पाण्डु पिंडारा धाम: महाभारत काल से जुड़ा जींद का वह तीर्थ जहाँ पिंडदान से मिलता है पितरों को मोक्ष
सारांश
मुख्य बातें
हरियाणा के जींद स्थित पाण्डु पिंडारा धाम को पितृकर्म के लिए देश के महत्वपूर्ण तीर्थों में गिना जाता है। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष और आत्मा को शांति प्राप्त होती है। पितृपक्ष के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु यहाँ उमड़ते हैं, और अमावस्या के दिन तो यहाँ मेले जैसा माहौल बन जाता है।
महाभारत काल से जुड़ी मान्यता
पंडित राजेश शास्त्री के अनुसार, पाण्डु पिंडारा धाम का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। कथा के अनुसार, महाभारत के विनाशकारी युद्ध के पश्चात पाँचों पांडवों ने युद्ध में काल-कवलित हुए अपने स्वजनों और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन माँगा था। श्रीकृष्ण ने उन्हें इसी तीर्थ पर आकर भगवान शिव का आवाहन करने और पितरों का पिंडदान करने का परामर्श दिया था। तभी से यह स्थान पितृकर्म का विशेष केंद्र बन गया।
पंडित सूरजभान शास्त्री ने भी इस परंपरा की पुष्टि की। उनके अनुसार, श्रीकृष्ण ने पांडवों को बरगद के वृक्ष के नीचे भगवान शिव का आवाहन कर पिंडदान करने की बात कही थी। इसी कारण आज भी इस स्थान पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों का पिंडदान कराते हैं और उनकी शांति व मोक्ष की कामना करते हैं।
पिंडदान में प्रयुक्त सामग्री
पंडित राजेश शास्त्री ने बताया कि पिंडदान की विधि में अनेक धार्मिक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। इनमें जौ का आटा, धागे के पत्ते, काले तिल, दूध, दही, शहद और कमल गट्टे के बीज प्रमुख हैं। श्रद्धालु विधि-विधान के साथ इन सामग्रियों से अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान संपन्न करते हैं।
अमावस्या पर उमड़ती है भारी भीड़
पंडित योगेश शास्त्री के अनुसार, पाण्डु पिंडारा में पितृकर्म की परंपरा सदियों से अनवरत चली आ रही है। सोमवती अमावस्या और श्राद्ध पक्ष की अमावस्या पर यहाँ इतनी भीड़ होती है कि 'तिल गिरने की जगह नहीं बचती'। इस अवसर पर धाम परिसर में स्थित अनेक मंदिर भी श्रद्धालुओं से भर जाते हैं। जिस स्थान पर पांडवों द्वारा भगवान शिव का अनुष्ठान किए जाने की मान्यता है, वहाँ विशेष रूप से पितृकर्म किए जाते हैं।
श्रद्धालुओं के अनुभव
श्रद्धालु पवन शर्मा ने बताया कि अमावस्या के दौरान दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं और अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए धार्मिक कर्म करते हैं। श्रद्धालु संतोष के अनुसार, पितरों की शांति के लिए यहाँ श्राद्ध और दान का विशेष महत्व है तथा सोमवती अमावस्या पर यहाँ मेले जैसा माहौल बन जाता है। श्रद्धालु सुनीता ने भी इस धाम को पितरों की शांति से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ बताया और कहा कि लोग यहाँ स्नान के पश्चात पिंडदान और दान करते हैं।
धाम का आध्यात्मिक महत्व
पितृपक्ष के अवसर पर देशभर में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा निभाई जाती है। जींद का पाण्डु पिंडारा धाम इस दृष्टि से हरियाणा का एक प्रमुख पितृकर्म तीर्थ बनकर उभरा है। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है जब लोग गया, प्रयागराज जैसे बड़े तीर्थों तक न पहुँच पाने की स्थिति में इस क्षेत्रीय धाम में आकर अपने कर्तव्य पूरे करते हैं। आने वाले वर्षों में इस धाम के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था और भी प्रगाढ़ होने की संभावना है।