मोदी-शी मुलाकात से भारत-चीन संबंधों में नई उम्मीद, JNU प्रोफेसर दीपक बोले — प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर बदलाव संभव
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान 12 सितंबर 2026 को हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक को विशेषज्ञ भारत-चीन संबंधों में एक नई दिशा की शुरुआत मान रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के सेंटर फॉर चाइनीज़ स्टडीज़ के प्रोफेसर बी.आर. दीपक के अनुसार, यह मुलाकात दोनों देशों के बीच 'प्रतिस्पर्धा से नियंत्रित सहयोग' की ओर एक व्यावहारिक बदलाव की संभावना पैदा करती है।
बैठक में क्या हुआ
12 सितंबर को नई दिल्ली में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में दोनों नेताओं ने भारत-चीन संबंधों को स्थिर और दीर्घकालिक दिशा देने पर बल दिया। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति एवं स्थिरता बनाए रखने, सीमा विवाद के न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान खोजने तथा मतभेदों को विवाद में तब्दील न होने देने पर सहमति जताई। साथ ही दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार मानते हुए व्यापार, बाज़ार पहुँच, निवेश और आपूर्ति-शृंखला में सहयोग को मज़बूत करने का संकल्प व्यक्त किया गया।
विशेषज्ञ का विश्लेषण
प्रोफेसर बी.आर. दीपक ने कहा कि सीमा पर तनाव कम होने से दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक जोखिम घट सकते हैं। उनके अनुसार व्यापार, निवेश, विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा और आपूर्ति-शृंखला में सहयोग बढ़ने की अच्छी संभावना है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सीधी विमान सेवाओं की बहाली और लोगों के बीच आवाजाही बढ़ने से पर्यटन, शिक्षा और व्यावसायिक संपर्क मज़बूत हो सकते हैं।
रणनीतिक महत्त्व और चुनौतियाँ
प्रोफेसर दीपक के अनुसार, भारत के लिए स्थिर द्विपक्षीय संबंध उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को और सुदृढ़ करेंगे, जबकि चीन को एशिया में स्थिरता और नए आर्थिक अवसर प्राप्त होंगे। हालाँकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीमा विवाद अभी लंबित है और व्यापार असंतुलन तथा आर्थिक-तकनीकी निर्भरता जैसी चुनौतियाँ बनी रहेंगी। इसके अलावा, अमेरिका और जापान सहित अन्य रणनीतिक साझेदारों के साथ संतुलन बनाए रखना भारत के लिए अहम होगा।
बहुपक्षीय मंचों पर असर
बैठक में ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर आपसी सहयोग बढ़ाने की भी प्रतिबद्धता व्यक्त की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे विकासशील देशों की आवाज़ वैश्विक मंचों पर अधिक प्रभावी ढंग से उठाई जा सकेगी। गौरतलब है कि ब्रिक्स अब एक बड़े और प्रभावशाली मंच के रूप में उभर रहा है, जो 'ग्लोबल साउथ' की बढ़ती सामूहिक शक्ति का प्रतीक बनता जा रहा है।
आगे की राह
यह ऐसे समय में आया है जब एशिया की दोनों बड़ी शक्तियों के बीच 2020 के गलवान संघर्ष के बाद से संबंध काफी तनावपूर्ण रहे हैं। प्रोफेसर दीपक के अनुसार इस शिखर वार्ता से उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश अपने मतभेदों को किनारे रखकर दूरदृष्टि से काम करेंगे। हालाँकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि घोषणाओं का असली परीक्षण ज़मीन पर अमल में होगा।