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होलिका दहन की अनोखी परंपरा: मथुरा के फालैन गांव की सच्चाई

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होलिका दहन की अनोखी परंपरा: मथुरा के फालैन गांव की सच्चाई

सारांश

फालैन गांव की अनोखी होलिका दहन परंपरा, जो निडर पुजारियों और प्रह्लाद की भक्ति की कहानी सुनाती है। यह सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। जानें कैसे ग्रामीण इसे श्रद्धा से मनाते हैं।

मुख्य बातें

फालैन गांव की होलिका दहन परंपरा सदियों पुरानी है।
पुजारी प्रह्लाद की आस्था का प्रदर्शन करते हैं।
यह परंपरा भक्ति और विश्वास का प्रतीक है।
कोई भी पुजारी आज तक घायल नहीं हुआ है।
होलिका दहन की तैयारी ४५ दिन पहले शुरू होती है।

मथुरा, २३ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। रंगों का उत्सव होली ब्रज क्षेत्र में फुलेरा दूज से शुरू हो चुका है। फूलों की होली, लठमार होली, और लड्डू की होली सभी का दिल जीत लेती हैं। इसके साथ ही, कृष्ण नगरी मथुरा के फालैन गांव में एक विशेष परंपरा देखने को मिलती है, जहां के निवासी सदियों से चल रही परंपरा को भक्ति और विश्वास के साथ निभाते हैं।

मथुरा जिले के फालैन गांव में सदियों पुरानी होलिका दहन की परंपरा आज भी जीवित है, जो भक्त प्रह्लाद की आस्था और अग्नि परीक्षा की याद दिलाती है। इस गांव को 'प्रह्लाद की नगरी' भी कहा जाता है, और यहां होलिका दहन केवल अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, तपस्या, और साहस का उदाहरण भी है।

उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, फालैन गांव का होलिका दहन एक अद्भुत आस्था का उत्सव है। होलिका दहन से लगभग ४५ दिन पहले गांव का पुजारी कठोर व्रत, तप, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि-शयन और विशेष अनुष्ठान आरंभ करता है। प्रह्लाद मंदिर में रहकर वह दिन में एक बार भोजन करता है और सात्विक जीवन जीता है।

इसके बाद, होलिका दहन की रात, प्रह्लाद कुंड में स्नान और पूजा के बाद विशाल होलिका को प्रज्वलित किया जाता है। जब आग प्रचंड रूप ले लेती है और अंगारे दहकने लगते हैं, तब पुजारी नंगे पैर, निडर होकर जलती हुई होलिका के बीच से गुजरता है या दौड़ लगाता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास होता है।

यह परंपरा सतयुग से चली आ रही मानी जाती है, जो भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी से जुड़ी है। होलिका ने प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, लेकिन प्रह्लाद की आस्था से वह स्वयं जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। फालैन में पुजारी इसी घटना का जीवंत रूप निभाते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि सदियों से यह परंपरा चल रही है और कोई भी पुजारी कभी घायल नहीं हुआ।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह भक्ति, विश्वास और साहस का जीवंत उदाहरण भी है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखती है।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फालैन गांव में होलिका दहन कब होता है?
फालैन गांव में होलिका दहन होली के दिन से लगभग ४५ दिन पहले की तैयारी शुरू होती है।
क्या फालैन गांव की परंपरा पुरानी है?
हां, फालैन गांव की होलिका दहन की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है।
पुजारी जलती आग पर क्यों चलते हैं?
पुजारी जलती आग पर चलते हैं ताकि भक्त प्रह्लाद की आस्था और साहस को दर्शा सकें।
क्या किसी पुजारी को चोट लगी है?
गाँव वालों का दावा है कि सदियों से कोई भी पुजारी कभी घायल नहीं हुआ।
फालैन गांव की होलिका दहन की विशेषता क्या है?
यह परंपरा भक्ति, विश्वास और साहस का अद्भुत उदाहरण है।
राष्ट्र प्रेस
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