मंदिरों में प्रदक्षिणा की क्लॉकवाइज दिशा: अध्यात्म और विज्ञान का संगम
सारांश
Key Takeaways
- क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक भी है।
- गीले कपड़ों में प्रदक्षिणा करने से ऊर्जा का अवशोषण बेहतर होता है।
- हर मंदिर में जल कुंड का होना आवश्यक है।
- प्रदक्षिणा की संख्या देवताओं के अनुसार भिन्न होती है।
- यह प्रक्रिया मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा लाती है।
नई दिल्ली, 5 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। मंदिरों में घड़ी की सुई की दिशा में अर्थात् क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा या परिक्रमा का चलन प्राचीन काल से चला आ रहा है। इसे केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है। मंदिर का गर्भगृह एक शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र होता है।
क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा करना एक रिवाज के साथ-साथ धरती की प्राकृतिक ऊर्जा दिशा के साथ सामंजस्य स्थापित करने का वैज्ञानिक तरीका है। सही तरीके से की गई प्रदक्षिणा व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाती है। इस प्रकार की परिक्रमा करने से व्यक्ति को शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है। इस प्रक्रिया से ब्रह्मांडीय ऊर्जा शरीर में आसानी से समाहित हो जाती है, जिससे मानसिक शांति, शारीरिक ऊर्जा और आत्मिक विकास संभव होता है।
क्लॉकवाइज परिक्रमा के पीछे एक वैज्ञानिक सिद्धांत भी है। इस विषय पर ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सदगुरु जगदीश वासुदेव विस्तार से जानकारी देते हैं। उत्तरी गोलार्ध में प्रदक्षिणा घड़ी की सुई की दिशा में की जाती है, क्योंकि यह पृथ्वी की प्राकृतिक ऊर्जा प्रवाह के अनुकूल है। उदाहरण के लिए, जब हम नल की टोंटी खोलते हैं तो पानी उत्तरी गोलार्ध में हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में बहता है। यदि हम दक्षिणी गोलार्ध में जाएं, तो पानी उल्टी दिशा में बहता है। इसी तरह, ऊर्जा तंत्र काम करता है। जब कोई शक्ति स्थान (मंदिर) हो, तो वहां की ऊर्जा को सही तरीके से ग्रहण करने के लिए क्लॉकवाइज परिक्रमा करनी चाहिए। सदगुरु का कहना है कि इससे शरीर ऊर्जा को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है।
धर्म शास्त्रों के अनुसार, परिक्रमा के समय यदि बाल गीले हों तो ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है। और अधिक लाभ तब मिलता है जब व्यक्ति गीले कपड़ों में परिक्रमा करता है। गीले कपड़े शरीर को लंबे समय तक नम रखते हैं, जिससे ऊर्जा का अवशोषण होता है। गीले कपड़ों के साथ परिक्रमा करना अधिक व्यावहारिक है क्योंकि इससे शरीर जल्दी सूखता है।
आपको ध्यान देना चाहिए कि हर मंदिर में एक जल कुंड या कुआं होता है, जिसे कल्याणजी कहा जाता है। परंपरागत रूप से पहले कल्याणी में स्नान कर गीले कपड़ों में मंदिर की प्रदक्षिणा की जाती थी। इससे मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा को सर्वोत्तम रूप से ग्रहण किया जा सकता था। आजकल अधिकतर कल्याणियां सूख चुकी हैं या गंदगी में बदल गई हैं, जिसके कारण यह परंपरा कम हुई है।
मंदिरों में विभिन्न देवताओं की परिक्रमा संख्या भी अलग-अलग होती है। धर्मशास्त्र के अनुसार, गणेश जी की तीन बार, विष्णु जी की चार बार, देवी दुर्गा की एक बार और भगवान शिव की आधी परिक्रमा या जलधारी तक करने की परंपरा है। यह नियम ऊर्जा संतुलन और भक्ति के अनुसार बने हैं।