सरला ठकराल: जब महिलाओं ने आसमान में भरी उड़ान, साड़ी में छेड़ी क्रांति

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सरला ठकराल: जब महिलाओं ने आसमान में भरी उड़ान, साड़ी में छेड़ी क्रांति

सारांश

सरला ठकराल की कहानी एक साहसिकता और प्रेरणा का प्रतीक है। भारत की पहली महिला पायलट ने पारंपरिक बंधनों को तोड़ते हुए आसमान में उड़ान भरी, जो आज भी महिलाओं के आत्मविश्वास को प्रज्वलित करती है।

Key Takeaways

  • सरला ठकराल ने पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए पायलट बनने का साहस दिखाया।
  • उन्होंने साड़ी पहनकर आसमान में उड़ान भरी, जो उस समय असाधारण था।
  • उनकी कहानी ने कई महिलाओं को प्रेरित किया और आत्मविश्वास बढ़ाया।
  • सरला ने चित्रकला और वस्त्र डिजाइनिंग में भी सफलता प्राप्त की।
  • उनकी उपलब्धियों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए नए रास्ते खोले।

नई दिल्ली, 14 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। एक समय ऐसा था जब भारत में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी कई सामाजिक बंधनों में जकड़ा हुआ था। सपने देखना तो दूर, उन्हें पूरा करने की कल्पना करना भी साहसिक माना जाता था। लेकिन इसी समय एक भारतीय महिला ने उन सभी सीमाओं को तोड़ते हुए आसमान को छू लिया। यह कहानी है, भारत की पहली महिला पायलट सरला ठकराल की, जिनकी उड़ान केवल एक विमान की उड़ान नहीं थी, बल्कि भारतीय महिलाओं के आत्मविश्वास और सपनों की उड़ान थी।

15 मार्च 1914 को दिल्ली में जन्मी सरला ठकराल ने महज 21 साल की उम्र में वह कर दिखाया, जिसकी उस समय कल्पना भी बहुत कम लोग कर सकते थे। साल 1936 में, उन्होंने पायलट लाइसेंस प्राप्त किया और एक छोटे दो पंखों वाले विमान 'जिप्सी मॉथ' को उड़ाकर इतिहास रच दिया।

सबसे खास बात यह थी कि उस दौर में भी उन्होंने पारंपरिक साड़ी पहनकर विमान उड़ाया। यह दृश्य उस समय के लिए बेहद असाधारण था, क्योंकि विमानन के कॉकपिट में आमतौर पर सिर्फ पुरुष ही दिखाई देते थे। सरला की यह उड़ान उस समय के समाज के लिए एक संदेश थी कि आकाश केवल पुरुषों का नहीं, महिलाओं का भी है।

सरला ठकराल की शादी एक ऐसे परिवार में हुई थी, जहां पहले से पायलट थे। खुद उनके पति एयरमेल पायलट थे। परिवार के इसी माहौल और पति की प्रेरणा से उन्होंने लाहौर फ्लाइंग क्लब में पायलट बनने का प्रशिक्षण शुरू किया। कड़ी मेहनत और लगन के साथ उन्होंने करीब 1,000 घंटे की उड़ान पूरी की और अपना 'ए' लाइसेंस हासिल किया।

इसके बाद वे वाणिज्यिक पायलट बनने की तैयारी कर रही थीं। लेकिन तभी इतिहास ने करवट ली। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के कारण नागरिक उड्डयन प्रशिक्षण बंद कर दिया गया। इसके चलते सरला ठकराल का वाणिज्यिक पायलट बनने का सपना अधूरा रह गया।

इसी बीच, सरला ठकराल की जिंदगी ने एक और ऐसा मोड़ आया, जिसने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया। उनके पति का एक प्लेन क्रैश में निधन हो गया था। इससे उन्हें गहरा सदमा लगा और आसमान की उड़ान लगभग मानो थम सी गई। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी। वे मेयो स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाई करने लाहौर लौट आईं और यहां बंगाल स्कूल ऑफ पेंटिंग में ट्रेनिंग ली। बाद में, उन्हें ललित कला डिप्लोमा मिला।

जब भारत विभाजन हुआ और उसका एक हिस्सा पाकिस्तान का रूप ले चुका था, तब सरला को लाहौर छोड़ना पड़ा और वे वापस दिल्ली लौट आईं। आगे चलकर उन्होंने चित्रकला, आभूषण डिजाइन और वस्त्र डिजाइनिंग में एक सफल करियर बनाया। इस तरह उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होती।

सरला ठकराल की उपलब्धि ने आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं के लिए नए रास्ते खोले। उनकी प्रेरणा से कई भारतीय महिलाओं ने विमानन क्षेत्र में कदम रखा और अपने सपनों को साकार किया। 15 मार्च 2008 को सरला ठकराल का निधन हो गया, लेकिन उनकी कहानी आज भी साहस, आत्मविश्वास और सपनों को पूरा करने की प्रेरणा देती है।

Point of View

बल्कि यह समाज में महिलाओं की भूमिका और उनके आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है। उनकी उपलब्धियों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना है।
NationPress
15/03/2026

Frequently Asked Questions

सरला ठकराल कौन थीं?
सरला ठकराल भारत की पहली महिला पायलट थीं, जिन्होंने 1936 में पायलट लाइसेंस प्राप्त किया।
सरला ठकराल ने कौन सा विमान उड़ाया?
उन्होंने 'जिप्सी मॉथ' नामक दो पंखों वाले विमान को उड़ाया।
सरला ठकराल की उपलब्धियों का क्या महत्व है?
उनकी उपलब्धियों ने भारतीय महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाया और विमानन क्षेत्र में कदम रखने के लिए प्रेरित किया।
सरला ठकराल की शादी किससे हुई थी?
उनकी शादी एक पायलट परिवार में हुई थी, जहां उनके पति भी एयरमेल पायलट थे।
सरला ठकराल का निधन कब हुआ?
सरला ठकराल का निधन 15 मार्च 2008 को हुआ।
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