तृप्ति मुर्गंडे: दक्षिण एशियाई खेलों में 5 स्वर्ण, 2006 कॉमनवेल्थ में भारत को ब्रॉन्ज दिलाने वाली बैडमिंटन स्टार
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय बैडमिंटन की दिग्गज खिलाड़ी तृप्ति मुर्गंडे ने उस युग में अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन किया, जब भारतीय खिलाड़ियों को आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं और संसाधनों से वंचित रहना पड़ता था। दक्षिण एशियाई खेलों में 5 स्वर्ण पदक और 2006 मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय टीम के साथ कांस्य पदक जीतने वाली तृप्ति ने अपनी कड़ी मेहनत और अदम्य जिजीविषा से भारतीय महिला बैडमिंटन को नई ऊँचाइयाँ दीं। 2009 में राष्ट्रीय महिला एकल चैंपियन बनने से पहले उन्होंने तीन बार फाइनल में हार झेली — और हर बार और मज़बूत होकर उठीं।
प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण
3 जून 1982 को पुणे में जन्मी तृप्ति मुर्गंडे को बचपन से ही बैडमिंटन की ओर गहरा आकर्षण था। मात्र नौ वर्ष की आयु में उन्होंने पुणे की एक बैडमिंटन अकादमी में प्रवेश लिया और कोच वसंत गोरे के मार्गदर्शन में खेल की बारीकियाँ सीखीं। जैसे-जैसे उनकी प्रतिभा निखरती गई, वह उच्च स्तरीय प्रशिक्षण की तलाश में बेंगलुरु पहुँचीं और वहाँ प्रकाश पादुकोण बैडमिंटन अकादमी में कोचिंग ली। इस समर्पण का परिणाम यह रहा कि वह जल्द ही जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय चैंपियन बन गईं।
राष्ट्रीय चैंपियन बनने का संघर्ष
सीनियर राष्ट्रीय खिताब की राह तृप्ति के लिए आसान नहीं थी। वह तीन बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप के फाइनल तक पहुँचीं, लेकिन तीनों मौकों पर खिताबी मुकाबले में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। यह हार उनके इरादे को तोड़ नहीं सकी। आखिरकार वर्ष 2009 में उन्होंने चौथे प्रयास में महिला एकल राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतकर अपना सपना पूरा किया। गौरतलब है कि यह जीत उनके करियर की सबसे बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धियों में से एक मानी जाती है।
अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियाँ
दक्षिण एशियाई खेलों में तृप्ति का प्रदर्शन असाधारण रहा। उन्होंने इस प्रतिष्ठित क्षेत्रीय प्रतियोगिता में कुल 5 स्वर्ण पदक जीते, जिनमें 2004 और 2006 की एकल स्पर्धाओं के स्वर्ण पदक भी शामिल हैं। 2006 में मेलबर्न में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में वह भारतीय दल का अभिन्न हिस्सा रहीं और टीम स्पर्धा में कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अपने करियर के दौरान उन्होंने 6 अंतरराष्ट्रीय खिताब भी अपने नाम किए।
ध्यानचंद पुरस्कार और संन्यास के बाद का योगदान
बैडमिंटन में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2020 में प्रतिष्ठित ध्यानचंद पुरस्कार से सम्मानित किया। खेल से संन्यास लेने के बाद भी तृप्ति ने बैडमिंटन से नाता नहीं तोड़ा। वह भारतीय राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम की चयनकर्ता रहीं और खेलो इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत टैलेंट स्काउट के रूप में कार्य करते हुए अनेक युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया।
प्रेरणा और विरासत
तृप्ति मुर्गंडे स्वयं कहती हैं कि खेल ने उन्हें विपरीत परिस्थितियों में डटे रहना और आगे बढ़ते रहने का हुनर सिखाया। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय महिला बैडमिंटन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए संसाधनों और समर्थन की भारी कमी थी। उनकी यात्रा आज भी उन युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो सीमित साधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।