पद्मा बंदोपाध्याय: भारतीय वायुसेना की पहली महिला एयर वाइस मार्शल, जिन्होंने उपहास को उपलब्धि में बदला
सारांश
मुख्य बातें
डॉ. पद्मा बंदोपाध्याय ने वह कर दिखाया जिसे उनके दौर में असंभव माना जाता था — भारतीय वायुसेना में पहली महिला एयर वाइस मार्शल बनकर। जब उन्होंने 1960 के दशक में फौज में जाने की इच्छा जताई, तो लोग उन पर हँसते थे और कहते थे कि लड़की होकर सेना में क्या करोगी — लेकिन पद्मा ने इस उपहास को अपनी प्रेरणा बनाया। 2002 में एयर वाइस मार्शल के पद पर पदोन्नत होने के साथ उन्होंने भारतीय सैन्य इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
डॉ. पद्मा बंदोपाध्याय का जन्म 4 नवंबर 1944 को आंध्र प्रदेश के तिरुपति में एक तमिल भाषी अय्यर परिवार में हुआ था। बचपन किसी परीक्षा से कम नहीं था — महज चार-पाँच साल की उम्र में ही उनकी माँ गंभीर रूप से टीबी से पीड़ित हो गईं और छोटी पद्मा ने उनकी देखभाल की जिम्मेदारी उठा ली।
प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में हुई। उम्र कम होने के कारण कई कॉलेजों ने दाखिला देने से मना कर दिया, लेकिन उनके पिता ने हार नहीं मानी और अधिकारियों से बार-बार गुहार लगाई। आखिरकार किरोड़ीमल कॉलेज ने उन्हें प्री-मेडिकल में प्रवेश दिया।
सेना में जाने की प्रेरणा
पद्मा का शुरुआती सपना आईएएस अधिकारी बनने का था। किंतु 1962 के भारत-चीन युद्ध ने उनकी दिशा बदल दी। उनके एक पुराने साक्षात्कार के अनुसार, दिल्ली के गोल मार्केट इलाके में उनके आसपास के कई परिवारों ने युद्ध में अपने प्रियजनों को खोया था। उस हानि ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी और उनका लक्ष्य बदल गया — देश के लिए कुछ करने का संकल्प लिया।
जब भी पद्मा किसी से फौज में भर्ती होने की बात करतीं, तो प्रतिक्रिया हँसी और अविश्वास से भरी होती। यह ऐसे समय की बात है जब महिलाओं के लिए सेना में जगह लगभग अकल्पनीय मानी जाती थी। पद्मा ने इस सामाजिक दबाव को नकारते हुए 1963 में पुणे के आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया।
वायुसेना में प्रवेश और उपलब्धियाँ
पाँच वर्षीय मेडिकल पढ़ाई पूरी करने के बाद 1968 में डॉ. पद्मा भारतीय वायुसेना में एक चिकित्सक के रूप में शामिल हुईं। सेना, नौसेना और वायुसेना में से उन्होंने अपनी पसंद से वायुसेना को चुना। शीघ्र ही उनकी जिज्ञासा और साहस ने उन्हें विमानन चिकित्सा (एविएशन मेडिसिन) के क्षेत्र में आगे ले गई, जहाँ उन्होंने पायलटों के साथ उड़ान भरने का अनुभव भी हासिल किया। इसी दौरान विंग कमांडर एस.एन. बंदोपाध्याय से उनकी मुलाकात हुई, जिनसे उन्होंने विवाह किया और दोनों ने वायुसेना में अपनी सेवाएँ जारी रखीं।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वह पंजाब बॉर्डर पर तैनात थीं। उनके साक्षात्कार के अनुसार, उस समय वह वहाँ अकेली महिला अधिकारी थीं और उनका शिशु मात्र छह-सात महीने का था। बंकरों में रहते हुए और हर ओर खतरे के बीच उन्होंने अपनी ड्यूटी से मुँह नहीं मोड़ा। युद्ध में उनकी सेवाओं के लिए उन्हें विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया।
1978 में वह डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज का कोर्स पूरा करने वाली पहली महिला अधिकारी बनीं। इसके अतिरिक्त, वह उत्तरी ध्रुव पर वैज्ञानिक शोध करने वाली पहली भारतीय महिला भी हैं — एक उपलब्धि जो उनकी वैज्ञानिक जिज्ञासा को रेखांकित करती है। उन्होंने भारतीय एयरोस्पेस मेडिकल सोसाइटी में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और ऊँचाई वाले क्षेत्रों में तैनात सैनिकों के लिए हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा तथा हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा जैसी जानलेवा समस्याओं से बचाव के उपाय विकसित किए।
ऐतिहासिक पदोन्नति और सम्मान
2002 में डॉ. पद्मा बंदोपाध्याय एयर वाइस मार्शल के पद पर पदोन्नत होने वाली भारतीय वायुसेना की पहली महिला बनीं। आगे चलकर वह भारतीय वायुसेना की पहली महिला एयर मार्शल भी बनीं। उनकी असाधारण सेवाओं के लिए उन्हें अति विशिष्ट सेवा पदक और परम विशिष्ट सेवा पदक प्रदान किए गए। 2020 में चिकित्सा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।
महिलाओं को उनका संदेश
डॉ. पद्मा बंदोपाध्याय के अनुसार, सेना में शामिल होना केवल वर्दी पहनने का रोमांच नहीं है — इसके लिए मानसिक दृढ़ता, अनुशासन और विपरीत परिस्थितियों में डटे रहने का जज्बा अनिवार्य है। उनका स्पष्ट मत था कि सेना में महिलाओं को भी एक आम सैनिक की भाँति हर कठिन परिस्थिति का सामना करना होता है और महिला होने के नाम पर जिम्मेदारियों से नहीं बचा जा सकता। उनका जीवन उन तमाम युवतियों के लिए एक जीवंत प्रमाण है, जो आज भी उपहास और सामाजिक अपेक्षाओं की बेड़ियों से लड़ रही हैं।