16 अक्टूबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

बेलूर मठ में दुर्गा पूजा 2026: महाषष्ठी से शुरू हुए अनुष्ठान, 125 साल पुरानी विवेकानंद परंपरा जीवंत

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
बेलूर मठ में दुर्गा पूजा 2026: महाषष्ठी से शुरू हुए अनुष्ठान, 125 साल पुरानी विवेकानंद परंपरा जीवंत

सारांश

125 साल पहले स्वामी विवेकानंद ने बेलूर मठ में जो परंपरा शुरू की थी, वह आज भी उतनी ही जीवंत है — बिना पशु बलि, बिना जाति भेद, खिचड़ी प्रसाद के साथ। महाषष्ठी 2026 को फिर एक बार यह मठ भक्ति, समता और सामाजिक पुनर्जागरण के प्रतीक के रूप में उभरा है।

मुख्य बातें

बेलूर मठ , हावड़ा में दुर्गा पूजा 2026 के अनुष्ठान 16 अक्टूबर को महाषष्ठी से आरंभ हुए।
स्वामी विवेकानंद ने 1901 में यह परंपरा शुरू की थी — इस वर्ष यह 125वीं वर्षगांठ है।
पहला अनुष्ठान 'कल्पारंभ' संपन्न हुआ; शाम को 'बोधन' होगा।
यहाँ पशु बलि नहीं दी जाती — शारदा देवी की भावना के सम्मान में फल व सब्जियाँ अर्पित की जाती हैं।
जाति धर्म से परे सभी को 'खिचड़ी प्रसाद' दिया जाता है — सामाजिक समरसता का प्रतीक।
दूरदर्शन और बेलूर मठ के आधिकारिक चैनल पर लाइव प्रसारण उपलब्ध।

बेलूर मठ, हावड़ा में दुर्गा पूजा 2026 के अनुष्ठानों का शुभारंभ महाषष्ठी के पावन अवसर पर 16 अक्टूबर 2026, शुक्रवार की सुबह हुआ। रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय में यह पूजा उन परंपराओं के अनुसार संपन्न की जा रही है, जो स्वामी विवेकानंद ने 1901 में स्थापित की थीं। इस वर्ष का आयोजन उस ऐतिहासिक परंपरा की 125वीं वर्षगांठ है, जो भक्ति, समता और सामाजिक पुनर्जागरण का अनूठा संगम है।

मुख्य अनुष्ठान और विधि विधान

तड़के संन्यासियों की सहभागिता के साथ पूजा विधि का प्रारंभ 'कल्पारंभ' से हुआ — यह दुर्गा पूजा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक अनुष्ठान है। इस विधि में 'कलश' की स्थापना की जाती है, जिसे माँ दुर्गा की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है। शुक्रवार शाम 'बोधन' का अनुष्ठान संपन्न किया जाएगा, जिसे देवी दुर्गा के जागरण और विधिवत आह्वान की परंपरागत रस्म माना जाता है।

विवेकानंद की विरासत और 125 वर्ष की परंपरा

स्वामी विवेकानंद ने 1901 में पहली बार बेलूर मठ में दुर्गा पूजा का आयोजन किया था — श्री रामकृष्ण परमहंस की विचारधारा को केंद्र में रखते हुए। मठ के एक अधिकारी के अनुसार, "इसमें देवी दुर्गा को अपने हृदय में स्थापित करने का संदेश दिया गया है। हम देवी दुर्गा से प्रार्थना करते हैं कि वे संसार का कल्याण करें और सभी के हृदय में मौजूद आसुरी प्रवृत्तियों का विनाश करें।" गौरतलब है कि स्वामी विवेकानंद ने अपने लेखों में बेलूर मठ को एक ऐसे केंद्र के रूप में परिभाषित किया था, जिसकी निष्कलंक किरणें पूरे विश्व को आलोकित करने में सक्षम हैं।

