मां कुरैसुनी मंदिर, ओडिशा: साल भर होती है पीठ की पूजा, दुर्गाष्टमी पर मिलते हैं दुर्लभ मुख के दर्शन

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मां कुरैसुनी मंदिर, ओडिशा: साल भर होती है पीठ की पूजा, दुर्गाष्टमी पर मिलते हैं दुर्लभ मुख के दर्शन

सारांश

ओडिशा के गंजम जिले का मां कुरैसुनी मंदिर एक ऐसी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है, जहां साल भर देवी की पीठ की पूजा होती है और केवल आश्विन माह की दुर्गाष्टमी को मुख के दुर्लभ दर्शन होते हैं। 1900 के दशक में सुरंगी के राजा द्वारा निर्मित यह मंदिर देश के सबसे रहस्यमयी और कम ज्ञात तीर्थस्थलों में से एक है।

Key Takeaways

मां कुरैसुनी मंदिर ओडिशा के गंजम जिले के नुवागाड़ा गांव , पात्रपुर ब्लॉक में स्थित है। यहां साल के 365 दिन देवी मां की पीठ की पूजा होती है — मुख की पूजा नहीं। केवल आश्विन महीने की दुर्गाष्टमी को मां के मुख के दुर्लभ दर्शन होते हैं। मंदिर का निर्माण सुरंगी के राजा ने 1900 के दशक के आरंभ में करवाया था। मंदिर परिसर में इच्छापूर्ति पेड़ है, जहां भक्त लाल चुनरी बांधते हैं। मंदिर की स्थापत्य शैली दक्षिण भारतीय परंपरा से प्रेरित है।

ओडिशा के गंजम जिले के पात्रपुर ब्लॉक में नुवागाड़ा गांव में स्थित मां कुरैसुनी मंदिर एक ऐसी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है, जो इसे देशभर के अन्य शक्तिपीठों और सिद्धपीठों से अलग करती है — यहां साल के 365 दिन देवी मां की पीठ की पूजा की जाती है, और केवल आश्विन महीने की दुर्गाष्टमी को भक्तों को मां के मुख के दुर्लभ दर्शन प्राप्त होते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां के दर्शन मात्र से दुखों से मुक्ति मिलती है और मुख के दर्शन से हर मनोकामना पूरी होती है।

मंदिर का इतिहास और स्थापत्य

स्थानीय पुजारी दीनबंधु जानी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण सुरंगी के राजा ने 1900 के दशक के आरंभ में करवाया था। मंदिर की स्थापत्य शैली दक्षिण भारतीय परंपरा से प्रेरित है — रंग-बिरंगे गोपुरम पर अनेक देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। चारों ओर घने जंगल और हरियाली से घिरा यह मंदिर प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम है।

अनूठी पूजा परंपरा

यह मंदिर अपनी उस विलक्षण परंपरा के कारण विशेष महत्व रखता है, जिसमें देवी की पीठ को वर्षभर पूजा जाता है। आश्विन महीने की दुर्गाष्टमी — जो वर्ष में केवल एक बार आती है — उस दिन मां के मुख के दर्शन होते हैं, जिसे अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायी माना जाता है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश के अधिकांश मंदिरों में मूर्ति के मुख की पूजा ही प्रमुख होती है।

मंदिर परिसर की विशेषताएं

मंदिर के प्रांगण में मां काली को समर्पित कई प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिनमें मां अपने रौद्र रूप में विराजमान हैं। मंदिर के बाहर एक विशेष वृक्ष है, जिसे स्थानीय लोग इच्छापूर्ति पेड़ कहते हैं। भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने की आस में इस पेड़ पर लाल रंग की चुनरी बांधते हैं। मंदिर परिसर का समग्र वातावरण आत्मिक शांति प्रदान करने वाला है।

आस्था और पहुंच

स्थानीय लोगों के बीच इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है और त्योहारों तथा शुभ अवसरों पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। गौरतलब है कि बाहरी राज्यों से आने वाले श्रद्धालु अक्सर इस मंदिर की जानकारी के अभाव में इसके दर्शन से वंचित रह जाते हैं। यह मंदिर उन अनगिनत रहस्यमयी और चमत्कारी तीर्थस्थलों में से एक है, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को संजोए हुए हैं।

मां कुरैसुनी मंदिर की यह अनूठी परंपरा और प्राकृतिक परिवेश इसे एक ऐसा तीर्थ बनाते हैं, जो न केवल आस्था बल्कि जिज्ञासा और शोध की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

Point of View

तब ओडिशा के गंजम जैसे दूरदराज़ जिलों में ऐसे मंदिर अपनी मौलिकता और रहस्य को बचाए हुए हैं। यह भी विचारणीय है कि बाहरी राज्यों के श्रद्धालु जानकारी के अभाव में इस अनुभव से वंचित रह जाते हैं — जो सरकार और पर्यटन विभाग की सांस्कृतिक धरोहर प्रचार नीति पर सवाल उठाता है।
NationPress
01/05/2026

Frequently Asked Questions

मां कुरैसुनी मंदिर कहां स्थित है?
मां कुरैसुनी मंदिर ओडिशा के गंजम जिले के पात्रपुर ब्लॉक में नुवागाड़ा गांव में स्थित है। यह मंदिर घने जंगल और हरियाली से घिरे प्राकृतिक परिवेश में है।
इस मंदिर में पीठ की पूजा क्यों होती है?
स्थानीय परंपरा और मान्यता के अनुसार, इस मंदिर में साल भर देवी मां की पीठ की पूजा की जाती है। यह परंपरा इस मंदिर को देश के अन्य शक्तिपीठों और सिद्धपीठों से अलग और विशिष्ट बनाती है।
मां के मुख के दर्शन कब होते हैं?
केवल आश्विन महीने की दुर्गाष्टमी को साल में एक बार मां के मुख के दुर्लभ दर्शन होते हैं। इस अवसर को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है और भक्तों की मान्यता है कि इस दर्शन से हर मनोकामना पूरी होती है।
मां कुरैसुनी मंदिर का निर्माण किसने करवाया था?
स्थानीय पुजारी दीनबंधु जानी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण सुरंगी के राजा ने 1900 के दशक के आरंभ में करवाया था। मंदिर की स्थापत्य शैली दक्षिण भारतीय परंपरा से प्रेरित है।
मंदिर में इच्छापूर्ति पेड़ क्या है?
मंदिर के बाहर एक विशेष वृक्ष है जिसे इच्छापूर्ति पेड़ कहा जाता है। भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने की आस में इस पेड़ पर लाल रंग की चुनरी बांधते हैं।
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