11 अक्टूबर 2026
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ड्राफ्ट नेशनल स्टील पॉलिसी 2047 जारी: 604 मिलियन टन क्षमता और कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती का लक्ष्य

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ड्राफ्ट नेशनल स्टील पॉलिसी 2047 जारी: 604 मिलियन टन क्षमता और कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती का लक्ष्य

सारांश

भारत सरकार का 2047 का स्टील रोडमैप महज क्षमता विस्तार की कहानी नहीं है — यह एकसाथ तीन मोर्चे खोलता है: 220 से 604 मिलियन टन की छलाँग, कार्बन उत्सर्जन में 40% कटौती, और 92% आयात-निर्भर कोकिंग कोल की चुनौती। सवाल यह है कि ये तीनों लक्ष्य एकसाथ हासिल होंगे कैसे।

मुख्य बातें

सरकार ने ड्राफ्ट नेशनल स्टील पॉलिसी 2047 जारी की, जिसमें स्टील क्षमता 220 मिलियन टन से बढ़ाकर 604 मिलियन टन करने का लक्ष्य है।
2047 तक फिनिश्ड स्टील की मांग 505 मिलियन टन और प्रति व्यक्ति खपत 302 किलोग्राम होने का अनुमान; निर्यात में 45 मिलियन टन की वृद्धि संभावित।
कार्बन उत्सर्जन तीव्रता 2.54 टन CO₂ प्रति टन से घटाकर 1.54 टन करने का लक्ष्य, जो भारत के 2070 नेट जीरो लक्ष्य के अनुरूप।
भारत अपनी 92% कोकिंग कोल ज़रूरत आयात से पूरी करता है; 2047 तक मांग 236 मिलियन टन पहुँचने का अनुमान।
लौह अयस्क मांग 299 मिलियन टन (2025) से बढ़कर 772 मिलियन टन (2047) होने का अनुमान; स्लरी पाइपलाइन नेटवर्क विस्तार प्रस्तावित।
हाइड्रोजन तकनीक, कार्बन कैप्चर, इंडस्ट्री 4.0 और एआई-सहायक कोयला मिश्रण नीति की प्रमुख तकनीकी प्राथमिकताएँ।

केंद्र सरकार ने 11 अक्टूबर 2026 को ड्राफ्ट नेशनल स्टील पॉलिसी 2047 जारी की, जिसमें भारत की कच्चे स्टील (क्रूड स्टील) उत्पादन क्षमता को मौजूदा लगभग 220 मिलियन टन से बढ़ाकर 2047 तक 604 मिलियन टन करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। यह रोडमैप स्टील क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन में कटौती, कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने और डिजिटल परिवर्तन को एकसाथ साधने की रणनीति पर टिका है।

क्षमता विस्तार और मांग का अनुमान

ड्राफ्ट नीति के अनुसार, 2047 तक फिनिश्ड स्टील की मांग 505 मिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि प्रति व्यक्ति स्टील खपत बढ़कर 302 किलोग्राम हो सकती है। उत्पादन क्षमता में इस वृद्धि से स्टील निर्यात में भी 45 मिलियन टन की बढ़ोतरी होने की संभावना जताई गई है। गौरतलब है कि भारत अभी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक और उपभोक्ता देश है।

कार्बन उत्सर्जन में कटौती का रोडमैप

जलवायु लक्ष्यों के साथ तालमेल बिठाते हुए, नीति में स्टील क्षेत्र की औसत कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को मौजूदा 2.54 टन कार्बन डाइऑक्साइड प्रति टन क्रूड स्टील से घटाकर 2047 तक 1.54 टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह लक्ष्य भारत की 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन की प्रतिबद्धता के अनुरूप है। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने, हाइड्रोजन आधारित तकनीकों को अपनाने, स्क्रैप आधारित स्टील उत्पादन में विस्तार और कार्बन कैप्चर तकनीक का रोडमैप भी दिया गया है।

कच्चे माल की चुनौती और रणनीति

स्टील उत्पादन लागत में लौह अयस्क और कोकिंग कोल की हिस्सेदारी 65 से 70 प्रतिशत तक होती है। नीति के अनुसार लौह अयस्क की मांग 2025 के 299 मिलियन टन से बढ़कर 2047 तक 772 मिलियन टन होने का अनुमान है। भारत लौह अयस्क के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, इसलिए सरकार ने घरेलू आपूर्ति और परिवहन अवसंरचना को मजबूत करने के साथ-साथ विदेशी खदानों और संयुक्त उपक्रमों के ज़रिए उच्च गुणवत्ता वाले भंडार सुरक्षित करने का प्रस्ताव रखा है।

