नासा का 'SANS' अध्ययन: अंतरिक्ष में 70% एस्ट्रोनॉट्स की आंखों पर पड़ता है गंभीर असर
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) अंतरिक्ष यात्रा के दौरान एस्ट्रोनॉट्स की आंखों और मस्तिष्क पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को समझने के लिए एक विशेष शोध कार्यक्रम चला रही है। नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर के अनुसार, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पर मिशन पूरे करने वाले लगभग 70 प्रतिशत एस्ट्रोनॉट्स में आंखों के पिछले हिस्से में सूजन की समस्या दर्ज की गई है — एक स्थिति जिसे वैज्ञानिक 'स्पेस फ्लाइट एसोसिएटेड न्यूरो-ऑक्युलर सिंड्रोम' (SANS) कहते हैं। यह अध्ययन भविष्य के चंद्रमा, मंगल और गहरे अंतरिक्ष मिशनों को चिकित्सकीय दृष्टि से अधिक सुरक्षित बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।
SANS क्या है और यह क्यों होता है
शोधकर्ताओं के अनुसार, अंतरिक्ष में भारहीनता (microgravity) की स्थिति में शरीर के तरल पदार्थों का वितरण बदल जाता है। पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण के कारण रक्त और अन्य द्रव नीचे की ओर बने रहते हैं, लेकिन अंतरिक्ष में यह संतुलन टूट जाता है। इसके परिणामस्वरूप रक्त, रीढ़ से जुड़े तरल पदार्थ (cerebrospinal fluid) और अन्य द्रव सिर की ओर खिसक सकते हैं, जिससे आंखों और मस्तिष्क के आसपास दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
इस बढ़े हुए दबाव के कारण कुछ एस्ट्रोनॉट्स की दृष्टि क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, अधिकांश मामलों में पृथ्वी पर लौटने के बाद सूजन कम हो जाती है और दृष्टि में सुधार देखा जाता है, लेकिन वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि क्या इन बदलावों का कोई दीर्घकालिक प्रभाव भी रहता है।
अध्ययन की संरचना और पद्धति
नासा के इस विशेष शोध कार्यक्रम में ISS पर लंबे मिशन पूरे कर चुके 20 एस्ट्रोनॉट्स को शामिल किया जाएगा। तुलनात्मक विश्लेषण के लिए समान आयु और शारीरिक बनावट वाले 20 अन्य प्रतिभागियों को भी अध्ययन का हिस्सा बनाया जाएगा, ताकि सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया और अंतरिक्ष यात्रा के प्रभावों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके।
यह निगरानी स्पेस मिशन के बाद पाँच वर्षों तक जारी रहेगी। शोध के दौरान प्रतिभागियों की दृष्टि क्षमता, देखने का दायरा और आंखों के अंदर के दबाव का परीक्षण किया जाएगा। मस्तिष्क की स्थिति आंकने के लिए MRI स्कैन, न्यूरोलॉजिकल परीक्षण, संज्ञानात्मक मूल्यांकन (cognitive assessment) और रक्त परीक्षण भी किए जाएंगे।
वैज्ञानिक महत्व और भविष्य की तैयारी
यह ऐसे समय में आया है जब नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियाँ आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत चंद्रमा पर मानव वापसी और अंततः मंगल मिशन की तैयारी कर रही हैं। इन मिशनों में एस्ट्रोनॉट्स को महीनों या वर्षों तक अंतरिक्ष में रहना होगा, जिससे SANS जैसी स्थितियों का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
गौरतलब है कि अब तक के अधिकांश स्वास्थ्य अध्ययन ISS पर छह महीने तक के मिशनों पर केंद्रित रहे हैं। मंगल यात्रा में दो से तीन वर्षों का समय लग सकता है, जिसका अर्थ है कि SANS के दीर्घकालिक प्रभावों को समझना अब केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि मिशन सुरक्षा की अनिवार्यता बन गई है।
आगे क्या होगा
नासा का मानना है कि इस अध्ययन से प्राप्त डेटा वैज्ञानिकों को यह तय करने में मदद करेगा कि अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए किन अतिरिक्त उपायों — जैसे कि विशेष दवाइयाँ, व्यायाम प्रोटोकॉल या दबाव-नियंत्रण तकनीक — की आवश्यकता है। शोध के निष्कर्ष भविष्य के गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए चिकित्सा दिशानिर्देश तैयार करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।