ज्योतिराव फुले: जातिगत भेदभाव के खिलाफ शिक्षा का संघर्ष और ऐतिहासिक परिवर्तन
सारांश
Key Takeaways
- ज्योतिराव फुले ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ शिक्षा का हथियार बनाया।
- उन्होंने महिलाओं और दलितों के लिए पहला स्कूल खोला।
- बाल विवाह के खिलाफ सुरक्षित पनाहगाह की स्थापना की।
- उनकी किताबें आज भी समाज सुधार के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
- उन्हें महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया गया।
नई दिल्ली, 10 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। यह घटना साल १८४८ की है, जब पुणे की एक तंग गली से एक सवर्ण मित्र की बारात धूमधाम से गुजर रही थी। जातिगत भेदभाव के चलते ज्योतिराव गोविंदराव फुले को इस बारात में शामिल होने पर 'शूद्र' कहकर धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया।
इस घटना ने ज्योतिराव को एक ऐसा मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया जिसने भारतीय इतिहास को बदल कर रख दिया। उन्होंने व्यक्तिगत लाभ के पीछे भागने के बजाय अपने जीवन को इस अमानवीय व्यवस्था को खत्म करने के लिए समर्पित कर दिया।
ज्योतिराव का जन्म ११ अप्रैल १८२७ को हुआ। उन्होंने समझ लिया था कि शूद्रों, अति-शूद्रों और महिलाओं की दासता का मुख्य कारण अज्ञानता है। उन्होंने शिक्षा को 'तीसरा नेत्र' कहा, जो अज्ञानता के अंधकार को दूर कर विचारों की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
बदलाव की प्रक्रिया उन्होंने अपने घर से शुरू की। १८४८ में अपनी पत्नी सावित्रीबाई को पढ़ाना शुरू किया। उस समय जब महिलाओं और दलितों के लिए किताबों को छूना भी गुनाह माना जाता था, इस दंपति ने पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। यह कार्य आसान नहीं था। जब सावित्रीबाई स्कूल जातीं, तो रूढ़िवादी लोग उन पर पत्थर और गंदगी फेंकते थे, लेकिन सावित्रीबाई अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं। स्कूल पहुंचकर वे कपड़े बदलकर मुस्कुराते हुए लड़कियों को पढ़ातीं। उन्होंने अछूत माने जाने वाले महार और मांग समुदायों के लिए भी स्कूल खोले।
फुले का संघर्ष शिक्षा तक सीमित नहीं था। १९वीं सदी में बाल विवाह सामान्य था और कई लड़कियां कम उम्र में विधवा हो जाती थीं। १८५३ में, फुले दंपति ने अपने घर को 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' में बदल दिया, जहाँ परित्यक्त महिलाएं निडर होकर अपने बच्चों को जन्म दे सकती थीं। यहीं पर एक ब्राह्मण विधवा काशीबाई ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसे ज्योतिराव और सावित्रीबाई ने गोद लिया और यशवंत नाम दिया।
२४ सितंबर १८७३ को महात्मा फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। इस समाज ने यह स्पष्ट किया कि भगवान (जिसे फुले 'निर्मीक' कहते थे) और इंसान के बीच किसी पुरोहित या बिचौलिए की आवश्यकता नहीं है। क्या एक बच्चे को अपनी मां से बात करने के लिए किसी पंडित की जरूरत होती है? बिल्कुल नहीं। उन्होंने 'सत्यशोधक विवाह' की शुरुआत की, जिसमें दूल्हा-दुल्हन अपनी मातृभाषा मराठी में एक-दूसरे के प्रति वफादारी और समानता की कसम खाते थे।
फुले न केवल एक जमीनी नेता थे, बल्कि एक महान विचारक भी। १८७३ में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब 'गुलामगिरी' लिखी, जो अमेरिका में अश्वेतों की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को समर्पित थी। १८८१ में आई उनकी किताब 'शेतकऱ्याचा आसूड' में उन्होंने ब्रिटिश राज और भ्रष्ट नौकरशाही के गठजोड़ का पर्दाफाश किया। उन्होंने केवल समस्याओं का उल्लेख नहीं किया, बल्कि बांध बनाने और जल संरक्षण जैसे आधुनिक सुझाव भी दिए।
समाज में उनके असीम योगदान के कारण, ११ मई १८८८ को जनता ने उन्हें 'महात्मा' की उपाधि से सम्मानित किया। ६३ वर्ष की आयु में लकवा मारने के बाद, इस महान योद्धा ने १८९० में दुनिया को अलविदा कहा।