अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: पांच अद्वितीय 'पंचकन्याएं' जिनका साहस और संघर्ष हैं प्रेरणास्रोत
सारांश
Key Takeaways
- पंचकन्याएं हिंदू धर्म में विशेष मान्यता प्राप्त हैं।
- इनका जीवन संघर्ष और साहस का प्रतीक है।
- द्रौपदी ने सम्मान की लड़ाई लड़ी।
- कुंती ने त्याग और धैर्य का उदाहरण प्रस्तुत किया।
- इनकी कहानियां आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं।
नई दिल्ली, ८ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। हिंदू धर्म में महिलाओं को शक्ति का स्वरूप और सृष्टि की जननी माना गया है। यह विश्वास है कि नारी के बिना जीवन की निरंतरता असंभव है, क्योंकि वह नई पीढ़ी को जन्म देकर जीवन की धारा को आगे बढ़ाती है।
हमारी परंपरा में मां दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती को क्रमशः शक्ति, समृद्धि और ज्ञान की देवी के रूप में पूजा जाता है। यह भी माना जाता है कि इन देवियों के गुण हर स्त्री में किसी न किसी रूप में विद्यमान होते हैं। हालांकि हमारे पुराणों में पांच ऐसी स्त्रियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें देवी नहीं माना गया, फिर भी उनके साहस, धैर्य और संघर्ष के कारण उन्हें अत्यंत पूजनीय स्थान प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इन आदर्श महिलाओं के बारे में जानकारी लेना महत्वपूर्ण है।
ब्रह्म पुराण में एक प्रसिद्ध श्लोक है- “अहिल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा। पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम्॥”
इस श्लोक में अहिल्या (महर्षि गौतम की पत्नी), द्रौपदी (यज्ञसेनी), तारा (बाली की पत्नी), कुंती (पांडवों की माता) और मंदोदरी (रावण की पत्नी) को पंचकन्या के रूप में स्मरण करने का उल्लेख है। माना जाता है कि इस श्लोक का सुबह उच्चारण करना सभी पापों का नाश करता है। इन पांचों का जीवन संघर्ष, धैर्य और नैतिकता का एक उदाहरण है। कुछ ने कठिन परिस्थितियों में राज्य की जिम्मेदारी संभाली, जबकि दूसरों ने अपने सम्मान और न्याय के लिए संघर्ष किया। इसलिए कुछ धार्मिक अनुष्ठानों और व्रतों में भी पंचकन्याओं का स्मरण किया जाता है।
यदि इनके जीवन पर गौर करें तो अहिल्या, महर्षि गौतम की पत्नी थीं। पुराणों के अनुसार वे अत्यंत रूपवान और विदुषी थीं। देवराज इंद्र ने छल से उनका अपमान किया, जिसके फलस्वरूप वे महर्षि गौतम के श्राप से पत्थर बन गईं। बाद में भगवान राम के स्पर्श से उन्हें मुक्ति मिली।
द्रौपदी, जिन्हें यज्ञसेनी भी कहा जाता है, ने अपने सम्मान की लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को माफ नहीं किया, बल्कि एक संदेश देने के लिए युद्ध का मार्ग चुना।
तारा, वानरराज बाली की पत्नी थीं। बाली की मृत्यु के बाद उन्होंने राज्य की स्थिरता बनाए रखने के लिए सुग्रीव से विवाह किया और अपनी बुद्धिमत्ता से शासन को सुचारु रूप से चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुंती को असाधारण धैर्य और त्याग का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने पांचों पुत्रों का पालन-पोषण किया और उन्हें धर्म, साहस और कर्तव्य का मार्ग दिखाया।
पंचकन्याओं में अंतिम नाम मंदोदरी का है, जो रावण की पत्नी थीं। मान्यता है कि वे भगवान शिव की परम भक्त थीं। रामायण में मंदोदरी ने कई बार रावण को धर्म का मार्ग अपनाने की सलाह दी, पर रावण ने अपने अहंकार के कारण उनकी बात नहीं मानी।
इन पांचों स्त्रियों का जीवन यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और नैतिकता से कभी नहीं हटना चाहिए। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में इन्हें आदर्श नारी के रूप में स्मरण किया जाता है।