बेलूर मठ में दुर्गा पूजा 2026: महाषष्ठी से शुरू हुए अनुष्ठान, 125 साल पुरानी विवेकानंद परंपरा जीवंत
सारांश
मुख्य बातें
बेलूर मठ, हावड़ा में दुर्गा पूजा 2026 के अनुष्ठानों का शुभारंभ महाषष्ठी के पावन अवसर पर 16 अक्टूबर 2026, शुक्रवार की सुबह हुआ। रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय में यह पूजा उन परंपराओं के अनुसार संपन्न की जा रही है, जो स्वामी विवेकानंद ने 1901 में स्थापित की थीं। इस वर्ष का आयोजन उस ऐतिहासिक परंपरा की 125वीं वर्षगांठ है, जो भक्ति, समता और सामाजिक पुनर्जागरण का अनूठा संगम है।
मुख्य अनुष्ठान और विधि विधान
तड़के संन्यासियों की सहभागिता के साथ पूजा विधि का प्रारंभ 'कल्पारंभ' से हुआ — यह दुर्गा पूजा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक अनुष्ठान है। इस विधि में 'कलश' की स्थापना की जाती है, जिसे माँ दुर्गा की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है। शुक्रवार शाम 'बोधन' का अनुष्ठान संपन्न किया जाएगा, जिसे देवी दुर्गा के जागरण और विधिवत आह्वान की परंपरागत रस्म माना जाता है।
विवेकानंद की विरासत और 125 वर्ष की परंपरा
स्वामी विवेकानंद ने 1901 में पहली बार बेलूर मठ में दुर्गा पूजा का आयोजन किया था — श्री रामकृष्ण परमहंस की विचारधारा को केंद्र में रखते हुए। मठ के एक अधिकारी के अनुसार, "इसमें देवी दुर्गा को अपने हृदय में स्थापित करने का संदेश दिया गया है। हम देवी दुर्गा से प्रार्थना करते हैं कि वे संसार का कल्याण करें और सभी के हृदय में मौजूद आसुरी प्रवृत्तियों का विनाश करें।" गौरतलब है कि स्वामी विवेकानंद ने अपने लेखों में बेलूर मठ को एक ऐसे केंद्र के रूप में परिभाषित किया था, जिसकी निष्कलंक किरणें पूरे विश्व को आलोकित करने में सक्षम हैं।
अहिंसा और समता का प्रतीक — पशु बलि का निषेध
बेलूर मठ की दुर्गा पूजा एक और महत्वपूर्ण कारण से विशिष्ट है — यहाँ पशु बलि नहीं दी जाती। शारदा देवी, जो श्री रामकृष्ण परमहंस की पत्नी और आध्यात्मिक संगिनी थीं, पशु बलि की प्रथा के विरुद्ध थीं। इसी भावना का सम्मान करते हुए स्वामी विवेकानंद ने फल और सब्जियों की प्रतीकात्मक बलि की परंपरा स्थापित की, जो आज भी अपरिवर्तित रूप से जारी है।
सामाजिक समरसता का संदेश
मठ के एक अधिकारी ने बताया कि स्वामी विवेकानंद द्वारा आरंभ की गई इस पूजा में जाति, धर्म या पंथ का कोई भेद नहीं रखा जाता। सभी वर्गों के लोग एकसाथ बैठते हैं और उन्हें 'खिचड़ी प्रसाद' वितरित किया जाता है — जो सामाजिक पुनर्जागरण का एक सार्थक प्रतीक बन चुका है। श्री रामकृष्ण परमहंस, शारदा देवी और स्वामी विवेकानंद की प्रतिमाओं पर पुष्पांजलि भी अर्पित की गई।
श्रद्धालुओं की भीड़ और लाइव प्रसारण
गंगा के तट पर स्थित बेलूर मठ में उत्सव के शुभारंभ के साथ ही हजारों भक्त और अनुयायी एकत्र हुए। जो श्रद्धालु व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, उनके लिए दूरदर्शन और बेलूर मठ के आधिकारिक चैनल पर लाइव प्रसारण की व्यवस्था की गई है। महाषष्ठी के साथ आरंभ हुआ यह महोत्सव आने वाले दिनों में महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी और विजयादशमी के साथ अपने चरम पर पहुँचेगा।