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विदिशा में पितृपक्ष 2026 का आगाज़: बेतवा के बड़वाले घाट पर तर्पण, पंडितों ने बताया 16 दिनों का महत्व

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विदिशा में पितृपक्ष 2026 का आगाज़: बेतवा के बड़वाले घाट पर तर्पण, पंडितों ने बताया 16 दिनों का महत्व

सारांश

विदिशा के बड़वाले घाट पर भोर से ही उमड़ी भीड़ ने बेतवा की लहरों में पितरों को जलांजलि दी — 16 दिवसीय पितृपक्ष का विधिवत आगाज़। पंडितों ने कर्ण और भीष्म की परंपरा से जोड़ते हुए बताया कि इन दिनों का पुण्य पितृदोष और कालसर्प दोष की शांति दिलाता है।

मुख्य बातें

26 सितंबर 2026 (शनिवार) से 16 दिवसीय पितृपक्ष का विदिशा में विधिवत शुभारंभ हुआ।
श्रद्धालुओं ने बेतवा नदी के बड़वाले घाट पर कुशा, काले तिल, जल और दूध से पितरों को तर्पण दिया।
पंडित लक्ष्मी नारायण व्यास के अनुसार यह परंपरा भीष्म पितामह और राजा कर्ण के काल से चली आ रही है।
पंडित राजेंद्र दुबे ने कहा कि कलयुग में बेतवा का महत्व गंगा के समान माना गया है।
पितृपक्ष आश्विन अमावस्या तक चलेगा; इन 16 दिनों में तर्पण से पितृदोष और कालसर्प दोष की शांति होती है।

मध्य प्रदेश के विदिशा में 26 सितंबर 2026 (शनिवार) को भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से 16 दिवसीय पितृपक्ष (श्राद्ध पक्ष) का विधिवत शुभारंभ हो गया। सूर्योदय से पहले ही श्रद्धालु बेतवा नदी के ऐतिहासिक बड़वाले घाट पर उमड़ पड़े और पवित्र जल में खड़े होकर कुशा, काले तिल, जल और दूध से अपने पितरों को जलांजलि अर्पित करते हुए तर्पण और पितृ कर्म संपन्न किए। यह पर्व आश्विन माह की अमावस्या तक चलेगा।

मुख्य घटनाक्रम

तड़के से ही घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। परिवारों ने पंडितों के सान्निध्य में मंत्रोच्चार के साथ तर्पण विधि पूरी की। बेतवा के इस घाट को पितृकर्म के लिए विदिशा और आसपास के जिलों में विशेष रूप से पवित्र माना जाता है।

बड़वाले घाट पर बड़ी संख्या में स्थानीय पंडित और पुरोहित मौजूद रहे, जिन्होंने श्रद्धालुओं को पितृकर्म की विधि समझाई और संस्कारों का संचालन किया।

पंडितों ने बताई पौराणिक पृष्ठभूमि

बेतवा तट पर उपस्थित पंडित लक्ष्मी नारायण व्यास ने तर्पण की ऐतिहासिक और पौराणिक जड़ों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भीष्म पितामह और दानवीर राजा कर्ण के काल से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है।

उन्होंने कहा, 'राजा कर्ण ने भगवान से 16 दिन माँगे थे ताकि वे दान-पुण्य और भंडारा कर सकें। इन 16 दिनों में पितृकर्म और तर्पण करने से पितृदोष और कालसर्प दोष की शांति होती है, माता-पिता की आत्मा को तृप्ति मिलती है तथा मानव जीवन का कल्याण होता है।'

बेतवा का महत्व — 'कलयुग में गंगा के समान'

पंडित राजेंद्र दुबे ने सनातन परंपरा में पितृपक्ष की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि ये 16 दिन पूर्वजों, माता-पिता और दादा-दादी को स्मरण कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर हैं।

उन्होंने कहा, 'जब हम कुशा और तिल के जल से भगवान सूर्य नारायण, गंगापुत्र भीष्म और अपने पितरों को जलांजलि देते हैं, तो वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि और वंश की उन्नति होती है।'

पंडित दुबे ने महाकवि कालिदास के कथन का उल्लेख करते हुए बताया कि जिस नगर में पवित्र नदी हो, वह नगर महान होता है। उन्होंने कहा, 'कलयुग में बेतवा का महत्व गंगा के समान माना गया है। यहाँ आकर तर्पण करने से वही फल मिलता है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो लोग गया तीर्थ जा चुके हैं, उन्हें भी श्राद्ध और तर्पण अवश्य करना चाहिए।

आम जनता पर असर

पितृपक्ष के इन 16 दिनों में विदिशा और आसपास के जिलों से हज़ारों श्रद्धालुओं के बड़वाले घाट पर आने की उम्मीद है। स्थानीय पुजारियों और दुकानदारों के लिए यह काल विशेष महत्व का होता है। प्रशासन की ओर से घाट पर व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।

क्या होगा आगे

पितृपक्ष आश्विन अमावस्या तक चलेगा, जिसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है — यह दिन उन पितरों के श्राद्ध के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है जिनकी तिथि ज्ञात नहीं। घाट पर प्रतिदिन भोर से दोपहर तक तर्पण की गतिविधियाँ जारी रहेंगी और विदिशा का यह तट अगले पखवाड़े धार्मिक आस्था का केंद्र बना रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि इनका सामाजिक आयाम भी उतना ही महत्वपूर्ण है — ये आयोजन पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद और सामुदायिक एकजुटता का माध्यम हैं। बेतवा जैसी नदियों पर श्रद्धालुओं की भीड़ यह भी दर्शाती है कि तीर्थ-पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर धार्मिक पर्वों का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। प्रशासन और नगर निकायों के लिए यह अवसर घाटों की साफ-सफाई और श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा भी है।
RashtraPress
26 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पितृपक्ष 2026 कब से कब तक है?
पितृपक्ष 2026 का आरंभ 26 सितंबर 2026 (भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा) से हुआ है और यह आश्विन अमावस्या तक कुल 16 दिनों तक चलेगा। इस अवधि को श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है।
तर्पण में किन वस्तुओं का उपयोग किया जाता है?
तर्पण में मुख्य रूप से कुशा घास, काले तिल, जल और दूध का उपयोग होता है। पंडितों के अनुसार इन सामग्रियों से भगवान सूर्य नारायण, गंगापुत्र भीष्म और पितरों को जलांजलि देने से उन्हें तृप्ति मिलती है।
बेतवा नदी के बड़वाले घाट का पितृपक्ष में क्या महत्व है?
पंडित राजेंद्र दुबे के अनुसार कलयुग में बेतवा नदी का महत्व गंगा के समान माना गया है। बड़वाले घाट विदिशा और आसपास के क्षेत्रों में पितृकर्म के लिए सबसे प्रमुख स्थान है, जहाँ पितृपक्ष के दौरान हज़ारों श्रद्धालु तर्पण के लिए आते हैं।
पितृपक्ष में तर्पण करने से क्या लाभ होता है?
पंडितों के अनुसार इन 16 दिनों में तर्पण और पितृकर्म करने से पितृदोष और कालसर्प दोष की शांति होती है, माता-पिता की आत्मा को तृप्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि तथा वंश की उन्नति होती है।
क्या गया तीर्थ जाने वालों को भी तर्पण करना चाहिए?
पंडित राजेंद्र दुबे ने स्पष्ट किया है कि जो लोग गया तीर्थ जा चुके हैं, उन्हें भी पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण अवश्य करना चाहिए। इसे सनातन परंपरा में पितरों के प्रति कर्तव्य का अनिवार्य भाग माना गया है।
राष्ट्र प्रेस
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