निदुमोलु सुमति: मृदंगम में महिलाओं की राह खोलने वाली पहली पेशेवर वादक, पद्म श्री से सम्मानित
सारांश
मुख्य बातें
निदुमोलु सुमति भारत की पहली पेशेवर महिला मृदंगम वादकों में से एक हैं, जिन्होंने दशकों तक पुरुष-प्रधान रहे इस शास्त्रीय वाद्य क्षेत्र में महिलाओं के लिए एक नई लकीर खींची। 16 अक्टूबर 1950 को आंध्र प्रदेश के एलुरु में जन्मी सुमति ने न केवल मंच पर अपनी पहचान बनाई, बल्कि भारत और विदेशों में पीढ़ियों को प्रशिक्षित कर एक समृद्ध परंपरा की नींव भी रखी। उनकी इस यात्रा को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2010) और पद्म श्री (2021) जैसे शीर्ष सम्मानों से मान्यता मिली है।
संगीत की विरासत और बचपन की शुरुआत
सुमति के पिता निदुमोलु राघवैय्या स्वयं मृदंगम वादन में दक्ष थे। इसी वातावरण में पली-बढ़ी सुमति ने मात्र छह वर्ष की आयु में अपने पिता से मृदंगम की प्रारंभिक शिक्षा लेनी शुरू की। वाद्य यंत्रों के प्रति उनका लगाव इतना गहरा था कि वह घंटों अभ्यास में डूबी रहती थीं।
गौरतलब है कि उस दौर में मृदंगम को सर्वथा पुरुषों का वाद्य माना जाता था और किसी महिला का इस क्षेत्र में पेशेवर रूप से आगे बढ़ना लगभग अकल्पनीय था। सुमति ने इस रूढ़ धारणा को अपनी थाप से चुनौती दी।
गुरु और जीवन-साथी: दंडमुडी राममोहन राव
1964 में सुमति के पिता ने उन्हें प्रसिद्ध मृदंगम वादक दंडमुडी राममोहन राव के मार्गदर्शन में भेजा, क्योंकि वे उनकी वादन शैली से अत्यंत प्रभावित थे। राममोहन राव के सानिध्य में सुमति की प्रतिभा और निखरती गई, और कालांतर में उन्होंने अपने गुरु से विवाह कर लिया।
सुमति आज भी राममोहन राव को ज्ञान का अक्षय स्रोत और एक असाधारण वाद्य कलाकार के रूप में याद करती हैं। उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए सुमति ने 'लय वेदिका' नामक संस्था की स्थापना की, जो अब उन्हीं के नाम पर समर्पित है।
मंच पर महारत: दिग्गजों के साथ संगत
सुमति ने भारत और विदेशों में अनेक प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में प्रस्तुति दी। उनके करियर का एक उल्लेखनीय पहलू यह है कि उन्होंने एमएस सुब्बुलक्ष्मी, डॉ. एम. बालमुरलीकृष्ण और पंडित भीमसेन जोशी जैसे शास्त्रीय संगीत के महारथियों के साथ संगत की।
यह ऐसे समय में आया जब संगत-वाद्य के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति नगण्य थी। सुमति का मंच पर इन दिग्गजों के साथ बैठना अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण था। वह भारत की पहली महिला 'लय विन्यासम' कलाकार भी बनीं — एक ऐसी उपलब्धि जो उनके समर्पण और असाधारण तकनीकी दक्षता की गवाही देती है।
राष्ट्रीय सम्मान और विरासत
संगीत नाटक अकादमी ने 2009 में सुमति को अपने प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना और सितंबर 2010 में यह सम्मान उन्हें प्रदान किया गया। इसके बाद 2021 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से विभूषित किया।
'लय वेदिका' के माध्यम से सुमति आज भी नई पीढ़ी को मृदंगम की बारीकियाँ सिखा रही हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि उन्होंने जो द्वार खोला वह आने वाली महिला कलाकारों के लिए सदा के लिए खुला रहे।
आम जनता पर असर और आगे की राह
सुमति की यात्रा यह स्थापित करती है कि शास्त्रीय संगीत की कोई भी विधा किसी एक लिंग की बपौती नहीं है। उनके उदाहरण ने दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत के अन्य परंपरागत पुरुष-प्रधान वाद्यों — जैसे घटम और तवील — में भी महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित किया है। उनकी विरासत केवल एक कलाकार की नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आंदोलन की है जो निरंतर आगे बढ़ रही है।