स्कूल छोड़ चुके 2 करोड़ बच्चों को वापस लाने की योजना: शिक्षा मंत्रालय ने 10 पायलट जिलों में NIOS पहल की रणनीति तय की
सारांश
मुख्य बातें
शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीओएसईएल) के सचिव संजय कुमार की अध्यक्षता में 16 मई 2025 को नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें 14-18 वर्ष आयु वर्ग के स्कूल न जाने वाले बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। नवीनतम पीएलएफएस (आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण) अनुमानों के अनुसार, इस समय देश में 2 करोड़ से अधिक बच्चे इस आयु वर्ग में स्कूल नहीं जाते। इस पहल के पहले चरण में 9 राज्यों के 10 पायलट जिलों में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) के माध्यम से कार्यक्रम लागू किया जाएगा।
बैठक में कौन शामिल हुए और क्या तय हुआ
बैठक में डीओएसईएल की संयुक्त सचिव प्राची पांडे, एनआईओएस के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा, सचिव कर्नल शकील अहमद, शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्य सरकारों के प्रतिनिधि और चिन्हित पायलट जिलों के जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट उपस्थित रहे। बैठक में यह तय किया गया कि पहल के औपचारिक शुभारंभ से पहले एनआईओएस फैसिलिटेटर्स का नामांकन, स्टार्टर किट का वितरण, प्रारंभिक सर्वेक्षण और बच्चों का शुरुआती नामांकन पूरा किया जाएगा।
स्कूल छोड़ने के कारण और समस्या की गंभीरता
सचिव संजय कुमार ने बताया कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कक्षा एक में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 62 ही कक्षा 12 तक पहुँच पाते हैं — यानी लगभग 38% बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। उन्होंने कहा कि आर्थिक मजबूरियाँ, घरेलू जिम्मेदारियाँ और आजीविका से जुड़ी चुनौतियाँ इसके प्रमुख कारण हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर बच्चे को कम से कम माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा और स्थानीय आर्थिक अवसरों के अनुरूप रोजगारपरक कौशल मिलना चाहिए।
NIOS और ओपन लर्निंग की भूमिका
एनआईओएस के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा ने इस पहल को शैक्षिक समावेशन का एक 'जन-आंदोलन' बताया, जिसका उद्देश्य लचीले एवं समावेशी शैक्षिक माध्यमों के ज़रिए बच्चों को सीखने के अवसरों से फिर से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनौती उन बच्चों तक पहुँचने की है जो शिक्षा प्रणाली से पूरी तरह कट चुके हैं। कर्नल शकील अहमद ने संचालनात्मक ढाँचे पर विस्तृत प्रस्तुति दी, जिसमें ऐप-आधारित मैपिंग एवं मॉनिटरिंग सिस्टम, प्रोत्साहन तंत्र और जिला-स्तरीय एकीकरण रणनीतियाँ शामिल थीं। जो बच्चे नियमित स्कूलों में वापस नहीं लौट सकते, उनके लिए ओपन और डिस्टेंस लर्निंग (ओडीएल) व्यवस्था के तहत एनआईओएस और राज्य मुक्त विद्यालयों का विकल्प दिया जाएगा।
पायलट जिले और कार्यान्वयन योजना
पहले चरण में ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और दिल्ली के उन जिलों को चुना गया है जहाँ स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या सर्वाधिक है। इन राज्यों के साथ 'प्रतिबद्धता ज्ञापन' (एमओसी) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। पायलट जिलों से प्राप्त अनुभव के आधार पर कार्यक्रम को बाद में पूरे देश में विस्तार दिया जाएगा। संयुक्त सचिव प्राची पांडे ने कहा कि इस समस्या को मिशन मोड में हल किया जा रहा है और डेटा-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, जिसमें अंतिम छोर तक पहुँचने पर विशेष ध्यान होगा।
आगे की राह
बैठक का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि कोई भी बच्चा शिक्षा प्रणाली से बाहर न रहे। भाग लेने वाले सभी राज्यों और जिला प्रशासनों ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया और प्रासंगिक डेटा साझा करने तथा संचालन संबंधी दिशानिर्देशों को मजबूत बनाने में योगदान देने पर सहमति जताई। यह पहल भारत में शैक्षिक समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है, बशर्ते जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन उतना ही सुदृढ़ हो जितनी नीतिगत मंशा है।