अहिंसा और समता का प्रतीक — पशु बलि का निषेध

बेलूर मठ की दुर्गा पूजा एक और महत्वपूर्ण कारण से विशिष्ट है — यहाँ पशु बलि नहीं दी जाती। शारदा देवी, जो श्री रामकृष्ण परमहंस की पत्नी और आध्यात्मिक संगिनी थीं, पशु बलि की प्रथा के विरुद्ध थीं। इसी भावना का सम्मान करते हुए स्वामी विवेकानंद ने फल और सब्जियों की प्रतीकात्मक बलि की परंपरा स्थापित की, जो आज भी अपरिवर्तित रूप से जारी है।

सामाजिक समरसता का संदेश

मठ के एक अधिकारी ने बताया कि स्वामी विवेकानंद द्वारा आरंभ की गई इस पूजा में जाति, धर्म या पंथ का कोई भेद नहीं रखा जाता। सभी वर्गों के लोग एकसाथ बैठते हैं और उन्हें 'खिचड़ी प्रसाद' वितरित किया जाता है — जो सामाजिक पुनर्जागरण का एक सार्थक प्रतीक बन चुका है। श्री रामकृष्ण परमहंस, शारदा देवी और स्वामी विवेकानंद की प्रतिमाओं पर पुष्पांजलि भी अर्पित की गई।

श्रद्धालुओं की भीड़ और लाइव प्रसारण

गंगा के तट पर स्थित बेलूर मठ में उत्सव के शुभारंभ के साथ ही हजारों भक्त और अनुयायी एकत्र हुए। जो श्रद्धालु व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, उनके लिए दूरदर्शन और बेलूर मठ के आधिकारिक चैनल पर लाइव प्रसारण की व्यवस्था की गई है। महाषष्ठी के साथ आरंभ हुआ यह महोत्सव आने वाले दिनों में महासप्तमी, महाअष्टमी, महानवमी और विजयादशमी के साथ अपने चरम पर पहुँचेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि 19वीं सदी के एक सामाजिक संदेश की निरंतरता है — जब स्वामी विवेकानंद ने पशु बलि और जाति भेद को अस्वीकार कर खिचड़ी प्रसाद की परंपरा रखी। यह ऐसे समय में प्रासंगिक है जब धार्मिक उत्सवों के आसपास सामाजिक विभाजन की चर्चाएँ आम हो गई हैं। 125 वर्षों की निरंतरता यह भी बताती है कि संस्थागत आस्था में आमूल बदलाव लाना संभव है, बशर्ते नेतृत्व में स्पष्ट दृष्टि हो। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर उत्सव के दृश्यात्मक पहलुओं पर केंद्रित रहती है, वह इस पूजा के पीछे के सामाजिक दर्शन को प्रायः नज़रअंदाज़ कर देती है।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत कब और किसने की थी?
स्वामी विवेकानंद ने 1901 में बेलूर मठ में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी। 2026 का आयोजन इस परंपरा की 125वीं वर्षगांठ है।
बेलूर मठ की दुर्गा पूजा अन्य जगहों से अलग क्यों है?
बेलूर मठ की पूजा में पशु बलि नहीं दी जाती — शारदा देवी की भावनाओं के सम्मान में फल और सब्जियों की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। इसके अलावा जाति, धर्म या पंथ का भेद किए बिना सभी को एकसाथ बैठाकर खिचड़ी प्रसाद दिया जाता है।
महाषष्ठी 2026 को बेलूर मठ में कौन से अनुष्ठान संपन्न हुए?
16 अक्टूबर को सुबह 'कल्पारंभ' अनुष्ठान से पूजा का शुभारंभ हुआ, जिसमें कलश स्थापना की गई। शाम को 'बोधन' का अनुष्ठान होना निर्धारित है, जो देवी दुर्गा के जागरण और विधिवत आह्वान की रस्म मानी जाती है।
बेलूर मठ की पूजा का लाइव प्रसारण कहाँ देख सकते हैं?
जो भक्त व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, वे दूरदर्शन और बेलूर मठ के आधिकारिक चैनल पर लाइव प्रसारण देख सकते हैं।
बेलूर मठ कहाँ स्थित है और यह किस संस्था का मुख्यालय है?
बेलूर मठ पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में गंगा नदी के तट पर स्थित है। यह रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 6 घंटे पहले
  2. 5 दिन पहले
  3. 1 सप्ताह पहले
  4. 3 महीने पहले
  5. 11 महीने पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले