नारायणी शिला हरिद्वार: पितृ पक्ष में पिंडदान का सर्वोच्च तीर्थ, सदियों पुरानी पौराणिक मान्यता
सारांश
मुख्य बातें
हरिद्वार की गंगा तट पर स्थित नारायणी शिला को पितरों की मुक्ति का द्वार माना जाता है — यह प्राचीन तीर्थस्थल पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए पूरे भारत में विख्यात है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गया जी के बाद इसे पितृ कर्म के लिए सर्वाधिक पुण्यदायी स्थान माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु यहाँ अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पहुँचते हैं।
नारायणी शिला का धार्मिक महत्व
नारायणी शिला मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के अनुसार, यह शिला भगवान विष्णु के श्रीविग्रह का हृदय स्थल मानी जाती है। आस्थावानों का विश्वास है कि यहाँ की गई प्रार्थना सीधे भगवान विष्णु तक पहुँचती है और यहाँ पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गौरतलब है कि हरिद्वार वैसे भी गंगा स्नान और मोक्ष की नगरी के रूप में जानी जाती है, परंतु नारायणी शिला इस नगरी में पितृ-मुक्ति का एक विशेष केंद्र है जो इसे अन्य तीर्थों से अलग बनाती है।
पौराणिक कथा: गयासुर और कमलासन की कहानी
वायु पुराण और स्कंद पुराण के केदारखंड में गयासुर की कथा का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, गयासुर ने नारद जी से अपने पापों से मुक्ति का मार्ग जानना चाहा। नारद जी ने कहा कि कठोर तप अथवा भगवान से युद्ध कर उनके हाथों मोक्ष पाया जा सकता है।
असुर बुद्धि से गयासुर बद्रीधाम में भगवान बदरीनाथ के दर्शन करने पहुँचा, किंतु मंदिर के कपाट बंद होने पर क्रोधित होकर वह भगवान के कमलासन को उठाकर ले जाने लगा। तभी भगवान विष्णु ने केस-लोचन तीर्थ में उसे रोका और दोनों के बीच घोर युद्ध छिड़ गया।
युद्ध के दौरान भगवान ने गदा से प्रहार किया और गयासुर ने कमलासन को ढाल बनाकर बचाव किया। इस प्रहार से कमलासन तीन भागों में टूट गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसका एक भाग हरिद्वार में गिरा जहाँ नारायणी शिला मंदिर स्थापित हुआ, दूसरा भाग बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में और तीसरा भाग गया जी में।
पितृ पक्ष में नारायणी शिला का विशेष आकर्षण
गंगा के पावन तट पर अवस्थित होने के कारण पितृ पक्ष के सोलह दिनों में नारायणी शिला विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाती है। श्रद्धालु यहाँ पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण और पिंडदान के कर्म संपन्न करते हैं। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब पूरा देश पितृ पक्ष के धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय रहता है।
यह तीर्थस्थान उन लाखों हिंदू परिवारों के लिए गया जी की तरह ही पवित्र माना जाता है जो दक्षिण बिहार की लंबी यात्रा नहीं कर सकते। आस्था और पौराणिक महत्व का यह संगम नारायणी शिला को उत्तर भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पितृ-तीर्थों में से एक बनाता है।
तीर्थ का भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भ
हरिद्वार उत्तराखंड में स्थित है और यह नगरी वर्षों से चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार रही है। हर की पौड़ी के निकट गंगा तट पर स्थित नारायणी शिला मंदिर की भौगोलिक स्थिति इसे पिंडदान के लिए और भी उपयुक्त बनाती है, क्योंकि हिंदू परंपरा में गंगा जल में तर्पण को विशेष पुण्यकारी माना गया है।
आने वाले समय में पितृ पक्ष के समापन के साथ यहाँ श्रद्धालुओं का तांता जारी रहने की संभावना है, और स्थानीय प्रशासन तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए व्यवस्थाएँ बनाए रखता है।