क्या 'मौत' ने कवि को जिंदगी का वरदान दिया? जानें गोपालदास नीरज की कहानी

Click to start listening
क्या 'मौत' ने कवि को जिंदगी का वरदान दिया? जानें गोपालदास नीरज की कहानी

सारांश

क्या आप जानते हैं कि कैसे 'मौत' ने गोपालदास नीरज को जिंदगी का वरदान दिया? इस लेख में जानें इस महान कवि की प्रेरणादायक कहानी और उनके जीवन के अनकहे किस्से।

Key Takeaways

  • गोपालदास नीरज का जीवन संघर्ष और प्रेरणा का प्रतीक है।
  • उनकी कविताएँ प्रेम और जीवन की चुनौतियों को दर्शाती हैं।
  • उन्होंने अपने अनुभवों को कविता के माध्यम से साझा किया।
  • उनका मानना था कि अकेलापन भी जीवन का एक हिस्सा है।
  • नीरज की कहानी हमें संघर्ष और जीवन के महत्व को समझाती है।

नई दिल्ली, 3 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। यह कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की, जिन्हें ‘मौत’ ने लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया और ईश्वर ने उन्हें विशेष कला और हुनर के रूप में अद्भुत उपहार दिए। बात हो रही है कवि और लेखक गोपालदास नीरज की, जिन्हें हिंदी साहित्य में एक काव्य वाचक और गीत लेखक के तौर पर पहचान मिली।

"मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है, आशाओं का संसार नहीं मिलता है। भवसागर में लहरों की आलन से, मैं टकराता फिरता तट के कण-कण से पर मुझे डुबाकर गर्क कहीं तो कर दे, ऐसा भी वज्रधार नहीं मिलता है, मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है।"

इटावा (उत्तर प्रदेश) में 4 जनवरी 1925 को जन्मे गोपालदास नीरज की कविताओं में गहरी भावुकता थी।

बचपन में घर के छज्जे पर चढ़कर जब गोपालदास नीरज अपने गीत सुनाया करते थे, तो घर के बाहर भीड़ जमा हो जाती थी। बच्चे के मन में यह ख्याल आता था कि ईश्वर ने उन्हें एक अद्वितीय प्रतिभा दी है। पिता के देहांत के बाद, बुआ के घर रहकर उन्होंने 1941 में पहली कविता लिखी, उस समय उनकी उम्र केवल 9 वर्ष थी। इस तरह कवि के रूप में गोपालदास नीरज ने अपनी यात्रा की शुरुआत की।

उन्होंने बलवीर सिंह 'रंग' को एक कवि सम्मेलन में सुनकर कवि बनने का सपना देखना शुरू किया। बलवीर सिंह 'रंग' की प्रेरणा ने उन्हें कविता लिखने के लिए उत्साहित किया। एक इंटरव्यू में गोपालदास ने इस किस्से का ज़िक्र किया।

1942 में सरकारी नौकरी के सिलसिले में गोपालदास दिल्ली पहुंचे। एक दिन उन्होंने अखबार में पढ़ा कि यहां एक कवि सम्मेलन होने वाला है। उन्होंने उस कार्यक्रम में पहुंचने के लिए काफी मेहनत की। संयोजक से मिलने पर उन्होंने अपने आपको कवि के रूप में पेश किया।

गोपालदास चाहते थे कि वह उस मंच पर अपनी कविता से सबका दिल जीत लें। उन्होंने पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन संयोजक को उन पर विश्वास नहीं था। अंततः उन्होंने संयोजक को राजी कर लिया, लेकिन शर्त थी कि उन्हें पहले कविता पढ़नी होगी। गोपालदास ने खुशी-खुशी इस चुनौती को स्वीकार किया क्योंकि उन्हें मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल रहा था।

जब वह मंच पर खड़े हुए और अपने मधुर सुरों से कविताओं का आगाज़ किया, तो दर्शक उनकी कविता में डूबते गए। एक गीत के साथ गोपालदास को मंच मिला, और फिर दर्शकों की फरमाइश पर उन्होंने एक के बाद एक कई गीत सुनाए। उन्होंने अपनी सभी लिखी कविताएं सुनाईं, लेकिन तब भी जनता उनकी और कविताएं सुनने की चाहत में थी।

अंत में, उन्होंने अपनी मां से सुने भजन पेश किए, जो उन्हें बचपन में मिले थे। इन भजनों को सुनकर जनता ने उन्हें बहुत प्यार दिया। उस समय एक दर्शक ने उन्हें 5 रुपए का इनाम दिया, जो उस वक्त की एक बड़ी रकम थी।

