अरशद मदनी का बड़ा बयान: 'देश को वैचारिक राष्ट्र बनाने की साजिश, मुसलमान कभी नहीं झुकेगा'
सारांश
मुख्य बातें
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने 18 मई 2025 को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर जारी घोषणापत्र में आरोप लगाया कि भारत को योजनाबद्ध तरीके से एक वैचारिक राष्ट्र में बदलने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि पहले केवल मुसलमान निशाने पर थे, लेकिन अब इस्लाम को भी सीधे निशाना बनाया जा रहा है। मदनी का यह बयान जमीयत उलमा-ए-हिंद की कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक के बाद जारी किए गए आधिकारिक घोषणापत्र का हिस्सा है।
घोषणापत्र में क्या कहा
मदनी ने एक्स पर जारी पोस्ट में लिखा, 'देश के वर्तमान हालात, बढ़ती सांप्रदायिकता, संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी, मुसलमानों और इस्लामी प्रतीकों के खिलाफ बढ़ते कदम तथा नफरत आधारित राजनीति अत्यंत चिंताजनक है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि मुसलमान प्रेम से झुक सकता है, लेकिन ताकत, धमकी और अत्याचार के सामने उसे कभी झुकाया नहीं जा सकता।
मदनी के अनुसार, 'देश में नफरत की राजनीति अब धमकी की राजनीति में बदल चुकी है', जिसका उद्देश्य मुसलमानों को भयभीत कर उन्हें विशेष शर्तों पर जीवन बिताने के लिए मजबूर करना है। उन्होंने कहा कि बहुसंख्यक समुदाय को अल्पसंख्यकों के विरुद्ध खड़ा करने के लिए धार्मिक भावनाओं को भड़काया जा रहा है।
सुवेंदु अधिकारी के बयान पर आपत्ति
मदनी ने पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के कथित बयान — कि वे 'सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करेंगे' — पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह बयान संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के पूरी तरह विरुद्ध है, क्योंकि हर मुख्यमंत्री शपथ लेकर सभी नागरिकों के साथ न्याय करने का संकल्प लेता है।
मदनी ने कहा, 'सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि किसी विशेष वर्ग के खिलाफ नफरत और विभाजन की राजनीति करना।'
वैचारिक राष्ट्र बनाने के आरोप
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि समान नागरिक संहिता, वंदे मातरम को अनिवार्य बनाने की कोशिश, मस्जिदों और मदरसों के खिलाफ कार्रवाइयाँ, तथा एसआईआर (विशेष पहचान रजिस्टर) की आड़ में वास्तविक नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने जैसे कदम इसी वैचारिक एजेंडे की कड़ियाँ हैं।
उन्होंने 2014 के बाद बने कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि ये कदम इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि वर्तमान सरकार केवल मुसलमानों ही नहीं, बल्कि इस्लाम को भी नुकसान पहुंचाना चाहती है। मदनी ने यह भी स्वीकार किया कि पूर्ववर्ती सरकारों ने भी मुसलमानों को सामाजिक, शैक्षिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाया, लेकिन उनके अनुसार आज हालात उससे कहीं अधिक गंभीर हो चुके हैं।
जमीयत की आगे की रणनीति
जमीयत उलमा-ए-हिंद ने घोषणा की कि वह इन सभी कदमों के खिलाफ अपनी कानूनी और लोकतांत्रिक लड़ाई जारी रखेगी। मदनी ने सभी न्यायप्रिय दलों, सामाजिक संगठनों और देशहित में सोचने वाले नागरिकों से एकजुट होकर सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों का लोकतांत्रिक एवं सामाजिक स्तर पर मुकाबला करने की अपील की।
यह ऐसे समय में आया है जब देश में सांप्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय बहस तेज हो रही है। गौरतलब है कि जमीयत उलमा-ए-हिंद देश के सबसे पुराने और प्रभावशाली मुस्लिम धार्मिक संगठनों में से एक है, और उसके घोषणापत्र को व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जाएगा।