मां दुर्गा की मूर्ति कैसे बनती है: गंगा माटी, चक्षुदान और इको-फ्रेंडली परंपरा का रहस्य
सारांश
मुख्य बातें
शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर मां दुर्गा की मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया केवल एक शिल्पकला नहीं, बल्कि महीनों की आस्था, परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टि का संगम है। कोलकाता के कुम्हारटोली से लेकर देशभर के मूर्तिकार गंगा माटी, दोआश माटी और बेलर माटी के मिश्रण से इन भव्य प्रतिमाओं को जीवंत करते हैं। 11 अक्टूबर 2026 को जारी इस विशेष रिपोर्ट में जानिए — काठामो से चक्षुदान तक और पीओपी से इको-फ्रेंडली मूर्ति तक का पूरा सफर।
मूर्ति निर्माण की शुरुआत: काठामो और मिट्टी का चुनाव
मूर्तिकला की प्रक्रिया उत्सव से महीनों पहले, आमतौर पर बंगाली वर्ष के अंतिम दिन चैत्र संक्रांति से एक विशेष अनुष्ठान के साथ शुरू होती है। सबसे पहले बांस और पुआल से देवी का मूल ढांचा तैयार किया जाता है, जिसे 'काठामो' कहते हैं। इस ढांचे को मज़बूती देने के लिए सुंदरबन से विशेष रूप से मंगाए गए पुआल का उपयोग होता है, जिसे जूट की रस्सियों से कसा जाता है।
मां दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण में किसी एक मिट्टी का नहीं, बल्कि तीन प्रकार की मिट्टियों का वैज्ञानिक और प्रतीकात्मक उपयोग होता है। एंटेल माटी — एक चिपचिपी और सख्त काली मिट्टी — को पानी में घोलकर पुआल के ढांचे पर सबसे पहले लगाया जाता है, ताकि दरारें भरें और मूर्ति को मज़बूत आधार मिले। इसके बाद गंगा माटी — नदी तल की कोमल और चिकनी मिट्टी — का लेप देवी के शरीर को अंतिम रूप देने और त्वचा को कोमलता प्रदान करने के लिए किया जाता है।
कुम्हारटोली: ३०० साल पुरानी परंपरा और बदलता सामाजिक परिदृश्य
कोलकाता के उत्तर में स्थित कुम्हारटोली करीब 300 साल पुरानी पारंपरिक बस्ती है, जो दुर्गा पूजा के दौरान कला, आस्था और अर्थशास्त्र का केंद्र बन जाती है। यहाँ की मूर्तिकला 'टेराक्रूडा' तकनीक पर आधारित है, जिसका अर्थ है धूप में सुखाई गई बिना पकी कच्ची मिट्टी का उपयोग।
ऐतिहासिक रूप से यह पेशा पुरुष-प्रधान रहा है, लेकिन आज चाइना पाल और काकोली पाल जैसी महिला कारीगर इस पारंपरिक ढांचे को तोड़कर अपनी कला का लोहा मनवा रही हैं। यह इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव का प्रतीक है, जो शिल्प-जगत में लैंगिक समावेश की दिशा में सकारात्मक संकेत देता है।
चक्षुदान: जब मूर्ति में होता है प्राणों का संचार
मिट्टी सूखने के बाद मूर्तियों को रंगों से सजाया जाता है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के दौरान देवी की आंखों पर पट्टी बंधी रहती है। महालया के पवित्र दिन — जो पितृ पक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है — कारीगर शंख की ध्वनि के बीच देवी की आंखें उकेरते हैं। 'चक्षुदान' कहलाने वाली इस प्रक्रिया के माध्यम से प्रतिमा में प्राणों का संचार माना जाता है।
प्रतिमा के शृंगार में ऐतिहासिक रूप से दो शैलियों का प्रभुत्व रहा है। पहली है 'शोला साज', जो दलदली क्षेत्रों में पाए जाने वाले सफेद जलीय पौधे के कोर से बनाई जाती है और पूरी तरह प्राकृतिक तथा बायोडिग्रेडेबल होती है। दूसरी शैली 'डाक का साज' है, जिसकी शुरुआत औपनिवेशिक काल में हुई, जब अमीर जमींदार अपनी मूर्तियों को सजाने के लिए जर्मनी से डाक द्वारा विशेष चांदी के वर्क और धागे मंगवाते थे।
पर्यावरण पर असर और इको-फ्रेंडली बदलाव
आस्था के इस महापर्व के साथ जल प्रदूषण की एक गंभीर चुनौती भी जुड़ी रही है। विसर्जन के बाद नदियों में घुलने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और सीसा व पारा जैसी भारी धातुओं से युक्त सिंथेटिक रंगों ने गंगा, यमुना और अन्य जलीय पारिस्थितिक तंत्रों को भारी नुकसान पहुंचाया है।
इस संकट के समाधान के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने सख्त पर्यावरण-अनुकूल दिशा-निर्देश लागू किए हैं। अब POP की जगह शादू माटी और पेपर-मैशे का उपयोग बढ़ रहा है, जो पानी में आसानी से घुलकर जलीय जीवन को नुकसान नहीं पहुंचाते। सिंथेटिक रंगों की जगह पौधों से बने प्राकृतिक रंग और इमली के बीजों से बने 100 प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल बाइंडर का प्रयोग किया जा रहा है।
कोलकाता नगर निगम जैसे निकायों ने विशेष घाट बनाए हैं जहाँ मूर्तियों को शक्तिशाली 'वाटर जेट' से गलाया जाता है। इस प्रक्रिया में उत्पन्न कचरे और फूलों को खाद बनाने के लिए अलग कर लिया जाता है और पानी को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) में भेजा जाता है। इसके अलावा, फाइबरग्लास से बनी पुन: प्रयोज्य मूर्तियों का चलन विदेशों में निर्यात और प्रदूषण कम करने के उद्देश्य से तेज़ी से बढ़ रहा है।
यूनेस्को की मान्यता और आगे की राह
वर्ष 2021 में यूनेस्को ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की प्रतिष्ठित सूची में शामिल किया, जो इस पर्व की वैश्विक स्वीकृति का प्रमाण है। गौरतलब है कि यह पहचान न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि उस शिल्प-परंपरा की भी स्वीकृति है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित है। आने वाले वर्षों में इको-फ्रेंडली तकनीकों और पारंपरिक शिल्प के बीच संतुलन ही इस विरासत को टिकाऊ बनाए रखने की कुंजी होगी।