क्या जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज की वह चेतना, जिसने शास्त्र और राष्ट्र को दी नई रोशनी?

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क्या जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज की वह चेतना, जिसने शास्त्र और राष्ट्र को दी नई रोशनी?

सारांश

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज की कहानी एक दिव्य शक्ति की है, जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से न केवल शास्त्रों को जीवंत किया, बल्कि राष्ट्र को भी नई रोशनी दी। जानिए कैसे उन्होंने अपने जीवन में त्याग, तपस्या, और ज्ञान के माध्यम से एक नई दिशा प्रदान की।

Key Takeaways

  • जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज का जीवन त्याग और तपस्या का उदाहरण है।
  • उन्होंने दृष्टिहीनता के बावजूद दिव्य ज्ञान प्राप्त किया।
  • उनकी रचनाएँ और टीकाएँ शास्त्रों की गहराई को उजागर करती हैं।
  • वे राम जन्मभूमि मामले में महत्वपूर्ण गवाह रहे हैं।
  • उनका कार्य और दृष्टिकोण मानवता के लिए प्रेरणा स्रोत है।

नई दिल्ली, 13 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। यह केवल एक संत की जीवनगाथा नहीं है, बल्कि उस चेतना की कहानी है जो खुद अंधकार में रहकर भी संपूर्ण जगत को प्रकाश का मार्ग दिखाती है। यह किस्सा है जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज का, जिनकी अंतर्दृष्टि ने शास्त्रों को जीवन्त किया, जिनकी वाणी में वेदों की गूंज है और जिनका जीवन त्याग, तपस्या और दिव्य ज्ञान की अखंड साधना का प्रतीक है। शारीरिक दृष्टि से वंचित होने के बावजूद उन्होंने ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त की, जिसे देखकर न केवल हिंदू, बल्कि अन्य धर्मों के अनुयायी भी उन्हें दिव्य शक्ति मानते हैं।

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के एक शांत गांव शांदीखुर्द में एक धार्मिक सरयूपारिन ब्राह्मण परिवार में जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज का जन्म हुआ। उनके एक धार्मिक रिश्तेदार ने भगवान कृष्ण के सम्मान में 14 जनवरी 1950 को मकर संक्रांति के पावन दिन उनका नाम गिरिधर रखा।

लेकिन, भाग्य ने नन्हें गिरिधर के लिए एक विशेष परिकल्पना की थी। दो महीने की उम्र में उनकी आंखें प्रभावित हो गईं, जिससे वे लगभग दृष्टिहीन हो गए। फिर भी, उनकी यह शारीरिक दिव्यांगता वास्तव में श्रीराम की ओर से दी गई दिव्य दृष्टि का आवरण थी। इसके बाद उन्होंने ब्रह्मांड को दिव्य आंतरिक दृष्टि से देखा, जो नश्वर दृष्टि की सीमाओं से परे थी।

विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती ने बालक गिरिधर को अपना दिव्य आशीर्वाद दिया, जिन्होंने बचपन से ही असाधारण शैक्षणिक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। वे प्राकृत और संस्कृत में श्लोक लिखते थे, जिनमें उनके अंतर्मन की गहराई झलकती थी। उन्होंने अपने दादाजी से प्राचीन ग्रंथों का सार सीखा और ऐसे श्लोक लिखे जिनमें सर्वशक्तिमान ईश्वर की दिव्य ध्वनि गूंजती थी।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज की बौद्धिक रुचियों की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने 22 भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया और भाषा की सीमाओं को पार करते हुए काव्य रचनाएं कीं। उनकी महानतम कृतियों में चार महाकाव्य, रामचरितमानस जैसे पूजनीय ग्रंथों पर गहन टीकाएं, और आध्यात्मिक ज्ञान की गहराई को उजागर करने वाले आलोचनात्मक संस्करण शामिल हैं।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य का नाम वर्तमान के भव्य राम मंदिर के इतिहास में दर्ज है। उनके भक्ति और दिव्य शक्ति के उदाहरण को समझने में हर किसी की रुचि है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में राम जन्मभूमि मामले में जब मुस्लिम पक्ष ने यह प्रश्न उठाया कि यदि बाबर ने राम मंदिर ध्वस्त किया था, तो तुलसीदास ने इसका उल्लेख क्यों नहीं किया, उस समय रामभद्राचार्य ने इस संकट का समाधान किया। उन्होंने 15 जुलाई 2003 को हाईकोर्ट में गवाही दी और न्यायाधीश को तुलसीदास के दोहाशतक में लिखे गए उस दोहे का पाठ सुनाया।

जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर के अस्तित्व के 437 प्रमाण न्यायालय में प्रस्तुत किए गए। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों को आधार बनाकर कहा कि श्री राम के जन्म का उल्लेख वाल्मीकि रामायण के बालखंड के आठवें श्लोक से शुरू होता है। यह एक सटीक प्रमाण है।

रामभद्राचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में भी वेद-पुराणों के पुख्ता उदाहरणों से भगवान राम के अयोध्या में जन्म लेने की बात साबित की। उनकी दृष्टिहीनता के बावजूद, उनके वेदों का ज्ञान सुप्रीम कोर्ट के मुस्लिम जजों को भी प्रभावित किया।

जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को विश्वभर के लाखों लोग पूजते हैं। यही कारण है कि दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने अपने 76 वर्षों के अमर जीवन में भारत की संस्कृति और सांस्कृतिक जागृति के लिए जो कुछ भी किया है, वह अद्वितीय, अतुलनीय और अविस्मरणीय है।

Point of View

बल्कि समस्त मानवता के लिए प्रेरणादायक है। ऐसे संतों की उपस्थिति हमें संस्कृति और ज्ञान की ऊँचाइयों तक पहुँचाती है।
NationPress
13/01/2026

Frequently Asked Questions

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज कौन हैं?
जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज एक प्रसिद्ध संत और विद्वान हैं, जिन्होंने अपने जीवन में शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और दिव्य दृष्टि प्राप्त की।
उनका जन्म कब हुआ था?
उनका जन्म 14 जनवरी 1950 को मकर संक्रांति के दिन हुआ था।
क्या वे दृष्टिहीन थे?
हाँ, वे बचपन में दृष्टिहीन हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि के माध्यम से अनेक कार्य किए।
उन्होंने किस तरह के ग्रंथों पर काम किया?
उन्होंने चार महाकाव्य, रामचरितमानस पर गहन टीकाएं और आध्यात्मिक ज्ञान से संबंधित अनेक कृतियाँ लिखी हैं।
उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ क्या हैं?
उन्होंने राम जन्मभूमि मामले में महत्वपूर्ण गवाही दी और प्राचीन ग्रंथों के माध्यम से भगवान राम के जन्म के प्रमाण प्रस्तुत किए।
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