मनीष सिसोदिया ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को लिखा पत्र, केजरीवाल के बाद चुना सत्याग्रह का रास्ता

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मनीष सिसोदिया ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को लिखा पत्र, केजरीवाल के बाद चुना सत्याग्रह का रास्ता

सारांश

केजरीवाल के एक दिन बाद मनीष सिसोदिया ने भी दिल्ली उच्च न्यायालय की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। जज के बच्चों के केंद्र सरकार के पैनलों से जुड़े होने और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने गांधी के सत्याग्रह को अपना हथियार बनाया।

Key Takeaways

  • मनीष सिसोदिया ने 28 अप्रैल 2025 को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर अपने मामले की आगे की सुनवाई में भाग न लेने की घोषणा की।
  • एक दिन पहले 27 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल ने भी इसी मामले में इसी तरह का पत्र लिखा था।
  • सिसोदिया ने जस्टिस शर्मा के बच्चों के केंद्र सरकार के पैनलों से जुड़े होने और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई।
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि यह जज पर व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि न्याय की निष्पक्षता पर जनता के भरोसे का सवाल है।
  • AAP नेता अनुराग ढांडा ने दावा किया कि सिसोदिया को निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है।

आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने 28 अप्रैल 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया कि वह अपने मामले की आगे की सुनवाई में भाग नहीं लेंगे। सिसोदिया ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में उनकी अंतरात्मा उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल रहने की अनुमति नहीं देती। यह कदम एक दिन पूर्व 27 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल द्वारा उठाए गए इसी तरह के कदम के बाद आया है।

सत्याग्रह का रास्ता क्यों चुना

सिसोदिया ने अपने 'एक्स' पोस्ट में लिखा कि यह किसी व्यक्ति विशेष का मामला नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में भरोसे का सवाल है। उन्होंने कहा कि हर नागरिक को न केवल निष्पक्ष न्याय मिलना चाहिए, बल्कि वह निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि कभी-कभी व्यक्ति को सुविधा और अंतरात्मा के बीच चुनाव करना पड़ता है।

सिसोदिया ने यह भी स्वीकार किया कि इस फैसले से उन्हें कानूनी नुकसान हो सकता है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि जब मन में गंभीर संदेह हो तो औपचारिक रूप से शामिल रहना उचित नहीं लगता।

पत्र में उठाई गई दो मुख्य चिंताएँ

सिसोदिया ने पत्र में दो प्रमुख चिंताओं का उल्लेख किया। पहली, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद जैसे संगठनों के कार्यक्रमों में सार्वजनिक रूप से शामिल होना। दूसरी, उनके बच्चों का केंद्र सरकार के विभिन्न पैनलों में पेशेवर रूप से जुड़े होना।

सिसोदिया के अनुसार, इससे यह धारणा बनती है कि कानून अधिकारियों की विरोधी पक्ष से नजदीकी हो सकती है। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की भूमिका का भी जिक्र किया और कहा कि जज के बच्चों के पेशेवर मामलों में उनका प्रभाव बताया गया है। हालाँकि, सिसोदिया ने स्पष्ट किया कि वह जज या उनके परिवार पर कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं लगा रहे और न ही उनके बच्चों की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं।

केजरीवाल के पत्र से प्रेरणा

27 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल ने भी इसी मामले में पत्र लिखकर आगे की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार किया था। सिसोदिया ने कहा कि उन्होंने उस पत्र को ध्यान से पढ़ा और उसमें उठाए गए मुद्दों से सहमति जताई। गौरतलब है कि AAP के दोनों शीर्ष नेताओं का एक ही मामले में इस तरह एक साथ न्यायिक प्रक्रिया से अलग होना राजनीतिक दृष्टि से असाधारण कदम माना जा रहा है।

न्यायिक इतिहास का संदर्भ

सिसोदिया ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि देश के न्यायिक इतिहास में कई जजों ने ऐसी परिस्थितियों में स्वयं को मामलों से अलग किया है या स्थानांतरण का अनुरोध किया है, ताकि न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा बना रहे। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका संविधान और अदालतों पर भरोसा अटूट है, लेकिन इस विशेष मामले में परिस्थितियाँ अलग हैं।

AAP नेताओं की प्रतिक्रिया

AAP नेता अनुराग ढांडा ने एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केजरीवाल के बाद अब सिसोदिया ने भी सत्याग्रह का रास्ता चुना है। ढांडा ने दावा किया कि सिसोदिया ने अपने पत्र में लिखा है कि जज के बच्चों का भविष्य तुषार मेहता के हाथों में है, इसलिए उन्हें निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली उच्च न्यायालय इस असाधारण स्थिति पर क्या रुख अपनाता है।

Point of View

बल्कि सुनियोजित राजनीतिक संदेश है — और इसे उसी नज़रिए से परखा जाना चाहिए। जज के परिवार के पेशेवर जुड़ावों को लेकर उठाए गए सवाल गंभीर हैं, लेकिन इन्हें सत्यापन योग्य साक्ष्यों के बजाय 'धारणा' की भाषा में पेश करना एक सोची-समझी चाल है। यह ऐसे समय में आया है जब AAP चुनावी पराजय के बाद खुद को पीड़ित की भूमिका में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। असली सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका इस सार्वजनिक दबाव की रणनीति को संस्थागत अखंडता के प्रति चुनौती मानकर संज्ञान लेगी।
NationPress
30/04/2026

Frequently Asked Questions

मनीष सिसोदिया ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र क्यों लिखा?
सिसोदिया ने 28 अप्रैल 2025 को दिल्ली उच्च न्यायालय की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर अपने मामले की आगे की सुनवाई में भाग न लेने की घोषणा की। उन्होंने जज के बच्चों के केंद्र सरकार के पैनलों से जुड़े होने और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के संभावित प्रभाव को लेकर निष्पक्षता पर संदेह जताया।
सिसोदिया के सत्याग्रह का क्या अर्थ है?
सिसोदिया ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जब अंतरात्मा और सुविधा के बीच चुनाव करना पड़े, तो अंतरात्मा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका यह कदम न्यायिक प्रक्रिया में औपचारिक भागीदारी से स्वैच्छिक अलगाव है, जिसके कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
केजरीवाल ने कब और क्यों इसी तरह का पत्र लिखा था?
अरविंद केजरीवाल ने 27 अप्रैल 2025 को इसी मामले में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर आगे की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार किया था। सिसोदिया ने कहा कि उन्होंने उस पत्र को ध्यान से पढ़ा और उसमें उठाए गए मुद्दों से सहमति जताई।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
सिसोदिया ने कोई सीधा व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाया है। उन्होंने केवल यह चिंता जताई कि जस्टिस शर्मा का अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रमों में शामिल होना और उनके बच्चों का केंद्र सरकार के पैनलों से जुड़ाव निष्पक्षता को लेकर जनता के मन में संदेह पैदा कर सकता है।
इस मामले में आगे क्या हो सकता है?
दिल्ली उच्च न्यायालय को अब यह तय करना होगा कि AAP के दोनों शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति में मामले की सुनवाई कैसे आगे बढ़ाई जाए। न्यायिक इतिहास में ऐसी परिस्थितियों में अदालतें एकतरफा सुनवाई या नए निर्देश जारी कर सकती हैं।
Nation Press