इंडो-पैसिफिक समुद्री सुरक्षा: भारत-आसियान सहयोग को ठोस परिणामों में बदलने की चुनौती
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में 30 सितंबर 2026 को आयोजित एक उच्चस्तरीय सम्मेलन में विशेषज्ञों ने एकमत से कहा कि बढ़ती भू-आर्थिक अनिश्चितता के बीच समुद्री हाईवे की सुरक्षा और वैकल्पिक व्यापार मार्गों का निर्माण अब भारत के लिए विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक अनिवार्यता बन चुकी है। चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) द्वारा आयोजित इस बैठक का विषय था — 'इंडो-पैसिफिक में भारत-आसियान समुद्री सहयोग को मजबूत करना'।
सम्मेलन की पृष्ठभूमि और मुख्य चिंताएँ
वक्ताओं ने रेखांकित किया कि भू-राजनीतिक संकटों — विशेषकर होर्मुज़ स्ट्रेट पर बढ़ते दबाव — ने दूरस्थ ऊर्जा मार्गों और क्षेत्रीय चोकपॉइंट्स की परस्पर जुड़ी कमज़ोरियों को उजागर किया है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ पहले से ही दबाव में हैं और भारत अपनी 'एक्ट ईस्ट नीति' को व्यावहारिक धरातल पर उतारने की कोशिश कर रहा है।
गौरतलब है कि 2027 में भारत-आसियान संवाद साझेदारी के 35 वर्ष पूरे हो रहे हैं, और इस अवसर को विशेषज्ञों ने सहयोग के एजेंडे को ठोस परिचालन परिणामों में बदलने के लिए एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा।
शिपिंग लागत और आपूर्ति श्रृंखला पर असर
पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव आर. लक्ष्मणन ने कहा, 'एक वेरी लार्ज क्रूड कैरियर (VLCC) को किराए पर लेने की लागत संकट-पूर्व युग की तुलना में लगभग 10 गुना बढ़ गई है, और एक कंटेनर जहाज को किराए पर लेने की लागत पाँच गुना बढ़ गई है, जो विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स लागत और समग्र आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन को प्रभावित करता है।' उन्होंने यह भी सुझाया कि सूचना संलयन केंद्र-हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) — जो भारतीय नौसेना द्वारा संचालित है — के दायरे को वाणिज्यिक शिपिंग तक विस्तारित किया जाए।
लक्ष्मणन के अनुसार, 'IFC-IOR मुख्यतः एक सुरक्षा, नौसेना और तटरक्षक से संबंधित तंत्र है, लेकिन हम बंदरगाह अधिकारियों और सीमा शुल्क एजेंसियों को शामिल करके इसके दायरे को वाणिज्यिक पक्ष तक बढ़ा सकते हैं, जिससे हम व्यापार और वाणिज्यिक शिपिंग में व्यवधानों को ट्रैक कर सकेंगे।'
राजनयिक और रणनीतिक दृष्टिकोण
राजदूत जयदीप मजूमदार ने कहा, 'भारत-आसियान समुद्री सहयोग घोषणात्मक संरेखण से विकसित होकर एक संरचित, बहुआयामी साझेदारी बन गया है। अब चुनौती इस अभिसरण को ठोस परिणामों में बदलने की है, ताकि समुद्री आकस्मिकताओं — चाहे वे अपेक्षित हों या अप्रत्याशित — के लिए साझा समझ और संयुक्त प्रतिक्रियाएँ बनाई जा सकें।'
वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा (सेवानिवृत्त) ने जोर दिया कि साझा विकास के लिए महासागरों का खुला और सुरक्षित रहना अनिवार्य है — सुरक्षित समुद्रों और शिपिंग लेन के साथ ही परस्पर निर्भर दुनिया में साझा समृद्धि संभव है।
प्रमुख सिफारिशें और आगे की राह
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने निम्नलिखित प्राथमिकताओं पर बल दिया: पूर्वी तट पर बंदरगाह क्षमता को मजबूत करना, वैकल्पिक कनेक्टिविटी कॉरिडोर विकसित करना, समुद्री डोमेन जागरूकता और सूचना-साझाकरण बढ़ाना, तथा नौसेना व तटरक्षक सहयोग, समन्वित गश्त एवं अभ्यास को गहरा करना। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को क्षमता-निर्माण और कनेक्टिविटी के संदर्भ में विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
आसियान रीजनल फोरम (ARF) और ADMM-प्लस जैसे आसियान-नेतृत्व वाले मंचों के अधिक उपयोग का भी आह्वान किया गया। साथ ही, आसियान आउटलुक ऑन द इंडो-पैसिफिक (AOIP), भारत की इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI) और एक्ट ईस्ट नीति के बीच व्यावहारिक अभिसरण को और मजबूत करने पर सहमति जताई गई। विशेषज्ञों के अनुसार, ऊर्जा विविधीकरण, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और समुद्री डोमेन जागरूकता लचीलापन निर्माण के तीन प्रमुख स्तंभ हैं जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।