क्या समाज को लौटाए जाने वाले स्कूलों से सार्थक शैक्षिक सुधार संभव है?: धर्मेंद्र प्रधान

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क्या समाज को लौटाए जाने वाले स्कूलों से सार्थक शैक्षिक सुधार संभव है?: धर्मेंद्र प्रधान

सारांश

क्या स्कूलों को समाज में पुनः स्थापित करने से शैक्षिक सुधार संभव है? केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की अपील, जो बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सामाजिक भागीदारी के महत्व को उजागर करती है। जानें इस विचारशील बैठक में क्या विचार किए गए और भविष्य के लिए क्या योजनाएं हैं।

Key Takeaways

  • समाज को स्कूलों के संचालन में भागीदारी बढ़ानी चाहिए।
  • शिक्षा में सुधार के लिए समग्र शिक्षा का विकास आवश्यक है।
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सभी बच्चों का अधिकार है।

नई दिल्ली, 9 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि सार्थक शैक्षिक सुधार के लिए स्कूलों को एक बार फिर समाज से जोड़ा जाना आवश्यक है। वे नई दिल्ली में समग्र शिक्षा के सभी हितधारकों के साथ आयोजित परामर्श बैठक को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के क्रियान्वयन के पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं और अब देश 2026–27 से समग्र शिक्षा के नए ढांचे की ओर बढ़ने की तैयारी कर रहा है, जो विकसित भारत के विजन के अनुरूप होगा। उन्होंने कहा कि आज सबसे बड़ी चुनौती ऐसा शिक्षा तंत्र और मानव संसाधन तैयार करना है, जो विकसित भारत की आकांक्षाओं के अनुरूप हो।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि देश की बड़ी आबादी को समग्र शिक्षा से काफी उम्मीदें हैं और राज्यों ने शिक्षा के माध्यम से अधिक न्यायसंगत और समावेशी समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण अनुभव और श्रेष्ठ प्रथाएं विकसित की हैं। इन सभी अनुभवों को एक साथ लाकर समग्र शिक्षा को और मजबूत किया जाना चाहिए।

उन्होंने स्कूल शिक्षा के विभिन्न पहलुओं में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें सीखने के परिणामों में सुधार, पोषण स्तर को मजबूत करना, परीक्षा के बोझ को कम करना, सीखने की प्रक्रियाओं को सरल बनाना, कक्षा 12 तक शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित करना, समग्र विद्यालय विकास और प्रौद्योगिकीडिजिटलीकरण का प्रभावी उपयोग शामिल है। उन्होंने कहा कि इन सभी घटकों को ठोस परिणामों में बदलने के लिए स्कूलों को फिर से समाज को लौटाना होगा।

समुदाय की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि व्यवस्था और वेतन की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए, लेकिन स्कूलों के संचालन और स्वामित्व में समाज की भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे समग्र शिक्षा के नए ढांचे की ओर बढ़ा जा रहा है, इस दिशा में सामूहिक रूप से विचार करना होगा।

बैठक में समग्र शिक्षा की भविष्य की दिशा पर चर्चा की गई, ताकि यह ढांचा देश के शैक्षिक और विकासात्मक लक्ष्यों के अनुरूप प्रभावी रूप से आगे बढ़ सके।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा 2047 तक विकसित भारत का जो विजन दिया गया है, वह तभी साकार होगा जब देश के प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और कक्षा 12 तक शत-प्रतिशत नामांकन सुनिश्चित किया जाए।

सीखने की खाइयों को कम करना, ड्रॉपआउट घटाना, सीखने और पोषण के परिणामों में सुधार, शिक्षकों की क्षमता निर्माण, बच्चों में डिजाइन थिंकिंग और आलोचनात्मक कौशल का विकास, अमृत पीढ़ी को मैकाले मानसिकता से बाहर लाना और विकसित भारत के लिए मजबूत मानव पूंजी तैयार करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने शैक्षणिक विशेषज्ञों, विभिन्न मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से अपील की कि वे शैक्षणिक सत्र 2026–27 के लिए एक समग्र वार्षिक योजना तैयार करें और इसे एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दें।

Point of View

यह स्पष्ट है कि शिक्षा को समाज से जोड़ना न केवल एक आवश्यकता है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी भी है। स्कूलों का संचालन और उनकी गुणवत्ता में सुधार के लिए सामूहिक प्रयास होना आवश्यक है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है।
NationPress
10/01/2026

Frequently Asked Questions

क्या समाज को स्कूलों में भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है?
हाँ, समाज की भागीदारी से स्कूलों की गुणवत्ता और शिक्षा प्रणाली में सुधार संभव है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का महत्व क्या है?
यह नीति शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सुधार और विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
क्यों जरूरी है बच्चों का कक्षा 12 तक शत-प्रतिशत नामांकन?
यह सुनिश्चित करता है कि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले और वे अपने भविष्य के लिए तैयार हों।
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