जनरल बिपिन रावत: एक साहसी सैन्य नेता की प्रेरणादायक यात्रा
सारांश
Key Takeaways
- बिपिन रावत का जन्म 16 मार्च 1958 को हुआ।
- उन्होंने 'स्वॉर्ड ऑफ ऑनर' प्राप्त किया।
- उनका योगदान सीमापार ऑपरेशनों में महत्वपूर्ण रहा।
- उन्होंने 'ऑपरेशन ऑल आउट' और 'सर्जिकल स्ट्राइक' का नेतृत्व किया।
- उनकी मृत्यु 8 दिसंबर 2021 को हुई।
नई दिल्ली, 15 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के एक छोटे से गांव से निकलकर देश की तीनों सेनाओं के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने का सफर आसान नहीं था। यह यात्रा एक ऐसे सैनिक ने तय की, जिसकी रगों में फौज का जुनून विरासत में था। हम बात कर रहे हैं देश के पहले सीडीएस, जनरल बिपिन रावत की। उनके निर्णय, साहस और रणनीति ने सीमापार ऑपरेशनों से लेकर सैन्य सुधारों तक भारत की रक्षा नीति को नई दिशा दी।
बिपिन रावत का जन्म 16 मार्च 1958 को एक फौजी परिवार में हुआ। उनके दादा सेना में थे, पिता लेफ्टिनेंट जनरल और चाचा फौज में हवलदार के रूप में रिटायर हुए। दिलचस्प बात यह है कि जिस बटालियन में उनके पिता की पहली पोस्टिंग हुई थी, उसी बटालियन में बिपिन रावत को भी जाने का अवसर मिला। उन्होंने 1978 में आईएमए से पासआउट होने के बाद 11 गोरखा राइफल्स की 5वीं बटालियन में नियुक्ति पाई।
सेना में शामिल होने की कहानी भी दिलचस्प है। एनडीए के इंटरव्यू में ब्रिगेडियर रैंक के अधिकारी ने उनसे पूछा कि उनकी हॉबी क्या है। रावत ने कहा कि उन्हें ट्रैकिंग पसंद है। अधिकारी ने उनसे पूछा कि वे ट्रैकिंग पर जाते समय कौन सी चीज ले जाना चाहेंगे। रावत ने जवाब दिया कि वह माचिस ले जाना चाहेंगे, जिससे ट्रैकिंग में मदद मिलेगी। इस उत्तर ने अधिकारियों को बहुत प्रभावित किया।
उन्हें 'स्वॉर्ड ऑफ ऑनर' से सम्मानित किया गया, जो कि अकेडमी के सबसे प्रतिभाशाली कैडेट को दिया जाता है। उनकी ज़िंदगी से जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा यह है कि एनडीए की ट्रेनिंग के दौरान जब उन्हें स्वीमिंग पूल में छलांग लगाने का टास्क दिया गया, तो वह इसे पूरा नहीं कर सके।
इसके परिणामस्वरूप, बिपिन रावत की सीनियॉरिटी छीन ली गई, लेकिन कोई भी यह नहीं सोच सकता था कि स्वीमिंग पूल में छलांग न लगाने वाला यह लड़का आगे चलकर न केवल आईएमए में 'स्वॉर्ड ऑफ ऑनर' हासिल करेगा, बल्कि भारत का सेनाध्यक्ष और फिर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) भी बनेगा। इस घटना का उल्लेख रचना बिष्ट रावत ने जनरल बिपिन रावत की जीवनी 'बिपिन-द मैन बिहाइंड द यूनिफॉर्म' में किया है।
बिपिन रावत ने सेना में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। वे 1986 में एलएसी पर इंफेंट्री बटालियन के प्रमुख रहे। उन्होंने कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल्स के एक सेक्टर और 19 इन्फेंट्री डिविजन का नेतृत्व किया तथा 2008 में कांगो में संयुक्त राष्ट्र की सेना का भी नेतृत्व किया।
उन्होंने कहा था, "आतंकवादी अपनी रणनीति बदलते रहते हैं। हमें उनसे आगे रहकर कार्रवाई करनी होती है।" जनरल बिपिन रावत ने पूर्वोत्तर में पहले बड़े ऑपरेशन का सफलतापूर्वक अंजाम दिया।
जून 2015 में मणिपुर में हुए हमले के बाद, 21 पैरा कमांडो के जवानों ने सीमा पार जाकर आतंकवादियों को मार गिराया। यह ऑपरेशन जनरल रावत की योजना के तहत किया गया था।
इसके बाद उन्होंने कश्मीर में 'ऑपरेशन ऑल आउट' चलाया। जनरल रावत ने जवानों में राष्ट्रप्रेम का जुनून जगाया। उनकी योजनाओं के तहत भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की।
उन्होंने बयान दिया था कि "उत्तरी सीमा से अगर कोई चुनौती मिलती है तो पाकिस्तान इसका लाभ उठा सकता है।"
दिसंबर 2016 में उन्हें भारतीय सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया। जनरल रावत ने सैन्य सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीडीएस बनने के बाद, उन्होंने तीनों सेनाओं के बीच समन्वय के लिए 5 थिएटर कमांड की घोषणा की। उन्होंने सेना में बजट की प्राथमिकता को भी रेखांकित किया।
8 दिसंबर 2021 को पूरे भारत के लिए दुखद समाचार आया। तमिलनाडु में कुन्नूर के निकट जनरल बिपिन रावत का हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें उनकी पत्नी और अन्य सैन्य अधिकारी भी थे। इस दुर्घटना में बिपिन रावत सहित 13 लोगों की मृत्यु हो गई।