अरशद मदनी का आरोप: मुसलमानों और मदरसों को राजनीतिक स्वार्थ के लिए बनाया जा रहा है निशाना
सारांश
मुख्य बातें
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरशद मदनी ने 6 अगस्त 2026 को आरोप लगाया कि मुसलमानों और उनके शैक्षणिक संस्थानों — विशेषकर मदरसों — को चुनावी और राजनीतिक लाभ के लिए बार-बार निशाना बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, इस तरह के बयान 'सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा' हैं और भारत की संवैधानिक नींव को कमज़ोर करते हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के उस बयान से भड़का, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मदरसे 'अनौपचारिक रूप से आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं' और वहाँ पढ़ने वाले छात्रों में 'आतंकवादी जैसी सोच' विकसित होती है।
मौर्य ने यह टिप्पणी तब की जब उन्होंने निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की उस माँग का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने मदरसों को 'जिहादी फ़ैक्टरी' बताते हुए उन पर प्रतिबंध लगाने की अपील की थी।
मदनी की तीखी प्रतिक्रिया
मदनी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट कर इन आरोपों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने लिखा, 'मदरसों को आतंकवाद का केंद्र बताना सांप्रदायिकता और पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा है।'
उन्होंने आलोचकों पर ऐतिहासिक प्रश्न उठाते हुए कहा, 'यह बहुत अजीब बात है कि जिन लोगों के राजनीतिक पूर्वजों ने भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजों से माफी माँगी थी, वे ही अब मदरसों को आतंकवाद के केंद्र के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।'
मदरसों पर बेबुनियाद आरोपों का सिलसिला
मदनी ने आरोप लगाया कि मदरसों के पाठ्यक्रम और देशभक्ति पर सवाल उठाने से लेकर उन्हें 'आतंकवाद के प्रजनन स्थल' के रूप में प्रस्तुत करने तक — यह एक सुनियोजित नैरेटिव है। उनके शब्दों में, 'ऐसे आख्यानों का उद्देश्य नफरत और अविश्वास फैलाना है।'
गौरतलब है कि मदरसा शिक्षा और उसकी प्रासंगिकता को लेकर यह कोई पहली बार नहीं है जब राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ी हो। उत्तर प्रदेश सरकार पिछले कुछ वर्षों में मदरसा पाठ्यक्रम में सुधार और सर्वेक्षण जैसे कदम उठा चुकी है, जिसे अल्पसंख्यक संगठन लगातार चुनौती देते रहे हैं।
संवैधानिक मूल्यों की दुहाई
जमीयत प्रमुख ने ज़ोर देकर कहा कि ऐसे बयान देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए घातक हैं। उन्होंने कहा, 'ये गैर-जिम्मेदाराना बयान एक खतरनाक सोच को दर्शाते हैं, जो सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खतरा हैं और भारत की एकता व संवैधानिक मूल्यों को कमज़ोर करते हैं।'
आगे क्या
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब देश में अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और उनकी निगरानी को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहसें तेज़ हो रही हैं। मदनी के बयान के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएँ आने की संभावना है, जो आने वाले दिनों में इस विमर्श को और गहरा कर सकती हैं।