क्या नरेंद्र चंचल ने माता रानी के भजन गाकर प्रसिद्धि पाई? आज भी नवरात्रि में गूंजती है आवाज?
सारांश
Key Takeaways
- नरेंद्र चंचल का जीवन एक प्रेरणा है।
- उनकी आवाज़ ने भक्ति संगीत को नया अर्थ दिया।
- आस्था और मेहनत से बड़े सपने साकार हो सकते हैं।
- चंचल के भजन आज भी लोगों में ऊर्जा भरते हैं।
- उन्होंने अपनी पहचान केवल संगीत से नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर चर्चा से भी बनाई।
मुंबई, 21 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्ष 1973 था, जब मुंबई के एक स्टूडियो में प्रसिद्ध फिल्मकार राज कपूर अपनी फिल्म 'बॉबी' के लिए एक ऐसी आवाज की खोज में थे, जिसमें मिट्टी की महक और रूहानी गहराई हो।
उन्होंने एक चैरिटी शो में एक दुबले-पतले इंसान को बुल्ले शाह की रचना गाते सुना। वह गायक और कोई नहीं, बल्कि नरेंद्र चंचल थे। चंचल की वह बुलंद आवाज सुनकर राज कपूर मंत्रमुग्ध हो गए।
इसका नतीजा यह हुआ कि फिल्म 'बॉबी' का 'बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो...' गाना चंचल को रातों-रात बॉलीवुड का सुपरस्टार गायक बना दिया। उन्हें उसी साल का 'सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक' का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। लेकिन चंचल के लिए यह केवल शुरुआत थी। उनकी मंजिलें फिल्मी गलियारों से कहीं आगे वैष्णो देवी की पहाड़ियों में बसी थीं।
16 अक्टूबर 1940 को अमृतसर में जन्मे नरेंद्र खरबंदा का बचपन बहुत साधारण था। उनके हिंदी शिक्षक उनकी ऊर्जा और चपलता से इतने प्रभावित थे कि उन्हें 'चंचल' उपनाम दे दिया गया। चंचल को संगीत विरासत में मिला था। उनकी माता कैलाश वती स्वयं एक समर्पित भक्त थीं। चंचल अक्सर याद करते थे कि कैसे वे अपनी मां के साथ मंदिरों में जाते थे। यह सुबह की आरती और भजनों का प्रभाव ही था जिसने उनके भीतर भक्ति के बीज बोए।
चंचल के जीवन में एक ऐसा वक्त भी आया जब उन्होंने अपनी आवाज पूरी तरह खो दी। एक गायक के लिए इससे बड़ा श्राप क्या हो सकता है? लेकिन, उनकी 'आस्था' ने उन्हें सहारा दिया। वर्षों के मौन और प्रार्थना के बाद जब उनकी आवाज लौटी, तो वह पहले से कहीं ज्यादा शक्तिशाली थी। चंचल इसे 'माता रानी' का चमत्कार मानते थे और यहीं से उनके जीवन का ध्येय बदल गया।
चंचल ने 'जागरण' की परिभाषा ही बदल दी। उनके लिए जागरण केवल रात भर गाना नहीं था, बल्कि समाज को जगाना था। वे मंच से कन्या भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा और माता-पिता के सम्मान जैसे मुद्दों पर चर्चा करते थे।
जब वे मंच पर आते थे, तो समां बंध जाता था। 'चलो बुलावा आया है...' या 'तूने मुझे बुलाया शेरांवालिये...' जैसे गीत गाते समय ऐसा लगता था मानो भक्त और भगवान के बीच का फासला मिट गया हो।
कटरा और वैष्णो देवी के भवन से चंचल का रिश्ता रूहानी था। हर साल 29 दिसंबर को वे कटरा पहुंचते थे। भीषण सर्दी में भी हजारों की भीड़ उनका इंतजार करती थी। उनके कार्यक्रमों को स्थानीय लोग 'चंचल मेला' कहने लगे थे। आज भी वैष्णो देवी की चढ़ाई करते समय हर दूसरे मोड़ पर उनके गाने की आवाज गूंजती सुनाई देती है, जो थके हुए यात्रियों में उत्साह भर देती है।
चंचल की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं थी। उन्होंने विदेशों में बसे भारतीयों को उनकी जड़ों से जोड़ा। उनके सांस्कृतिक योगदान के लिए अमेरिका के जॉर्जिया राज्य ने उन्हें 'मानद नागरिकता' प्रदान की। यह किसी भी भारतीय भजन गायक के लिए एक दुर्लभ सम्मान था।
अपने अंतिम वर्षों में भी चंचल की ऊर्जा कम नहीं हुई। 2020 में कोरोना महामारी के दौरान उनकी आवाज में एक वीडियो 'कित्थो आया कोरोना' वायरल हुआ था।
22 जनवरी 2021 को इस महान गायक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन, वे हर उस घर में जीवित हैं जहां सुबह की शुरुआत उनके द्वारा गाए गए माता रानी की भजन 'अंबे तू है जगदंबे काली' से होती है।
उनकी आत्मकथा 'मिडनाइट सिंगर' हमें याद दिलाती है कि एक साधारण इंसान अगर अपनी आस्था और कला के प्रति सच्चा हो, तो वह गलियों से उठकर सितारों तक पहुंच सकता है।