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भारत-आसियान साझा उत्पादन रणनीति: इंडो-पैसिफिक का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र बनने का अवसर

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भारत-आसियान साझा उत्पादन रणनीति: इंडो-पैसिफिक का सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र बनने का अवसर

सारांश

चीन+1 की वैश्विक लहर में भारत और आसियान के पास एक दुर्लभ मौका है — प्रतिस्पर्धा को साझेदारी में बदलने का। ERIA के अध्ययन के अनुसार, दोनों की पूरक शक्तियाँ मिलकर इंडो-पैसिफिक का सबसे शक्तिशाली विनिर्माण इंजन बना सकती हैं, अगर नीतिगत इच्छाशक्ति इस बार सिर्फ कागज़ पर न रहे।

मुख्य बातें

ERIA के अध्ययन के अनुसार, आसियान का वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में जुड़ाव मज़बूत है, जबकि भारत का वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकरण अभी और बेहतर हो सकता है।
चीन+1 रणनीति को भारत-आसियान की साझा उत्पादन रणनीति में बदलने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया है।
प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक्स , सेमीकंडक्टर , EV बैटरी , फार्मास्यूटिकल्स और औद्योगिक मशीनरी शामिल हैं।
इंडोनेशिया खनिज व बैटरी, मलेशिया सेमीकंडक्टर, थाईलैंड ऑटोमोबाइल और वियतनाम इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में विशेष भूमिका निभा सकते हैं।
भारत को नियामकीय स्थिरता और आसियान को सदस्य देशों के बीच मानकों में एकरूपता लाने की ज़रूरत बताई गई है।

चीन+1 रणनीति के तहत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन के बीच भारत और आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन) के पास एक ऐतिहासिक अवसर है कि वे प्रतिस्पर्धा को सहयोग में बदलते हुए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के प्रमुख विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरें। इकोनॉमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर आसियान एंड ईस्ट एशिया (ERIA) के एक अध्ययन के अनुसार, आसियान की वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में भागीदारी अपेक्षाकृत सुदृढ़ है, जबकि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत का एकीकरण अभी और मज़बूत किया जा सकता है।

साझा रणनीति की ज़रूरत क्यों

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारत और आसियान स्वतंत्र रूप से निवेश आकर्षित करने की दौड़ में लगे रहे, तो एक ही श्रेणी के उत्पादों में प्रतिस्पर्धा और निवेश की दोहराव वाली गतिविधियों का जोखिम बना रहेगा। इसके विपरीत, क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क सिद्धांत के अनुसार, जब कंपनियाँ अलग-अलग स्थानों की खूबियों को मिलाकर कार्य करती हैं, तो आर्थिक लाभ कहीं अधिक होता है।

यह ऐसे समय में आया है जब बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए वैकल्पिक उत्पादन ठिकानों की तलाश में हैं। गौरतलब है कि भारत-आसियान व्यापार संबंध पहले से ही एक मज़बूत नींव पर खड़े हैं, और यह बदलता भू-आर्थिक माहौल इस साझेदारी को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का मौका दे रहा है।

भारत और आसियान की पूरक शक्तियाँ

भारत के पास विशाल घरेलू बाज़ार, तकनीकी दक्षता और व्यापक औद्योगिक एवं श्रम आधार है। देश डिज़ाइन, इंजीनियरिंग, औद्योगिक सॉफ्टवेयर और चुनिंदा कलपुर्जों के उत्पादन केंद्र के रूप में भी उभर सकता है।

दूसरी ओर, आसियान के पास आपूर्तिकर्ताओं का सुव्यवस्थित नेटवर्क, आधुनिक बंदरगाह, औद्योगिक क्षेत्र, निर्यात का दीर्घकालिक अनुभव और पूर्वी एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र के बाज़ारों तक प्रत्यक्ष पहुँच है। इन पूरक शक्तियों को एकीकृत करने पर एक देश में कलपुर्जों का उत्पादन, दूसरे में प्रसंस्करण और सबसे कुशल स्थान पर असेंबली संभव हो सकती है।

प्राथमिकता वाले क्षेत्र और देश-विशेष भूमिकाएँ

लेख में इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, फार्मास्यूटिकल्स और औद्योगिक मशीनरी को साझा आपूर्ति श्रृंखला के लिए उपयुक्त शुरुआती क्षेत्र बताया गया है। देशों की भूमिकाओं की बात करें तो इंडोनेशिया महत्वपूर्ण खनिजों और बैटरी सामग्री में, मलेशिया सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स में, थाईलैंड ऑटोमोबाइल विनिर्माण में और वियतनाम इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण एवं निर्यात नेटवर्क में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

इस ढाँचे में प्राथमिकता वाले उद्योगों, आपूर्तिकर्ताओं की कमी, तकनीकी ज़रूरतों और प्रत्येक देश में उत्पादन के सबसे प्रतिस्पर्धी चरणों की पहचान की जानी होगी।

