पितृपक्ष 2026: पिहोवा तीर्थ पर उमड़े श्रद्धालु, अकाल मृत्यु वाले पितरों के मोक्ष की अनूठी मान्यता
सारांश
मुख्य बातें
पितृपक्ष के पावन अवसर पर हरियाणा के पिहोवा तीर्थ पर देशभर से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। सरस्वती नदी के तट पर बसे इस तीर्थस्थल को धार्मिक मान्यताओं में 'आदि गया तीर्थ' के नाम से जाना जाता है, जहाँ अकाल मृत्यु को प्राप्त पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व बताया जाता है। 26 सितंबर 2026 को जारी इस पितृपक्ष में पंजाब, हिमाचल प्रदेश और देश के अन्य क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या सालभर की तुलना में कई गुना अधिक हो जाती है।
पिहोवा तीर्थ का धार्मिक महत्व
पिहोवा को पितृकर्म की दृष्टि से गयाजी के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थों में गिना जाता है। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, यहाँ जल, आकाश, पृथ्वी या किसी अन्य कारण से अकाल मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति के पितृकर्म का विशेष फल मिलता है। मान्यता है कि ऐसे व्यक्तियों की आत्मा की गति और मोक्ष का मार्ग पिहोवा में किए गए श्राद्ध एवं पिंडदान से प्रशस्त होता है। यहाँ आने वाले अनेक परिवार पीढ़ियों से अपने पारंपरिक पुरोहितों के माध्यम से यह कर्म सम्पन्न कराते आ रहे हैं।
महाभारत काल से जुड़ी पौराणिक मान्यता
तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि पिहोवा की ऐतिहासिक महत्ता महाभारत काल से जुड़ी हुई है। उनके अनुसार, महाभारत युद्ध में वीरगति को प्राप्त सैनिकों और योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण के निर्देशन में धर्मराज युधिष्ठिर ने सरस्वती तीर्थ पिहोवा में श्राद्ध और पिंडदान सम्पन्न कराए थे। पांडवों और कौरवों सहित युद्ध में काम आए लोगों की गति के लिए यहाँ पितृकर्म किए जाने की इसी मान्यता के कारण पिहोवा को एक विशिष्ट तीर्थ का दर्जा प्राप्त है।
प्रेत पीपल पूजा और पिंडदान की परंपरा
श्राद्ध और पिंडदान के उपरांत पिहोवा तीर्थ पर स्थित प्रेत पीपल की पूजा और तर्पण की परंपरा भी प्रचलित बताई जाती है। पुरोहितों के अनुसार, तर्पण का तात्पर्य पितरों की तृप्ति से है और पिंडदान के पश्चात अर्पित किया गया जल प्रेत पीपल के माध्यम से पितरों तक पहुँचता है। पिंडदान में तिल, चावल, पुष्प और चावल का आटा सहित विविध सामग्री का उपयोग किया जाता है। श्रद्धा से किए गए तर्पण और पिंडदान से पितरों की तृप्ति और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहने की मान्यता प्रचलित है।
चैत्र चौदस और पिशाच मोक्ष की विशेष मान्यता
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, पिहोवा में केवल पितृपक्ष ही नहीं बल्कि चैत्र चौदस का भी अत्यधिक महत्व है। इस अवसर पर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों से श्रद्धालु यहाँ पिंडदान और तर्पण कराने आते हैं। पुरोहितों की मान्यता है कि चैत्र चौदस पर किए गए पितृकर्म से पिशाच योनि में पड़े पितरों को भी मुक्ति मिल सकती है। विशेष रूप से यह भी माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति का पिंडदान अन्यत्र फलित न हुआ हो, तो पिहोवा में कराया गया पिंडदान फलदायी होता है।
पुरोहित और श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया
तीर्थ पुरोहित दीपक पंचोली ने बताया कि पिहोवा में श्राद्ध कराने से सबसे महत्वपूर्ण रूप से मानसिक शांति की अनुभूति होती है। उनके अनुसार, अलग-अलग तीर्थों का अपना-अपना धार्मिक महत्व है, किंतु पिहोवा में किया गया पिंडदान विशेष रूप से मानसिक संतोष और शांति से जुड़ा माना जाता है। तीर्थ पुरोहित राकेश शर्मा ने बताया कि गयाजी के बाद पिहोवा का श्राद्धकर्म के लिए अग्रणी महत्व है और अनेक प्रतिष्ठित परिवार यहाँ पितृकर्म कराने आते रहे हैं। श्रद्धालु राजन सक्सेना ने बताया कि वे अपने पिता का पिंडदान कराने यहाँ आए हैं और विधि-विधान से पूजा के बाद उन्हें मानसिक संतोष और शांति का अनुभव हो रहा है। पितृपक्ष की समाप्ति तक श्रद्धालुओं की यह आवक और बढ़ने की संभावना है।