पलामू में तांत्रिक के कहने पर राख खाता रहा परिवार, 10 दिन में पाँच की मौत; जाँच शुरू
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के पलामू जिले के पड़वा प्रखंड स्थित सिक्का गाँव में 19 जून से 29 जून 2026 के बीच मात्र दस दिनों में एक ही परिवार के पाँच सदस्यों की मौत हो गई। स्वास्थ्य विभाग की प्रारंभिक जाँच में सामने आया है कि परिवार के सदस्य बीमार पड़ने पर नियमित चिकित्सा के बजाय झाड़-फूंक पर निर्भर रहे और कथित तौर पर ओझा के निर्देश पर राख का सेवन करते रहे। मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए विसरा और अन्य नमूनों की फोरेंसिक जाँच कराई जा रही है।
मौतों का क्रम
परिवार के मुखिया कुलदीप महतो की सबसे पहले 19 जून को मौत हुई। अगले ही दिन उनकी एक बेटी ने भी दम तोड़ दिया। इसके बाद परिवार के शेष सदस्य लेस्लीगंज के पूर्णाडीह इलाके में झाड़-फूंक कराने जाते रहे और कथित तौर पर राख का सेवन जारी रखा। 26 जून को कुलदीप महतो की दूसरी बेटी इंदु कुमारी की मौत हो गई। 28 जून को बहू श्वेता कुमारी और 29 जून को बेटे नकुल महतो की भी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में इलाज के दौरान मौत हो गई।
अभी भी तीन सदस्य भर्ती
परिवार के तीन अन्य सदस्य — कुलदीप महतो की पत्नी लाखो देवी, एक बेटा और एक पोता — फिलहाल रिम्स में भर्ती हैं और उनकी स्थिति की निगरानी की जा रही है। चिकित्सकों के अनुसार, सभी मरीजों में शरीर में सूजन आने के बाद हालत तेज़ी से बिगड़ने की शिकायत एक समान रूप से सामने आई है।
स्वास्थ्य विभाग की जाँच
पलामू के सिविल सर्जन डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि परिवार को कई बार अस्पताल में नियमित उपचार कराने की सलाह दी गई थी, परंतु वे चिकित्सा के साथ-साथ झाड़-फूंक का सहारा लेते रहे। राख के सेवन की जानकारी मिलने के बाद उसके नमूने जाँच के लिए भेज दिए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम सिक्का गाँव और पूर्णाडीह पहुँचकर जाँच कर रही है।
ड्रॉप्सी की आशंका भी
डॉक्टरों ने प्रारंभिक स्तर पर ड्रॉप्सी जैसी बीमारी की संभावना से भी इनकार नहीं किया है। इसे देखते हुए परिवार द्वारा उपयोग किए गए सरसों के तेल समेत अन्य खाद्य सामग्री की भी जाँच कराई जा रही है। मेदिनीराय मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में सभी मृतकों का विसरा सुरक्षित रखा गया है और उसे फोरेंसिक जाँच के लिए भेजा जाएगा।
आगे क्या होगा
फोरेंसिक और विसरा जाँच के नतीजे आने के बाद ही मौतों के वास्तविक कारण की आधिकारिक पुष्टि हो सकेगी। यह मामला झारखंड के ग्रामीण इलाकों में अंधविश्वास और चिकित्सा सुविधाओं तक पहुँच की कमी की गंभीर समस्या को एक बार फिर उजागर करता है।