झारखंड: कोल्हान वन में मुठभेड़, ₹1 लाख इनामी माओवादी सुरक्षा बलों के हाथों ढेर

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झारखंड: कोल्हान वन में मुठभेड़, ₹1 लाख इनामी माओवादी सुरक्षा बलों के हाथों ढेर

सारांश

झारखंड के कोल्हान रिजर्व वन में बुधवार को हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने ₹1 लाख इनामी माओवादी को मार गिराया। कोबरा 209 बटालियन और पुलिस के इस संयुक्त ऑपरेशन की पृष्ठभूमि में रमेश चांपिया की हत्या और मिसिर बेसरा के दस्ते की सक्रियता है — संकेत है कि कोल्हान में नक्सल मोर्चा अभी थमा नहीं है।

Key Takeaways

  • कोल्हान रिजर्व वन में 29 अप्रैल को हुई मुठभेड़ में ₹1 लाख इनामी माओवादी मारा गया।
  • कोबरा 209 बटालियन और स्थानीय पुलिस के संयुक्त ऑपरेशन में घटनास्थल से हथियार व संदिग्ध सामग्रियाँ बरामद।
  • सुरक्षा बल पिछले 48 घंटों से गोइलकेरा थाना क्षेत्र में सघन कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रहे थे।
  • पूर्व माओवादी रमेश चांपिया की हत्या के बाद से मिसिर बेसरा के दस्ते की सक्रियता को लेकर एजेंसियाँ सतर्क थीं।
  • पूरे क्षेत्र में हाई अलर्ट; ड्रोन से निगरानी और भागने के रास्ते सील।

पश्चिमी सिंहभूम जिले के कोल्हान रिजर्व वन क्षेत्र में बुधवार, 29 अप्रैल को कोबरा 209 बटालियन और स्थानीय पुलिस के संयुक्त अभियान के दौरान सुरक्षा बलों तथा प्रतिबंधित माओवादी संगठन के बीच सीधी मुठभेड़ हुई, जिसमें ₹1 लाख का इनामी नक्सली मारा गया। घटनास्थल से शव के साथ हथियार और कई संदिग्ध सामग्रियाँ भी बरामद की गई हैं।

मुठभेड़ का घटनाक्रम

सुरक्षा एजेंसियों को खुफिया सूचना मिली थी कि रूटागुटू के पहाड़ी और घने वन क्षेत्र में माओवादियों का एक सशस्त्र दस्ता छिपा हुआ है। इस इनपुट के आधार पर कोबरा 209 बटालियन और स्थानीय पुलिस ने साझा सर्च ऑपरेशन शुरू किया। बुधवार तड़के जैसे ही जवान जंगल में आगे बढ़े, पहले से घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों ने मोर्चा संभाला, जिसके बाद पूरा इलाका युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गया।

पिछले 48 घंटों का सघन अभियान

बताया जा रहा है कि सुरक्षा बल पिछले 48 घंटों से गोइलकेरा थाना क्षेत्र के बोरोई और तूनबेड़ा के आसपास सघन कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रहे थे। हाल ही में पूर्व माओवादी रमेश चांपिया की हत्या के बाद से सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क थीं और कुख्यात माओवादी नेता मिसिर बेसरा के दस्ते की सक्रियता की लगातार सूचनाएँ मिल रही थीं। यह ऐसे समय में आया है जब झारखंड पुलिस माओवादी नेटवर्क को व्यापक स्तर पर ध्वस्त करने के अभियान में जुटी है।

माओवादियों की बदली रणनीति

अधिकारियों के अनुसार, माओवादी अब छोटे-छोटे समूहों में बँटकर छापामार रणनीति के तहत हमले करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि सुरक्षा बलों को चकमा दिया जा सके। गौरतलब है कि यह रणनीतिक बदलाव बड़े नक्सल-विरोधी अभियानों के बाद से देखा जा रहा है, जब केंद्रीय बलों की तैनाती में इज़ाफा हुआ।

हाई अलर्ट और आगे की कार्रवाई

फिलहाल पूरे क्षेत्र में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। ड्रोन तकनीक की मदद से जंगलों की निगरानी की जा रही है और अतिरिक्त बल मौके पर रवाना कर माओवादियों के भागने के संभावित रास्तों को सील कर दिया गया है। पुलिस अब इस अभियान के ज़रिए मिसिर बेसरा जैसे बड़े माओवादी नेताओं के नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करने की कोशिश में जुटी है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में और अधिक सर्च ऑपरेशन जारी रहने की संभावना है।

Point of View

या क्षेत्र में तनाव का यह चक्र यूँ ही जारी रहता है।
NationPress
30/04/2026

Frequently Asked Questions

झारखंड के कोल्हान वन में मुठभेड़ कब और कहाँ हुई?
यह मुठभेड़ 29 अप्रैल को पश्चिमी सिंहभूम जिले के कोल्हान रिजर्व वन क्षेत्र, रूटागुटू के पहाड़ी इलाके में हुई। कोबरा 209 बटालियन और स्थानीय पुलिस के संयुक्त सर्च ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों ने घात लगाकर फायरिंग की, जिसके जवाब में सुरक्षा बलों की कार्रवाई में एक माओवादी मारा गया।
मारे गए माओवादी पर कितने रुपये का इनाम था?
मारे गए माओवादी पर ₹1 लाख रुपये का इनाम घोषित था। घटनास्थल से उसके शव के साथ हथियार और अन्य संदिग्ध सामग्रियाँ बरामद की गई हैं।
मिसिर बेसरा कौन है और इस ऑपरेशन से उसका क्या संबंध है?
मिसिर बेसरा एक कुख्यात माओवादी नेता हैं जिनके दस्ते की इस क्षेत्र में सक्रियता की सूचनाएँ सुरक्षा एजेंसियों को मिल रही थीं। पूर्व माओवादी रमेश चांपिया की हत्या के बाद से बेसरा के नेटवर्क को ध्वस्त करना पुलिस का प्राथमिक लक्ष्य बताया जा रहा है।
इस मुठभेड़ के बाद सुरक्षा बलों ने क्या कदम उठाए हैं?
मुठभेड़ के बाद पूरे क्षेत्र में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। ड्रोन तकनीक से जंगलों की निगरानी की जा रही है, अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं और माओवादियों के भागने के संभावित रास्ते सील कर दिए गए हैं।
माओवादियों की मौजूदा रणनीति क्या है?
अधिकारियों के अनुसार माओवादी अब बड़े दस्तों की जगह छोटे-छोटे समूहों में बँटकर छापामार रणनीति अपना रहे हैं। इसका उद्देश्य सुरक्षा बलों को चकमा देना और बड़े नक्सल-विरोधी अभियानों से बचना है।
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