इनफिनिट स्क्रॉल से ऑटो-प्ले तक: सोशल मीडिया बच्चों को स्क्रीन से कैसे बाँधता है, UNICEF विशेषज्ञ ने बताए माता-पिता के लिए 3 उपाय
सारांश
मुख्य बातें
सोशल मीडिया ऐप्स में मौजूद इनफिनिट स्क्रॉल, ऑटो-प्ले और नोटिफिकेशन जैसे फीचर्स बच्चों को जानबूझकर घंटों स्क्रीन से चिपकाए रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं — यह बात यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रेंस इमरजेंसी फंड (UNICEF) द्वारा उद्धृत डिजिटल पेरेंटिंग विशेषज्ञ डॉ. जैकलीन नेसी ने स्पष्ट की है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों का विकासशील मस्तिष्क इन तकनीकी जालों के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील होता है, जिससे उनकी नींद, पढ़ाई और वास्तविक जीवन के रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं।
सोशल मीडिया का 'जाल' — कैसे काम करते हैं ये फीचर्स
डॉ. जैकलीन नेसी के अनुसार, सोशल मीडिया कंपनियाँ कई विशेष तकनीकी फीचर्स का उपयोग करती हैं जो उपयोगकर्ताओं — विशेषकर बच्चों — को प्लेटफॉर्म पर बनाए रखती हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं इनफिनिट स्क्रॉल यानी ऐसी फीड जो कभी समाप्त नहीं होती, ऑटो-प्ले जिसमें वीडियो बिना किसी क्लिक के अपने आप चलते रहते हैं, और लाइक्स, व्यूज़ तथा स्ट्रीक्स जैसे गिनती-आधारित फीचर्स जो बार-बार ऐप खोलने की आदत बनाते हैं।
इसके अलावा, इन प्लेटफॉर्म्स का एल्गोरिदम यह विश्लेषण करता है कि उपयोगकर्ता किस वीडियो पर कितनी देर रुकता है और किस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देता है। फिर उसी प्रकार का और अधिक कंटेंट परोसा जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये एल्गोरिदम बच्चों की भलाई को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं।
बच्चे क्यों अधिक प्रभावित होते हैं
विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों और किशोरों का मस्तिष्क अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता, इसलिए उनमें आत्म-नियंत्रण की क्षमता सीमित होती है। वे सोशल रिवार्ड्स जैसे लाइक्स और कमेंट्स के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।
यदि उनके मित्र सोशल मीडिया पर आपस में बातचीत कर रहे हैं और बच्चा उसमें शामिल नहीं है, तो उसे अकेलेपन का अहसास होता है — जिसे विशेषज्ञ 'फियर ऑफ मिसिंग आउट' (FOMO) कहते हैं। यही कारण है कि बच्चे ऐप छोड़ पाने में खुद को असमर्थ महसूस करते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर
डॉ. नेसी के अनुसार, सोशल मीडिया का प्रभाव हर बच्चे पर अलग होता है। जो बच्चे पहले से भावनात्मक रूप से संवेदनशील हैं, उन्हें अधिक नुकसान हो सकता है। वहीं, सही मार्गदर्शन मिलने पर कुछ बच्चे इसका सकारात्मक उपयोग भी कर सकते हैं।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि सोशल मीडिया धीरे-धीरे नींद, खेलकूद, पढ़ाई और असली जीवन के रिश्तों की जगह लेने लगता है। यदि बच्चा सोशल मीडिया के कारण नींद नहीं ले पा रहा, होमवर्क अधूरा छोड़ रहा, परिवार के साथ समय नहीं बिता रहा या स्कूल में ध्यान नहीं दे पा रहा, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
माता-पिता के लिए 3 मुख्य सुझाव
डॉ. जैकलीन नेसी ने माता-पिता को तीन व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं। पहला — खुलकर बात करें: बच्चे से बिना डाँटे यह समझने की कोशिश करें कि उन्हें सोशल मीडिया पर इतना समय क्यों बिताना अच्छा लगता है। साथ ही, इन ऐप्स के डिज़ाइन ट्रिक्स के बारे में भी बच्चे को जागरूक करें।
दूसरा — सीमाएँ तय करें: स्क्रीन टाइम की एक निश्चित सीमा रखें और परिवार के साथ समय बिताने को प्राथमिकता दें। तीसरा — रोल मॉडल बनें: स्वयं भी फोन का संतुलित उपयोग करें, क्योंकि बच्चे अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं।
विशेषज्ञों का निष्कर्ष
विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि सोशल मीडिया पूरी तरह से हानिकारक नहीं है, परंतु इसके उपयोग पर निगरानी रखना अनिवार्य है। माता-पिता की सक्रिय भूमिका ही बच्चों को डिजिटल दुनिया में स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने में सक्षम बना सकती है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब दुनिया भर की सरकारें बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने के लिए नए कानून बना रही हैं।