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क्या जीआई टैग के बाद भी नामक्कल के कलचट्टी कारीगरों का भविष्य संकट में है?

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क्या जीआई टैग के बाद भी नामक्कल के कलचट्टी कारीगरों का भविष्य संकट में है?

सारांश

क्या जीआई टैग के बावजूद नामक्कल के कलचट्टी कारीगरों का भविष्य संकट में है? जानिए कैसे कच्चे माल की कमी और कानूनी बाधाएं इन्हें प्रभावित कर रही हैं।

मुख्य बातें

जीआई टैग ने पहचान बढ़ाई है, लेकिन समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं।
कच्चे माल की कमी कारीगरों के भविष्य को खतरे में डाल रही है।
सरकार को नीति बनाने की आवश्यकता है जो कारीगरों की मदद करे।

नमक्कल, १३ दिसंबर (राष्ट्र प्रेस)। तमिलनाडु के नमक्कल क्षेत्र के पारंपरिक सेलखड़ी कारीगरों को एक गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। उनके प्रसिद्ध कुकवेयर नमक्कल मक्कल पट्टीरंगल को हाल ही में जीआई टैग प्राप्त हुआ है, लेकिन इसके बावजूद उनका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।

हालांकि इस पहचान ने सदियों पुरानी इस कारीगरी की पहचान और मार्केट में मांग को बढ़ाया है, लेकिन कारीगरों का कहना है कि इससे उनकी सबसे बड़ी समस्या का समाधान नहीं हुआ है। उनका कहना है कि अच्छी गुणवत्ता की नक्काशी की लगातार कमी है, जो उनकी आजीविका के लिए आवश्यक है।

कई पीढ़ियों से, नामक्कल और उसके आस-पास के परिवार एक विशेष मैग्नीशियम युक्त, मखमली चिकने सोपस्टोन से कलचट्टी और अन्य वस्तुएं बनाते आ रहे हैं। उनके कुकवेयर को बेहतर गर्मी बनाए रखने की क्षमता, धीमी फर्मेंटेशन की विशेषता और पोषक तत्वों को बनाए रखने के लिए जाना जाता है।

यह पत्थर पारंपरिक रूप से नामक्कल जिले और उसके आसपास के क्षेत्रों जैसे मंगलपुरम, पेरियासोरागई, अरंगानूर और सेलम जिले के कुछ विशेष स्थानों से प्राप्त किया जाता है। लेकिन, कारीगरों का कहना है कि आसानी से मिलने वाले भंडार काफी हद तक समाप्त हो गए हैं। अधिकांश बचे भंडार अब जमीन के बहुत नीचे या प्रतिबंधित क्षेत्रों में हैं, जिसमें जंगल के इलाके भी शामिल हैं, जहाँ खुदाई करना मना है।

गहरी परतों से पत्थर निकालने के लिए मशीनी तरीकों की आवश्यकता होती है, लेकिन ऐसे खुदाई की अनुमति लेना लगातार कठिन होता जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप, कारीगरों को चिंता है कि कच्चे माल तक पहुंच कम होने से उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है, ठीक उसी समय जब जीआई टैग ने उनके उत्पादों में नई दिलचस्पी बढ़ाई है।

यह कला मुख्यतः छोटे, परिवार द्वारा चलाए जाने वाले यूनिट्स तक सीमित है जो खुदाई वाले क्षेत्रों के पास छोटे वर्कशॉप से काम करते हैं। बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद, पैमाने या कार्यबल में ज्यादा विस्तार नहीं हुआ है, मुख्यतः इसलिए कि विशेष कौशल परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाया जाता है और यह सही पत्थर तक बिना किसी रुकावट के पहुंच पर निर्भर करता है।

जीआई टैग दिलाने में शामिल स्टेकहोल्डर्स का कहना है कि सदियों से इस कला का जीवित रहना इसे कई अन्य पारंपरिक हस्तकलाओं से अलग बनाता है जो खत्म हो गई हैं।

सरकारी एजेंसियों ने प्रदर्शनियों और वर्कशॉप के माध्यम से सोपस्टोन के बर्तनों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है, और बड़े रिटेल आउटलेट्स से मांग बढ़ी है। हालांकि, कच्चे माल तक पक्की और नियंत्रित पहुंच के बिना, कारीगरों का कहना है कि वे उत्पादन नहीं बढ़ा पा रहे हैं या नए बाजार के अवसरों का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

वन अधिकारियों का कहना है कि खुदाई की अनुमति मौजूदा कानूनों के तहत सख्ती से दी जाती है। अगर जमीन के वर्गीकरण की अनुमति हो तो गैर-प्रतिबंधित क्षेत्रों में सीमित खुदाई की जांच की जा सकती है, लेकिन आरक्षित वन क्षेत्रों में खुदाई अभी भी मना है।

जैसे-जैसे पारंपरिक और टिकाऊ बर्तनों की मांग बढ़ रही है, नामक्कल के सोपस्टोन कारीगर चेतावनी देते हैं कि केवल पहचान ही पर्याप्त नहीं है। कच्चे माल तक टिकाऊ और कानूनी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक स्पष्ट नीति के बिना, इस जीआई-टैग वाली विरासत कला का भविष्य खतरे में है।

संपादकीय दृष्टिकोण

हमें यह समझना होगा कि भारत की पारंपरिक हस्तकला केवल एक उद्योग नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा है। हमें कारीगरों के मुद्दों को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सोपस्टोन क्या होता है?
सोपस्टोन एक नरम पत्थर है जो कारीगरी के लिए उपयोग किया जाता है।
कारीगरों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है?
कारीगरों को कच्चे माल की कमी और कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
क्या जीआई टैग से कारीगरों की मदद होगी?
जीआई टैग से पहचान बढ़ी है, लेकिन यह कच्चे माल की कमी की समस्या को हल नहीं करता।
सरकार इस मुद्दे पर क्या कर रही है?
सरकार प्रदर्शनियों और वर्कशॉप के जरिए सोपस्टोन के बर्तनों को बढ़ावा दे रही है।
राष्ट्र प्रेस
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