नैन सिंह रावत जयंती: हिमालय और तिब्बत नापने वाले 'पंडित', जिन्हें मिला विक्टोरिया क्रॉस के बराबर सम्मान
सारांश
मुख्य बातें
पंडित नैन सिंह रावत — उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के मिलम गाँव से निकले एक साधारण पहाड़ी शिक्षक — ने उस दौर में हिमालय और तिब्बत का सटीक भौगोलिक सर्वेक्षण कर दिखाया, जब न सैटेलाइट थे, न आधुनिक उपकरण। 21 अक्टूबर 1830 को जन्मे रावत की जयंती एक बार फिर उनकी असाधारण उपलब्धियों को याद करने का अवसर लेकर आई है। उनकी सर्वेक्षण पद्धति आज भी भूगोल के इतिहास में एक अद्वितीय अध्याय मानी जाती है।
कौन थे नैन सिंह रावत
नैन सिंह रावत कुमाऊँ की जोहार घाटी के एक साधारण व्यापारी परिवार से थे। उनके पिता अमर सिंह 'लाटा बूढ़ा' तिब्बत के व्यापारियों के साथ ऊन का कारोबार करते थे। बचपन से ही परिवार के तिब्बत-व्यापार के कारण उन्हें तिब्बती भाषा, वेशभूषा और पहाड़ी रास्तों की गहरी समझ थी — एक ऐसी पूँजी जो आगे चलकर ब्रिटिश सर्वेक्षणकर्ताओं के लिए अमूल्य साबित हुई।
ब्रिटिश सर्वे और गुप्त प्रशिक्षण
1858 में जब ब्रिटिश हुकूमत 'ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे ऑफ इंडिया' चला रही थी, तब देहरादून में सर्वे के कर्नल मॉन्टगोमरी को ऐसे भारतीय स्थानीय लोगों की आवश्यकता थी जो तिब्बत में प्रवेश कर नक्शा बना सकें, क्योंकि अंग्रेजों को तिब्बत में जाने की अनुमति नहीं थी। इसके लिए दो भाइयों — मणि सिंह और नैन सिंह — को चुना गया।
देहरादून में उन्हें गुप्त जासूसी और सर्वेक्षण की विशेष ट्रेनिंग दी गई। इस प्रशिक्षण में कई अनूठी विधियाँ शामिल थीं: 33 इंच की माला के हर दाने पर 100 कदम गिनकर दूरी मापना, प्रार्थना चक्र में सर्वेक्षण के नोट्स छिपाना, लकड़ी के बक्से में थर्मामीटर छिपाकर ऊँचाई मापना, और भिक्षुक के वेश में यात्रा करना ताकि किसी को संदेह न हो।
ऐतिहासिक यात्राएँ और खोजें
1865-66 में नैन सिंह रावत ने काठमांडू से ल्हासा तक लगभग 1,200 किलोमीटर की यात्रा पूरी की। इस दौरान उन्होंने 300 से अधिक ऊँचाई वाले बिंदुओं की माप की और हर मील पर अक्षांश-देशांतर की गणना की — यह सब बिना किसी आधुनिक यंत्र के, केवल अपने कदमों की गिनती और एक छिपे हुए कंपास की मदद से।
1867 में उन्होंने दूसरी बड़ी यात्रा ल्हासा से मानसरोवर और थांगला दर्रे तक की। इस यात्रा में उन्होंने तिब्बत की सबसे बड़ी झीलों और ब्रह्मपुत्र नदी के उद्गम क्षेत्र का सटीक नक्शा तैयार किया। उनकी सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक देन यह रही कि उन्होंने प्रमाणित किया कि तिब्बत की त्सांगपो नदी और भारत की ब्रह्मपुत्र एक ही नदी हैं।
अंतरराष्ट्रीय सम्मान और विरासत
नैन सिंह रावत की खोजों से ब्रिटिश रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी इतनी प्रभावित हुई कि 1877 में उन्हें प्रतिष्ठित 'पैट्रन मेडल' प्रदान किया गया, जिसे विक्टोरिया क्रॉस के समकक्ष सम्मान माना जाता था। सोसाइटी ने उन्हें एक सोने की घड़ी भी भेंट की, जिस पर अंकित था — 'पंडित नैन सिंह को उनकी असाधारण खोज के लिए।' तभी से वे 'पंडित' के नाम से विख्यात हुए।
भारत सरकार ने उन्हें गाँव की जागीरदारी और ₹1,000 वार्षिक पेंशन भी प्रदान की। मुनस्यारी में उनके नाम पर 'पंडित नैन सिंह सर्वेयर पर्वतारोहण प्रशिक्षण संस्थान' स्थापित है। 2004 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया।
आज भी प्रासंगिक विरासत
यह ऐसे समय में उल्लेखनीय है जब भारत सरकार ने उनके अधूरे सर्वेक्षण को आधुनिक सैटेलाइट तकनीक से पूरा तो कर लिया है, लेकिन रावत की पद-माप विधि आज भी भूगोलवेत्ताओं और इतिहासकारों के लिए अचंभे का विषय बनी हुई है। गौरतलब है कि एक ऐसे युग में जब उपनिवेशवादी ढाँचे में भारतीयों को सहायक भूमिका में रखा जाता था, नैन सिंह रावत ने अपनी बुद्धि और साहस से विश्व-स्तरीय भूगोल-विज्ञान में अमिट योगदान दिया।