नीतिगत बदलावों की दरकार

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को विनिर्माण क्षेत्र में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मज़बूत करनी होगी, नियामकीय नीतियों में स्थिरता लानी होगी, प्रौद्योगिकी साझेदारी के अवसर पैदा करने होंगे और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए अपने घरेलू बाज़ार का लाभ उठाना होगा।

आसियान को अपने सदस्य देशों के बीच संपर्क व्यवस्था मज़बूत करने, मानकों में एकरूपता लाने और औद्योगिक क्षेत्रों एवं बंदरगाहों को भारत के आपूर्तिकर्ता नेटवर्क से जोड़ने की ज़रूरत है। साथ ही, दोनों पक्षों के बीच व्यापार समझौते का उद्देश्य मध्यवर्ती वस्तुओं और कलपुर्जों के व्यापार को सरल बनाना होना चाहिए।

आगे की राह

ERIA के अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि क्षेत्रीय सीमाओं के पार निवेश और विनिर्माण में एक-दूसरे की क्षमताओं का लाभ उठाना दोनों पक्षों के लिए रणनीतिक अनिवार्यता बन चुकी है। यदि भारत और आसियान इस साझा खाके को व्यावहारिक रूप दे सकें, तो वे केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए चीन के विकल्प ही नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक अर्थव्यवस्था के स्वतंत्र और आत्मनिर्भर विनिर्माण इंजन बन सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ज़मीनी एकीकरण अब भी सीमित है। असली सवाल यह है कि भारत, जो अपनी PLI योजनाओं के बावजूद वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में पिछड़ा हुआ है, आसियान के साथ एक सुसंगत उत्पादन ढाँचा कैसे बनाएगा जबकि दोनों के बीच व्यापार समझौते की समीक्षा भी वर्षों से लंबित है। चीन+1 की लहर एक समय-सीमित अवसर है — यदि भारत नियामकीय अनिश्चितता और बुनियादी ढाँचे की कमियाँ दूर नहीं करता, तो यह अवसर वियतनाम और इंडोनेशिया अकेले ही उठा ले जाएंगे। साझा रणनीति की बात तभी सार्थक होगी जब दोनों पक्ष कागज़ी खाकों से आगे बढ़कर बाध्यकारी क्षेत्रीय समझौतों की दिशा में ठोस कदम उठाएँ।
RashtraPress
30 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत और आसियान मिलकर इंडो-पैसिफिक विनिर्माण केंद्र कैसे बन सकते हैं?
ERIA के अध्ययन के अनुसार, भारत और आसियान की पूरक शक्तियों — भारत का बड़ा घरेलू बाज़ार व तकनीकी दक्षता और आसियान का निर्यात अनुभव व बंदरगाह नेटवर्क — को एकीकृत कर एक साझा उत्पादन ढाँचा तैयार किया जा सकता है। इससे दोनों बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए चीन के विश्वसनीय विकल्प बन सकते हैं।
चीन+1 रणनीति क्या है और इससे भारत को क्या फायदा है?
चीन+1 रणनीति वह नीति है जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक उत्पादन केंद्रों की तलाश करती हैं। भारत इस रणनीति के तहत अपने विशाल बाज़ार, श्रम बल और बढ़ती तकनीकी क्षमताओं के बल पर विदेशी निवेश और विनिर्माण परियोजनाएँ आकर्षित कर सकता है।
ERIA अध्ययन में किन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है?
अध्ययन में इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, फार्मास्यूटिकल्स और औद्योगिक मशीनरी को भारत-आसियान साझा आपूर्ति श्रृंखला के लिए उपयुक्त शुरुआती क्षेत्र बताया गया है। इन क्षेत्रों में दोनों पक्षों की पूरक क्षमताओं का सबसे बेहतर उपयोग संभव है।
भारत को इस साझेदारी के लिए क्या बदलाव करने होंगे?
भारत को विनिर्माण में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ानी होगी, नियामकीय नीतियों में स्थिरता लानी होगी और प्रौद्योगिकी साझेदारी के अवसर पैदा करने होंगे। साथ ही, आसियान के साथ व्यापार समझौते को मध्यवर्ती वस्तुओं और कलपुर्जों के सरल व्यापार की दिशा में अद्यतन किया जाना ज़रूरी है।
आसियान के किन देशों की क्या विशेष भूमिका होगी?
अध्ययन के अनुसार इंडोनेशिया महत्वपूर्ण खनिजों और बैटरी सामग्री में, मलेशिया सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स में, थाईलैंड ऑटोमोबाइल विनिर्माण में और वियतनाम इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण एवं निर्यात नेटवर्क में अहम भूमिका निभा सकते हैं। प्रत्येक देश की विशेषता के अनुसार उत्पादन के चरण तय किए जाएंगे।
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