उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षक: माधुरी बड़थ्वाल की प्रेरक यात्रा
सारांश
Key Takeaways
- माधुरी बड़थ्वाल का जन्म १९५३ में हुआ था।
- उन्होंने लोक संगीत और संस्कृति को समर्पित किया।
- उनकी संस्था ने कई युवाओं को प्रशिक्षित किया।
- उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
- वे महिलाओं को सशक्त बनाने में सक्रिय हैं।
नई दिल्ली, १८ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। १९ मार्च... यह केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि उस दिन का प्रतीक है जब उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के सुरम्य हिल स्टेशन लैंसडाउन में एक ऐसी प्रतिभा का जन्म हुआ, जिसने अपना जीवन लोक संगीत और संस्कृति को समर्पित कर दिया। माधुरी बड़थ्वाल, जो १९५३ में इसी दिन पैदा हुईं, ने अपनी कला के माध्यम से लोगों के दिलों में जगह बनाई है और आज भी उत्तराखंड की लोक धरोहर को सहेज कर रखा है।
माधुरी का बचपन लैंसडाउन के घने देवदार के जंगलों और पहाड़ों के बीच बीता। उन्हें बचपन से ही संगीत में गहरी रुचि थी। उनके पिता, चंद्रमणि उनियाल, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित गायक और सितार वादक थे, ने माधुरी को प्रयाग संगीत समिति से संगीत की विधिवत शिक्षा दिलाई। इस शिक्षा ने उन्हें ऑल इंडिया रेडियो की पहली महिला संगीतकार बनने का मार्ग प्रशस्त किया।
हाई स्कूल के बाद, माधुरी ने संगीत प्रभाकर की डिग्री प्राप्त की और इसके बाद राजकीय इंटर कॉलेज, लैंसडाउन में संगीत अध्यापिका के रूप में कार्य किया। लेकिन उनका असली जादू तब शुरू हुआ जब उन्होंने आकाशवाणी नजीबाबाद के लिए संगीत रचनाएं तैयार करना शुरू किया।
आकाशवाणी के कार्यक्रम 'धरोहर' के माध्यम से माधुरी बड़थ्वाल ने उत्तराखंड के लोक संगीत, नाटक और लोक गाथाओं को केवल प्रचारित नहीं किया, बल्कि उन्हें एक नई पहचान भी दी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोक संगीत सिर्फ एक परंपरा नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
माधुरी ने परंपराओं को तोड़ते हुए महिलाओं की मांगल टीम बनाई और उन्हें ढोल बजाने में दक्ष बनाया। उनके योगदान को मान्यता देते हुए 'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस- २०१९' पर तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुरस्कार उनके निरंतर प्रयासों का प्रतीक था, जिसमें उन्होंने लोक परंपराओं और संगीत को नई पीढ़ी तक पहुँचाया।
माधुरी बड़थ्वाल की संस्था 'मनु लोक सांस्कृतिक धरोहर संवर्धन संस्थान' ने भी लोक संगीत, वाद्य यंत्र और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने कई युवाओं को प्रशिक्षित किया और यह सुनिश्चित किया कि उत्तराखंड की लोक धरोहर हमेशा जीवित रहे।
उनकी मेहनत के फलस्वरूप, भारत सरकार ने २०२२ में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके जीवन की मेहनत और लोक संगीत के प्रति उनके समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण है। आज भी माधुरी बड़थ्वाल अपने कार्य में सक्रिय हैं। चाहे वह नई पीढ़ी को संगीत सिखाना हो, लोक वाद्य यंत्रों का संरक्षण करना हो या महिलाओं को ढोल बजाने में सक्षम बनाना हो, वे हर क्षेत्र में प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं।