कर्नाटक शिक्षा विभाग ने स्कूलों में अश्लील गानों पर नृत्य पर लगाई रोक, प्रधानाध्यापकों को कार्रवाई की चेतावनी
सारांश
Key Takeaways
कर्नाटक शिक्षा विभाग ने मंगलवार, 28 अप्रैल 2026 को राज्यभर के स्कूलों को एक सख्त परिपत्र जारी करते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बच्चों को अश्लील या भद्दे गानों पर नृत्य कराने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। बेंगलुरु स्थित विभाग के आयुक्त कार्यालय द्वारा जारी यह निर्देश राज्य के सभी सरकारी, अनुदानित और निजी स्कूलों पर लागू होगा। विभाग ने स्पष्ट किया है कि ऐसी गतिविधियाँ शिक्षा की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य तथा नैतिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं।
परिपत्र की पृष्ठभूमि
यह परिपत्र मूलतः 16 अप्रैल को जारी किया गया था। यह आदेश कर्नाटक रक्षणा वेदिके स्वाभिमानी बाणा की बेंगलुरु इकाई के अध्यक्ष द्वारा शिक्षा विभाग को सौंपे गए ज्ञापन के बाद आया है। ज्ञापन में स्कूल आयोजनों में अनुचित प्रस्तुतियों पर चिंता जताई गई थी। विभाग के अनुसार, कई मौकों पर छात्रों को शैक्षणिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अनुपयुक्त गानों पर प्रस्तुति देते देखा गया है, जिससे अनुशासनहीनता और संस्थानों की गरिमा को नुकसान पहुँचने की आशंका है।
मुख्य दिशा-निर्देश
परिपत्र में स्कूलों के लिए कई महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए गए हैं। स्कूलों को ऐसे गीतों का चयन करने को कहा गया है जो प्रेरणादायक, सकारात्मक और देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने वाले हों। साथ ही यह भी अपेक्षित है कि चुने गए गीतों में कन्नड़ संस्कृति, परंपरा, मूल्यों और गरिमा की झलक हो।
गानों और नृत्य प्रस्तुतियों के चयन की जिम्मेदारी सीधे प्रधानाध्यापकों और प्रबंधन समितियों को सौंपी गई है। इसके अलावा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान छात्रों को शालीन परिधान पहनने के लिए प्रोत्साहित करने का भी निर्देश दिया गया है।
उल्लंघन पर कार्रवाई की चेतावनी
विभाग ने स्कूल शिक्षा विभाग के उप निदेशकों (प्रशासन) को निर्देश दिया है कि वे इस तरह की गतिविधियों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाएँ। विभाग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि किसी स्कूल में नियमों का उल्लंघन पाया गया तो संबंधित प्रधानाध्यापक या स्कूल प्रबंधन के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
विभाग का तर्क
शिक्षा विभाग ने परिपत्र में कहा है कि स्कूल बच्चों के चरित्र निर्माण, मूल्यों, व्यवहार और समग्र विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। विभाग के अनुसार, बच्चों का सांस्कृतिक जुड़ाव, अनुशासन, मानसिक स्वास्थ्य और नैतिक मूल्य स्कूल से ही आकार लेते हैं, जो उनके भविष्य की नींव तैयार करते हैं। गौरतलब है कि यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब देशभर में स्कूली सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सामग्री की उपयुक्तता को लेकर बहस तेज हो रही है।
आगे की राह
अधिकारियों ने कहा है कि इस कदम का उद्देश्य स्कूलों के शैक्षणिक वातावरण को सुरक्षित रखना और यह सुनिश्चित करना है कि सांस्कृतिक गतिविधियाँ बच्चों के समग्र विकास में सकारात्मक योगदान दें। अब देखना होगा कि राज्यभर के स्कूल इस निर्देश का पालन किस हद तक करते हैं और उप निदेशक स्तर पर निगरानी तंत्र कितना प्रभावी साबित होता है।