19 अक्टूबर 2026
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महानवमी 2026: प्रयागराज की मां अलोप शंकरी शक्तिपीठ में भोर से श्रद्धालुओं का जनसैलाब

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महानवमी 2026: प्रयागराज की मां अलोप शंकरी शक्तिपीठ में भोर से श्रद्धालुओं का जनसैलाब

सारांश

शारदीय नवरात्र की महानवमी पर प्रयागराज के अलोपीबाग स्थित मां अलोप शंकरी शक्तिपीठ में भोर से ही श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। 51 शक्तिपीठों में 14वें स्थान पर दर्ज इस अनूठे मंदिर में मूर्ति नहीं, बल्कि पवित्र खटोले की पूजा होती है — यही विशेषता इसे देश के बाकी देवी मंदिरों से अलग पहचान देती है।

मुख्य बातें

महानवमी, 19 अक्टूबर 2026 को प्रयागराज के मां अलोप शंकरी मंदिर में भोर 4 बजे कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं।
इस शक्तिपीठ में देवी की मूर्ति नहीं, बल्कि एक पवित्र खटोले की पूजा की जाती है — जो इसे 51 शक्तिपीठों में अद्वितीय बनाता है।
संत मनसुख गिरि महाराज के अनुसार यह स्थान 51 शक्तिपीठों में 14वें स्थान पर 'महादेवीश्वरी' के नाम से दर्ज है।
महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ कन्या पूजन और भंडारे का भी आयोजन हुआ।
भारी भीड़ के मद्देनज़र मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में कड़े सुरक्षा प्रबंध किए गए।

शारदीय नवरात्र की महानवमी पर 19 अक्टूबर 2026 को प्रयागराज के अलोपीबाग स्थित ऐतिहासिक मां अलोप शंकरी शक्तिपीठ में आस्था का अपार सैलाब उमड़ पड़ा। भोर में चार बजे मंदिर के कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं और दर्शन-पूजन का सिलसिला बिना रुके जारी रहा।

मंगला आरती से शुरू हुआ पूजन का क्रम

महानवमी के प्रभात में मां अलोप शंकरी की मंगला आरती के साथ ही पूजन-अर्चन की शुरुआत हुई। पूरा मंदिर परिसर 'जय माता दी' और 'हर-हर महादेव' के उद्घोषों से गूंजता रहा। दूर-दराज के क्षेत्रों से आए श्रद्धालु लाल चुनरी, नारियल, फूल-माला और रोली अर्पित कर विधि-विधान से पूजा कर रहे थे। कई भक्त नंगे पांव हाथों में लाल ध्वज लेकर भजन गाते हुए मंदिर तक पहुंचे।

महानवमी का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में महानवमी शारदीय नवरात्र का नौवाँ और सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सच्चे मन से की गई आराधना से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख, शांति व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इसी आस्था के वशीभूत होकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के चरणों में शीश झुकाने पहुंचे।

अनूठी परंपरा — मूर्ति नहीं, पवित्र खटोले की होती है पूजा

मां अलोप शंकरी मंदिर की एक विशिष्ट पहचान यह है कि यहाँ देवी की पारंपरिक मूर्ति की जगह एक पवित्र खटोले की पूजा की जाती है, जो इस शक्तिपीठ को देश के अन्य देवी मंदिरों से बिल्कुल अलग बनाती है। मंदिर के संत मनसुख गिरि महाराज ने बताया, 'यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहीं पर माता सती के दाहिने हाथ की उंगलियों के आभूषण गिरे थे। 51 शक्तिपीठों की सूची में इसे 14वें नाम 'महादेवीश्वरी' के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्र में रात के समय की जाने वाली पूजा का उद्देश्य आध्यात्मिक सिद्धियां और महादेव से शक्ति प्राप्त करना होता है।'

कन्या पूजन और विशेष अनुष्ठान

महानवमी पर मंदिर में दर्शन-पूजन के साथ-साथ कन्या पूजन का भी आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने कन्याओं का पूजन कर उन्हें भोजन कराया और मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त किया। बुजुर्गों और दिव्यांग भक्तों का उत्साह भी उल्लेखनीय रहा — कई परिजनों के सहारे मंदिर पहुंचे और माता के दर्शन किए।

सुरक्षा के कड़े प्रबंध

भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया कि श्रद्धालु सुचारु और सुरक्षित तरीके से दर्शन-पूजन कर सकें। आस्था और भक्ति के इस महापर्व की समाप्ति के बाद विजयादशमी (दशहरा) का पर्व पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मां अलोप शंकरी मंदिर प्रयागराज कहाँ स्थित है और यह क्यों प्रसिद्ध है?
मां अलोप शंकरी मंदिर प्रयागराज के अलोपीबाग क्षेत्र में स्थित है और यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। इसे 'महादेवीश्वरी' के नाम से भी जाना जाता है तथा यहाँ देवी की प्रतिमा के स्थान पर एक पवित्र खटोले की पूजा की जाती है, जो इसे अन्य देवी मंदिरों से अलग बनाती है।
महानवमी पर मां अलोप शंकरी मंदिर में दर्शन का समय क्या रहता है?
महानवमी के अवसर पर मंदिर के कपाट भोर में 4 बजे खोले जाते हैं। इसके बाद मंगला आरती से पूजन-दर्शन का क्रम शुरू होता है जो दिनभर निर्बाध जारी रहता है।
51 शक्तिपीठों में मां अलोप शंकरी का क्या महत्व है?
संत मनसुख गिरि महाराज के अनुसार, 51 शक्तिपीठों की सूची में यह स्थान 14वें नाम 'महादेवीश्वरी' के रूप में दर्ज है। मान्यता है कि यहीं माता सती के दाहिने हाथ की उंगलियों के आभूषण गिरे थे।
महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की पूजा क्यों की जाती है?
शारदीय नवरात्र के नौवें दिन को महानवमी कहा जाता है और इस दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से आराधना करने वाले भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख व समृद्धि आती है।
मां अलोप शंकरी मंदिर में खटोले की पूजा की परंपरा क्या है?
इस शक्तिपीठ की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ देवी की पारंपरिक मूर्ति नहीं है — उसके स्थान पर एक पवित्र खटोले की पूजा की जाती है। यही परंपरा इस मंदिर को देश के अन्य देवी मंदिरों से विशिष्ट पहचान दिलाती है।
राष्ट्र प्रेस
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