कोकिंग कोल की स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है — भारत अपनी 92 प्रतिशत कोकिंग कोल ज़रूरत आयात के ज़रिए पूरी करता है, और 2047 तक इसकी मांग 236 मिलियन टन तक पहुँचने का अनुमान है। इसके समाधान के लिए घरेलू खनन बढ़ाने, कोल वॉशरी का विस्तार करने, दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते करने और एआई की सहायता से कोयले के बेहतर मिश्रण तैयार करने पर जोर दिया गया है। इसके अलावा स्लरी पाइपलाइन नेटवर्क के विस्तार पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है, जिससे सड़क और रेल परिवहन पर निर्भरता कम होगी।

मूल्यवर्धित उत्पाद और डिजिटल परिवर्तन

ड्राफ्ट नीति में स्टेनलेस स्टील और स्पेशियलिटी स्टील जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों पर विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि आयातित तकनीक और कच्चे माल पर निर्भरता घटाई जा सके। स्टील गुणवत्ता सुधारने के लिए भारतीय मानकों और गुणवत्ता मूल्यांकन तंत्र को मजबूत बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है। डिजिटल अवसंरचना, साझा डेटा मानकों, इंडस्ट्री 4.0, विश्वसनीय एआई और स्वचालित उत्पादन प्रणालियों को भविष्य की प्राथमिकता बताया गया है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आगे की राह

नीति में मैंगनीज, चूना पत्थर और अन्य महत्वपूर्ण कच्चे माल की दीर्घकालिक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष रणनीति अपनाने का प्रस्ताव है। सरकार के अनुसार, कच्चे माल के स्रोतों में विविधता लाने, स्टील व्यापार बढ़ाने और तकनीकी सहयोग को प्रगाढ़ करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ अहम भूमिका निभाएँगी। यह ड्राफ्ट नीति अब सार्वजनिक परामर्श के लिए उपलब्ध है, और इसे अंतिम रूप देने से पहले उद्योग जगत तथा विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएँ महत्वपूर्ण होंगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि क्षमता विस्तार और डीकार्बोनाइज़ेशन अक्सर एक-दूसरे के विरुद्ध दिशाओं में खिंचते हैं। 92% कोकिंग कोल आयात-निर्भरता का मुद्दा ड्राफ्ट का सबसे कमज़ोर बिंदु है — जब तक इस निर्भरता को ठोस घरेलू विकल्पों से नहीं तोड़ा जाता, स्टील उत्पादन लागत और आपूर्ति श्रृंखला की भेद्यता बनी रहेगी। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर हरित स्टील की माँग तेज़ी से बढ़ रही है और यूरोप का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकेनिज़्म भारतीय निर्यात पर असर डालना शुरू कर चुका है — इसलिए उत्सर्जन कटौती केवल घरेलू नहीं, व्यापारिक अनिवार्यता भी है।
RashtraPress
11 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ड्राफ्ट नेशनल स्टील पॉलिसी 2047 क्या है?
यह भारत सरकार द्वारा जारी एक दीर्घकालिक रोडमैप है, जिसका लक्ष्य देश की कच्चे स्टील उत्पादन क्षमता को मौजूदा 220 मिलियन टन से बढ़ाकर 2047 तक 604 मिलियन टन करना है। इसमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती, कच्चे माल की सुरक्षा और डिजिटल परिवर्तन का व्यापक खाका भी शामिल है।
नीति में कार्बन उत्सर्जन कटौती का लक्ष्य क्या है?
नीति में स्टील क्षेत्र की औसत कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को 2.54 टन CO₂ प्रति टन क्रूड स्टील से घटाकर 2047 तक 1.54 टन करने का लक्ष्य है। यह भारत की 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन की प्रतिबद्धता के अनुरूप है।
भारत में कोकिंग कोल की इतनी निर्भरता आयात पर क्यों है?
भारत में उच्च गुणवत्ता वाले कोकिंग कोल के घरेलू भंडार सीमित हैं, जिस कारण देश अपनी 92% कोकिंग कोल ज़रूरत आयात से पूरी करता है। नीति में इस निर्भरता को कम करने के लिए घरेलू खनन विस्तार, कोल वॉशरी और दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति समझौतों का प्रस्ताव है।
2047 तक भारत में स्टील की मांग कितनी होगी?
ड्राफ्ट नीति के अनुसार 2047 तक फिनिश्ड स्टील की मांग 505 मिलियन टन और प्रति व्यक्ति खपत 302 किलोग्राम तक पहुँचने का अनुमान है। उत्पादन क्षमता वृद्धि से निर्यात में भी 45 मिलियन टन की बढ़ोतरी संभावित है।
स्टील उत्पादन में हाइड्रोजन और एआई की क्या भूमिका होगी?
ड्राफ्ट नीति में हाइड्रोजन आधारित तकनीकों को डीकार्बोनाइज़ेशन के प्रमुख साधन के रूप में शामिल किया गया है, साथ ही एआई की सहायता से कोयले का बेहतर मिश्रण तैयार करने और इंडस्ट्री 4.0 के तहत स्वचालित उत्पादन प्रणालियाँ अपनाने की योजना है। ये उपाय क्षमता विस्तार के साथ-साथ उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने के लिए ज़रूरी माने गए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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