उन्हें शोहरत, प्यार और यश मिला, लेकिन जीवन के गहरे स्तर पर वह हमेशा अकेला महसूस करते थे। इस अकेलेपन की भावना ने उन्हें हमेशा परेशान किया। तब उन्होंने लिखा,

"चाहे हो दीवाली-होली, चाहे लगे मेले
आए हम अकेले, यहां जाएंगे अकेले।"

गोपालदास नीरज के शब्दों का अर्थ था कि इंसान एक नौका पर चल रहा है, जिस पर कोई लंगर नहीं है, कोई साथी नहीं है और कोई खवैया नहीं है। उनका संदेश था कि हम अकेले आए हैं और अकेले ही जाएंगे।

"इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में।"

आज भी उनके लिए पागल कलियां होती हैं, कोई तो बात है नीरज के गुनगुनाने में।

रूमानी तबीयत के व्यक्ति, जिन्हें यह कहने में कोई संकोच नहीं था कि कवि और कलाकार जो रूमानी नहीं है, वह न तो कवि हो सकता है और न ही कलाकार। रूमानियत एक सौंदर्य और प्रेम के लिए अदम्य प्यास का नाम है। मेरा जीवन भी रूमानी रहा है।

हालांकि, एक समय ऐसा आया जब गोपालदास की मुलाकात असलियत में ‘मौत’ से हुई। उन्होंने बताया, "मैं एक दिन फिल्म का दूसरा शो देखकर लौट रहा था। उस समय म्युनिसिपल बोर्ड की लाइटें जलती थीं। जब मैं अकेला चला आ रहा था, तो मन में डर भी था। डर को दूर करने के लिए मैं गीत गुनगुनाते हुए हल्के कदमों से आगे बढ़ रहा था।"

जब गली के पास पहुंचा, तो जल्दबाजी में एक बुजुर्ग महिला से टकरा गया। उस महिला ने कहा, 'तुझसे क्यों टकराता है, तुझे तो अभी बहुत दिन जीना है।' इस वाक्य ने मुझे चौंका दिया। मैंने सोचा कि इस वाक्य का क्या मतलब है। उस महिला ने मेरी गली में स्थित एक मकान में कदम रखा। जैसे ही वह अंदर गई, तेज रोने की आवाज आई, जैसे कोई मर गया हो। मैं यह देखकर और सुनकर हैरान रह गया।

"मैं उस मकान में गया और देखा कि कुछ लोग एक मरे हुए व्यक्ति को चारपाई से नीचे उतार रहे थे, लेकिन वह बुजुर्ग महिला कहीं नहीं दिखाई दी।"

कवि ने कहा, "मैं समझता हूं कि मृत्यु से यह मेरा पहला साक्षात्कार था। मृत्यु ने मुझे आशीर्वाद दिया कि तुझे अभी बहुत दिनों जीना है। मेरे साथ अनेक घटनाएं हुईं और कई गंभीर एक्सीडेंट हुए, जिनमें कोई भी इंसान बच नहीं सकता था, लेकिन मैं जिंदा रहा। शायद यह उसी मौत का आशीर्वाद था।"

19 जुलाई 2018 को उनका निधन हो गया था।

Point of View

बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि जीवन के संघर्षों में भी एक गूढ़ संदेश छिपा होता है। एक कवि की दृष्टि से देखा जाए तो यह मानव अनुभव का एक अनिवार्य हिस्सा है, और हमें इसे समझने की आवश्यकता है।
NationPress
04/01/2026

Frequently Asked Questions

गोपालदास नीरज कौन थे?
गोपालदास नीरज एक प्रसिद्ध हिंदी कवि और गीतकार थे, जिन्होंने अपने जीवन में कई अद्भुत कविताएं लिखीं।
नीरज की कविताओं का मुख्य विषय क्या था?
नीरज की कविताओं में प्रेम, जीवन की चुनौतियां और मानव अनुभव की गहराई का प्रमुखता से वर्णन किया गया है।
उन्होंने कब और कहाँ पहली कविता लिखी?
गोपालदास नीरज ने 1941 में, जब वह 9वीं कक्षा में थे, अपनी पहली कविता लिखी।
उनका सबसे प्रसिद्ध गीत कौन सा है?
उनका एक प्रसिद्ध गीत है 'में तो हर मोड़ पर तेरा इंतज़ार करूंगा', जो लोगों में बहुत लोकप्रिय है।
गोपालदास नीरज का निधन कब हुआ?
गोपालदास नीरज का निधन 19 जुलाई 2018 को हुआ था।
Nation Press