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उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम 2025: मदरसा बोर्ड समाप्त, सभी 6 अल्पसंख्यक समुदायों को समान शिक्षा अधिकार

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उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम 2025: मदरसा बोर्ड समाप्त, सभी 6 अल्पसंख्यक समुदायों को समान शिक्षा अधिकार

सारांश

उत्तराखंड ने मदरसा बोर्ड कानून समाप्त कर एक नया इतिहास रचा — सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों को समान शिक्षा अधिकार देने वाला देश का पहला राज्य बना। 20 अगस्त 2025 को पारित यह अधिनियम वोट बैंक की राजनीति पर सीधा प्रहार है और गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा को धार्मिक पहचान से ऊपर रखता है।

मुख्य बातें

उत्तराखंड विधानसभा ने 20 अगस्त 2025 को उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2025 पारित किया।
उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और संबंधित विनियम 1 जुलाई 2026 से समाप्त होंगे।
नया अधिनियम मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन — सभी 6 अल्पसंख्यक समुदायों पर समान रूप से लागू होगा।
अध्ययन में पाया गया कि कुल मुस्लिम छात्रों में से मात्र लगभग 4 प्रतिशत ही मदरसों में पढ़ते हैं, और मदरसों से कोई भी छात्र आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सका।
नए अधिनियम के तहत उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाएगा।
मान्यता के लिए संस्थान का उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से संबद्ध होना अनिवार्य होगा।

उत्तराखंड विधानसभा ने 20 अगस्त 2025 को उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम, 2025 पारित किया, जिसके तहत राज्य में केवल मुस्लिम समुदाय के लिए बने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और उत्तराखंड गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता विनियम, 2019 को 1 जुलाई 2026 से समाप्त किया जाएगा। इस अधिनियम के साथ उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा कानून लाने वाला देश का पहला राज्य बन गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों — मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन — को समान रूप से लागू होता है।

पृष्ठभूमि: मदरसा शिक्षा की स्थिति और समिति का गठन

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 5 जून 2025 को एक रणनीतिक सलाहकार समिति का गठन किया, जिसकी पहली बैठक में प्रदेश की भावी पीढ़ी को गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया। समिति के सदस्य सचिव भर्तृघ्न सिंह और अन्य सदस्यों ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमूम कासमी तथा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते से राज्य में चल रहे मदरसों की वस्तुस्थिति की जानकारी ली।

अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश मदरसे उत्तराखंड मदरसा बोर्ड से मान्यता के बिना संचालित हो रहे थे और मान्यता प्राप्त मदरसों में भी शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता की शर्त पूरी नहीं होती थी। आँकड़ों के अनुसार, कुल विद्यालय जाने वाले मुस्लिम छात्र-छात्राओं में से मात्र लगभग 4 प्रतिशत ही मदरसों में पढ़ने जाते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि मदरसों से शिक्षा प्राप्त कोई भी छात्र-छात्रा आईएएस, आईपीएस, डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सका।

संवैधानिक आधार और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

समिति ने टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य, 2002 तथा पीए इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2005 के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों का गहन अध्ययन किया। 11 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 2002 के निर्णय में स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक संस्थानों का प्रशासनिक अधिकार मौलिक अधिकार है और राज्य केवल उचित विनियमन कर सकता है, जिससे शैक्षणिक उत्कृष्टता बनी रहे, परंतु अल्पसंख्यक चरित्र प्रभावित न हो। 2005 के निर्णय में न्यायालय ने कहा कि निजी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर आरक्षण या कोटा लागू नहीं किया जा सकता।

इन्हीं निर्णयों के आलोक में समिति ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान विधेयक, 2025 तैयार किया, जिसे 17 अगस्त 2025 को मंत्रिमंडल की बैठक में विधानसभा में पेश करने हेतु पारित किया गया। मंत्रिमंडल ने कुछ अधिकारियों की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए यह निर्णय लिया।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान

नए अधिनियम के अंतर्गत उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाएगा। किसी संस्थान को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान की मान्यता तभी दी जाएगी जब वह उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से संबद्ध हो, सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1880 अथवा भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 अथवा कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के अंतर्गत पंजीकृत हो, और उसके सभी वित्तीय लेन-देन बैंक खाते के माध्यम से हों।

अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि कोई भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अपने छात्रों या कर्मचारियों को किसी धार्मिक गतिविधि में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं करेगा और ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव के मार्ग में बाधा उत्पन्न करे। सरकारी विनियमन की सीमा केवल शैक्षणिक मानक, पारदर्शिता और छात्र हित तक सीमित रखी गई है।

मान्यता प्राप्त संस्थान, परिषद द्वारा अनुमत विषयों के अतिरिक्त, अपने धर्म से संबंधित विशिष्ट अतिरिक्त विषय भी पढ़ा सकेंगे, जो प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप होंगे।

वोट बैंक की राजनीति का अंत

गौरतलब है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 तथा 2014 के संशोधन के बाद संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत छह अल्पसंख्यक समुदायों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं, परंतु विभिन्न राज्य सरकारों ने वोट बैंक की राजनीति के चलते केवल मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों के लिए विशेष कानून बनाए और अन्य पाँच अल्पसंख्यक समुदायों को उपेक्षित छोड़ दिया। नया अधिनियम इसी असंतुलन को दूर करता है।

आगे की राह

उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और संबंधित विनियम वर्तमान शैक्षणिक सत्र की समाप्ति के उपरांत 1 जुलाई 2026 को औपचारिक रूप से समाप्त हो जाएंगे। इस अधिनियम का सही क्रियान्वयन न केवल अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा से जोड़ेगा, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक शिक्षा नीति के लिए एक नया प्रतिमान स्थापित कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

अन्यथा यह कानून कागज़ पर ही सुधार बनकर रह जाएगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि मात्र 4 प्रतिशत मुस्लिम छात्रों के मदरसों में होने के बावजूद उनका समाज पर प्रभाव असंगत रूप से अधिक रहा है — यह तथ्य शिक्षा की गुणवत्ता से कहीं गहरे सामाजिक प्रश्न उठाता है जिन्हें केवल कानून से नहीं सुलझाया जा सकता।
RashtraPress
9 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अधिनियम 2025 क्या है?
यह 20 अगस्त 2025 को उत्तराखंड विधानसभा द्वारा पारित एक ऐतिहासिक कानून है, जो राज्य में सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों — मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन — को समान शैक्षणिक अधिकार प्रदान करता है। यह अधिनियम पुराने मदरसा बोर्ड कानून की जगह लेता है और गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा को प्राथमिकता देता है।
उत्तराखंड मदरसा बोर्ड अधिनियम कब समाप्त होगा?
उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और उत्तराखंड गैर-सरकारी अरबी और फारसी मदरसा मान्यता विनियम, 2019 वर्तमान शैक्षणिक सत्र की समाप्ति के उपरांत 1 जुलाई 2026 को औपचारिक रूप से समाप्त हो जाएंगे।
नए अधिनियम में मान्यता के लिए क्या शर्तें हैं?
मान्यता के लिए संस्थान का उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से संबद्ध होना, सोसायटी/न्यास/कंपनी के रूप में पंजीकृत होना, सभी वित्तीय लेन-देन बैंक खाते के माध्यम से करना और शासी निकाय का अधिकांशतः संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों से बना होना अनिवार्य है। साथ ही संस्थान ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो सांप्रदायिक सद्भाव के मार्ग में बाधा उत्पन्न करे।
क्या नए अधिनियम के तहत धार्मिक विषय पढ़ाए जा सकेंगे?
हाँ, मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान परिषद द्वारा अनुमत विषयों के अतिरिक्त अपने धर्म से संबंधित विशिष्ट अतिरिक्त विषय भी पढ़ा सकेंगे, परंतु ये प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मानकों और विषय सामग्री के अनुरूप होने चाहिए। इन अतिरिक्त विषयों के लिए अलग प्रमाण पत्र भी जारी किया जाएगा।
यह अधिनियम वोट बैंक की राजनीति को कैसे समाप्त करता है?
अब तक विभिन्न राज्य सरकारों ने संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद केवल मुस्लिम समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों के लिए विशेष कानून बनाए थे और अन्य पाँच अल्पसंख्यक समुदायों को उपेक्षित छोड़ दिया था। नया अधिनियम सभी छह समुदायों को समान दर्जा देकर इस असंतुलन को दूर करता है।
राष्ट्र प्रेस
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