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नारायणी शिला हरिद्वार: पितृ पक्ष में पिंडदान का सर्वोच्च तीर्थ, सदियों पुरानी पौराणिक मान्यता

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नारायणी शिला हरिद्वार: पितृ पक्ष में पिंडदान का सर्वोच्च तीर्थ, सदियों पुरानी पौराणिक मान्यता

सारांश

गया जी के बाद पितृ कर्म का सर्वोच्च तीर्थ मानी जाने वाली हरिद्वार की नारायणी शिला पितृ पक्ष में देश-विदेश के हज़ारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। स्कंद पुराण की गयासुर-कथा से जुड़ी यह शिला भगवान विष्णु के कमलासन का अंश मानी जाती है।

मुख्य बातें

नारायणी शिला मंदिर , हरिद्वार में गंगा तट पर स्थित है और पिंडदान, तर्पण व श्राद्ध कर्म के लिए प्रसिद्ध है।
गया जी के बाद इसे पितृ कर्म के लिए सर्वोच्च पुण्यस्थान माना जाता है।
स्कंद पुराण के अनुसार यह शिला भगवान विष्णु के श्रीविग्रह का हृदय स्थल है।
गयासुर-कथा के अनुसार कमलासन तीन भागों में टूटकर हरिद्वार, बद्रीनाथ और गया जी में गिरा था।
पितृ पक्ष के दौरान यहाँ देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु पूर्वजों की मुक्ति की कामना से पहुँचते हैं।

हरिद्वार की गंगा तट पर स्थित नारायणी शिला को पितरों की मुक्ति का द्वार माना जाता है — यह प्राचीन तीर्थस्थल पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए पूरे भारत में विख्यात है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गया जी के बाद इसे पितृ कर्म के लिए सर्वाधिक पुण्यदायी स्थान माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु यहाँ अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पहुँचते हैं।

नारायणी शिला का धार्मिक महत्व

नारायणी शिला मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के अनुसार, यह शिला भगवान विष्णु के श्रीविग्रह का हृदय स्थल मानी जाती है। आस्थावानों का विश्वास है कि यहाँ की गई प्रार्थना सीधे भगवान विष्णु तक पहुँचती है और यहाँ पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

गौरतलब है कि हरिद्वार वैसे भी गंगा स्नान और मोक्ष की नगरी के रूप में जानी जाती है, परंतु नारायणी शिला इस नगरी में पितृ-मुक्ति का एक विशेष केंद्र है जो इसे अन्य तीर्थों से अलग बनाती है।

पौराणिक कथा: गयासुर और कमलासन की कहानी

वायु पुराण और स्कंद पुराण के केदारखंड में गयासुर की कथा का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, गयासुर ने नारद जी से अपने पापों से मुक्ति का मार्ग जानना चाहा। नारद जी ने कहा कि कठोर तप अथवा भगवान से युद्ध कर उनके हाथों मोक्ष पाया जा सकता है।

असुर बुद्धि से गयासुर बद्रीधाम में भगवान बदरीनाथ के दर्शन करने पहुँचा, किंतु मंदिर के कपाट बंद होने पर क्रोधित होकर वह भगवान के कमलासन को उठाकर ले जाने लगा। तभी भगवान विष्णु ने केस-लोचन तीर्थ में उसे रोका और दोनों के बीच घोर युद्ध छिड़ गया।

युद्ध के दौरान भगवान ने गदा से प्रहार किया और गयासुर ने कमलासन को ढाल बनाकर बचाव किया। इस प्रहार से कमलासन तीन भागों में टूट गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसका एक भाग हरिद्वार में गिरा जहाँ नारायणी शिला मंदिर स्थापित हुआ, दूसरा भाग बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में और तीसरा भाग गया जी में।

पितृ पक्ष में नारायणी शिला का विशेष आकर्षण

गंगा के पावन तट पर अवस्थित होने के कारण पितृ पक्ष के सोलह दिनों में नारायणी शिला विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाती है। श्रद्धालु यहाँ पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण और पिंडदान के कर्म संपन्न करते हैं। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब पूरा देश पितृ पक्ष के धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय रहता है।

यह तीर्थस्थान उन लाखों हिंदू परिवारों के लिए गया जी की तरह ही पवित्र माना जाता है जो दक्षिण बिहार की लंबी यात्रा नहीं कर सकते। आस्था और पौराणिक महत्व का यह संगम नारायणी शिला को उत्तर भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पितृ-तीर्थों में से एक बनाता है।

तीर्थ का भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भ

हरिद्वार उत्तराखंड में स्थित है और यह नगरी वर्षों से चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार रही है। हर की पौड़ी के निकट गंगा तट पर स्थित नारायणी शिला मंदिर की भौगोलिक स्थिति इसे पिंडदान के लिए और भी उपयुक्त बनाती है, क्योंकि हिंदू परंपरा में गंगा जल में तर्पण को विशेष पुण्यकारी माना गया है।

आने वाले समय में पितृ पक्ष के समापन के साथ यहाँ श्रद्धालुओं का तांता जारी रहने की संभावना है, और स्थानीय प्रशासन तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए व्यवस्थाएँ बनाए रखता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उत्तर भारत में तीर्थ-पर्यटन की उस व्यापक संरचना का हिस्सा है जो गया जी तक पहुँचने में असमर्थ लाखों परिवारों को एक स्थानीय विकल्प उपलब्ध कराती है। पुराणों में इस शिला का स्पष्ट उल्लेख इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है, हालाँकि पितृ-मोक्ष के दावों को आस्था की कसौटी पर ही परखा जाना चाहिए। यह भी उल्लेखनीय है कि पितृ पक्ष जैसे अवसरों पर ऐसे तीर्थों पर जन-दबाव बढ़ता है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और पर्यावरण — विशेषकर गंगा तट की स्वच्छता — पर गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता है।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नारायणी शिला क्या है और यह कहाँ स्थित है?
नारायणी शिला उत्तराखंड के हरिद्वार में गंगा तट पर स्थित एक प्राचीन तीर्थस्थल है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह शिला भगवान विष्णु के श्रीविग्रह का हृदय स्थल मानी जाती है और पिंडदान, तर्पण तथा श्राद्ध कर्म के लिए विख्यात है।
नारायणी शिला को पिंडदान के लिए क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नारायणी शिला गया जी के बाद पितृ कर्म का सर्वोच्च स्थान है। स्कंद पुराण में उल्लेखित कथा के अनुसार यहाँ पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और यहाँ की गई प्रार्थना सीधे भगवान विष्णु तक पहुँचती है।
नारायणी शिला की पौराणिक कथा क्या है?
वायु पुराण और स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, गयासुर और भगवान विष्णु के युद्ध में भगवान की गदा के प्रहार से कमलासन तीन भागों में टूट गया। उसका एक भाग हरिद्वार में गिरा जहाँ नारायणी शिला मंदिर स्थापित हुआ, दूसरा बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में और तीसरा गया जी में।
पितृ पक्ष में नारायणी शिला जाने का क्या महत्व है?
पितृ पक्ष के सोलह दिनों में नारायणी शिला पर श्रद्धालुओं का विशेष जमावड़ा होता है। गंगा तट पर होने के कारण यहाँ तर्पण और पिंडदान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है, और जो लोग गया जी नहीं जा सकते उनके लिए यह प्रमुख विकल्प है।
नारायणी शिला और गया जी में क्या संबंध है?
पौराणिक कथा के अनुसार दोनों स्थान गयासुर-कथा से जुड़े भगवान विष्णु के कमलासन के टुकड़ों की जगह हैं। गया जी को पितृ कर्म का सर्वोच्च स्थान माना जाता है, जबकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नारायणी शिला उसके ठीक बाद दूसरा सर्वाधिक पुण्यकारी तीर्थ है।
राष्ट्र प्रेस
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