल रोशनी, कला और धार्मिक उल्लास के अनूठे संगम में डूब जाता है। शहर की संकरी गलियों से लेकर चौड़े चौराहों तक भव्य पंडाल, रंग-बिरंगी रोशनी और अनेक प्रकार की सजावट दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। इस पाँच दिवसीय उत्सव में पारंपरिक परिधान और लोक-परंपराएँ उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं जितनी धार्मिक अनुष्ठान।

पंडाल और सजावट की परंपरा

दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता के अलग-अलग मोहल्लों में अस्थायी पंडाल खड़े किए जाते हैं। इनकी थीम प्रायः ऐतिहासिक स्मारकों, मंदिरों या समसामयिक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर आधारित होती है। पारंपरिक बंगाली लोककला से लेकर समकालीन कलात्मक विचारों को इन पंडालों में जीवंत किया जाता है। गलियों और प्रमुख चौराहों पर रंग-बिरंगी लाइटें, झाँकियाँ और आधुनिक तकनीक से निर्मित सजावट मिलकर एक अलौकिक वातावरण तैयार करती हैं।

महालया और प्रतिमा निर्माण की विशेष रस्म

दुर्गा पूजा की तैयारियों में महालया का विशेष स्थान है। इस अवसर पर देवी की मिट्टी की प्रतिमा की आँखें बनाने की रस्म चक्षु दान कहलाती है, जो शिल्पकारों द्वारा श्रद्धापूर्वक सम्पन्न की जाती है। प्रतिमाओं के निर्माण में पारंपरिक रूप से मिट्टी के साथ बाँस और कपड़े जैसी सामग्रियों का उपयोग होता है। यह शिल्प-परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आई है और बंगाली सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है।

धनुची नृत्य और सिंदूर खेला

पूजा के दिनों में लोग नए वस्त्र धारण कर विभिन्न पंडालों का भ्रमण करते हैं। रात में पंडाल-दर्शन की यह परंपरा उत्सव के सार्वजनिक स्वरूप का प्रमुख हिस्सा बन चुकी है। संध्या आरती के समय धनुची नृत्य विशेष आकर्षण होता है, जिसमें श्रद्धालु जलते धूप-पात्र के साथ देवी के समक्ष पारंपरिक नृत्य करते हैं। विजयादशमी के दिन प्रतिमा-विसर्जन से पूर्व महिलाओं के बीच सिंदूर खेला की परंपरा सम्पन्न होती है, जिसमें वे एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर माँ दुर्गा को विदाई देती हैं।

लाल-पाड़ साड़ी: बंगाली संस्कृति की पहचान

दुर्गा पूजा के अवसर पर बंगाली महिलाओं के पारंपरिक परिधानों में लाल-पाड़ साड़ी — यानी लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी — विशेष रूप से नज़र आती है। यह साड़ी कपास और रेशम दोनों कपड़ों में बनाई जाती रही है। बंगाल की प्रसिद्ध तांत साड़ियाँ इस वर्ग में अग्रणी मानी जाती हैं। इस साड़ी के दोनों रंगों की अपनी प्रतीकात्मक मान्यता है — लाल रंग शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जबकि सफेद रंग पवित्रता का। गौरतलब है कि इसे सभी बंगाली महिलाओं के लिए अनिवार्य परिधान मानना उचित नहीं होगा; यह एक सांस्कृतिक प्राथमिकता है, बाध्यता नहीं।

परंपरागत ड्रेपिंग और आभूषण

लाल-पाड़ साड़ी को पहनने का पारंपरिक बंगाली तरीका इसे विशेष पहचान देता है — पल्लू और बॉर्डर को इस प्रकार से रखा जाता है कि साड़ी का लाल किनारा स्पष्ट दिखाई दे। इस परिधान के साथ सोने के हार, झुमके, चूड़ियाँ और पारंपरिक डिजाइन वाले आभूषण पहने जाते हैं। इससे दुर्गा पूजा के दौरान बंगाली पारंपरिक परिधान का समग्र स्वरूप और अधिक निखरकर सामने आता है। आने वाले वर्षों में यह परंपरा देश-विदेश में बसे बंगाली समुदाय के बीच और अधिक लोकप्रिय होती जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो इसकी वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित करता है। लाल-पाड़ साड़ी जैसी परंपराएँ बंगाली समाज में सांस्कृतिक निरंतरता की कड़ी हैं, लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य है कि बदलते शहरी परिवेश में युवा पीढ़ी इन परंपराओं को अपनी शर्तों पर अपना रही है। मुख्यधारा की कवरेज प्रायः पंडालों की भव्यता तक सीमित रह जाती है, जबकि तांत बुनकरों और मिट्टी के शिल्पकारों की आजीविका और पारंपरिक कौशल का संरक्षण उतनी ही महत्त्वपूर्ण कहानी है।
RashtraPress
8 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा पूजा के पंडाल किस थीम पर बनाए जाते हैं?
कोलकाता के पंडाल प्रायः ऐतिहासिक स्मारकों, मंदिरों, सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों या समसामयिक कलात्मक विचारों पर आधारित होते हैं। हर वर्ष विभिन्न आयोजन समितियाँ नई और अनूठी थीम चुनकर दर्शकों को आकर्षित करती हैं।
चक्षु दान रस्म क्या होती है?
चक्षु दान वह परंपरागत रस्म है जिसमें महालया के अवसर पर देवी दुर्गा की मिट्टी की प्रतिमा की आँखें बनाई जाती हैं। यह रस्म पूजा की आधिकारिक शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है और कुम्हार समुदाय के कारीगरों द्वारा बड़े श्रद्धाभाव से सम्पन्न की जाती है।
लाल-पाड़ साड़ी दुर्गा पूजा में क्यों खास मानी जाती है?
लाल-पाड़ साड़ी — लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी — बंगाली सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा से गहराई से जुड़ी है। इसमें लाल रंग शक्ति व ऊर्जा और सफेद रंग पवित्रता का प्रतीक माना जाता है, जो देवी दुर्गा के स्वरूप के अनुरूप है।
सिंदूर खेला कब और कैसे होती है?
सिंदूर खेला विजयादशमी के दिन प्रतिमा-विसर्जन से पूर्व आयोजित होती है। इस दौरान सुहागिन महिलाएँ एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और माँ दुर्गा को विदाई देती हैं — यह परंपरा सामुदायिक एकता और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
धनुची नृत्य क्या है और यह कब किया जाता है?
धनुची नृत्य एक पारंपरिक बंगाली लोकनृत्य है जो दुर्गा पूजा की संध्या आरती के समय किया जाता है। इसमें श्रद्धालु जलते नारियल-खोल और धूप से भरे मिट्टी के पात्र (धनुची) को हाथों या दाँतों में थामकर देवी के सामने नृत्य करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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