क्या मकर संक्रांति के अवसर पर मां मुंडेश्वरी मंदिर में विशेष पूजा होती है?
सारांश
Key Takeaways
- मां मुंडेश्वरी मंदिर प्राचीन एवं अद्भुत वास्तुकला का उदाहरण है।
- मकर संक्रांति पर विशेष पूजा का आयोजन होता है।
- मंदिर में रक्तहीन बलि चढ़ाई जाती है।
- यहां दूर-दूर से भक्त आते हैं।
- मंदिर को शक्ति और प्रकृति का संगम माना जाता है।
नई दिल्ली, ७ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मकर संक्रांति देशभर में १४ जनवरी को मनाई जाएगी और इस अवसर पर मंदिरों में तैयारियाँ जोरों पर हैं। बिहार में एक ऐसा मंदिर है, जहां विशेष पूजा का आयोजन होता है और भक्तों के लिए भव्य मेला भी सजाया जाता है।
हम बात कर रहे हैं मां मुंडेश्वरी मंदिर की, जिसकी विरासत और वास्तुकला दोनों ही अद्वितीय हैं।
मां मुंडेश्वरी मंदिर, जो देश के प्राचीन मंदिरों में से एक है, में मकर संक्रांति के दिन विशेष पूजा होती है। इस दिन भक्त मां मुंडेश्वरी और भगवान शिव की एक साथ अराधना करते हैं। इस अवसर पर तिलकुट, तिलवा, दही-चूड़ा और खिचड़ी जैसी चीजें भगवान को अर्पित की जाती हैं। भक्तों को भी ये प्रसाद स्वरूप दिया जाता है। मकर संक्रांति पर इस मंदिर में बड़ा मेला लगता है, जहां दूर-दूर से भक्त मां का आशीर्वाद लेने आते हैं और मेले का आनंद लेते हैं।
मां मुंडेश्वरी मंदिर पंवरा पहाड़ी के शिखर पर स्थित एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण लगभग १०८ ईस्वी में हुआ था। मंदिर की बनावट और वास्तुकला अद्भुत हैं, जो उत्तरगुप्तकालीन शिल्पशैली को प्रदर्शित करती हैं। यह एक पत्थर से बना हुआ अष्टकोणीय मंदिर है, जहां मां की प्रतिमा भी पत्थर की बनी हुई है। विशेष बात यह है कि मां की प्रतिमा आठभुजी है, जो शक्ति, सुरक्षा और सिद्धि का प्रतीक मानी जाती है। कहा जाता है कि मां के दर्शन मात्र से ही सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
मंदिर में मां अकेली नहीं हैं, बल्कि भगवान शिव भी बड़े शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। विशेष रूप से मकर संक्रांति के दिन मां और बाबा भोलेनाथ की पूजा की जाती है। भक्त दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर को शक्ति और प्रकृति का संगम माना जाता है, जहां शिव और शक्ति एक साथ विराजमान हैं।
नवरात्रि और शिवरात्रि के अवसर पर भी यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है। हजारों भक्त पहाड़ी चढ़कर मां के दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर की एक विशेषता यह है कि यहां रक्तहीन बलि चढ़ाई जाती है। मनोकामना पूरी होने पर बकरे की बलि चढ़ाई जाती है, लेकिन रक्त नहीं निकलता है। पुजारी पशु पर अक्षत छिड़कते हैं और पशु बेहोश हो जाता है, फिर थोड़ी देर बाद खुद उठकर मंदिर प्रांगण से बाहर चला जाता है। इसे ही रक्तहीन बलि कहा जाता है।