स्कूल छोड़ चुके 2 करोड़ बच्चों को वापस लाने की योजना: शिक्षा मंत्रालय ने 10 पायलट जिलों में NIOS पहल की रणनीति तय की

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स्कूल छोड़ चुके 2 करोड़ बच्चों को वापस लाने की योजना: शिक्षा मंत्रालय ने 10 पायलट जिलों में NIOS पहल की रणनीति तय की

सारांश

देश में 14-18 वर्ष के 2 करोड़ से अधिक बच्चे स्कूल से बाहर हैं और कक्षा 1 में दाखिल हर 100 में से केवल 62 कक्षा 12 तक पहुँचते हैं। शिक्षा मंत्रालय ने NIOS के ज़रिए 9 राज्यों के 10 पायलट जिलों में इन बच्चों को मुख्यधारा में लाने की रणनीति तय की है — यह पहल 'जन-आंदोलन' बनाने की कोशिश है।

मुख्य बातें

डीओएसईएल सचिव संजय कुमार की अध्यक्षता में 16 मई 2025 को उच्चस्तरीय बैठक में स्कूल-बाहर बच्चों की समस्या पर रणनीति तय की गई।
नवीनतम पीएलएफएस अनुमानों के अनुसार 14-18 वर्ष आयु वर्ग के 2 करोड़ से अधिक बच्चे स्कूल नहीं जाते।
कक्षा 1 में दाखिल हर 100 बच्चों में से केवल 62 ही कक्षा 12 तक पहुँच पाते हैं।
पहले चरण में 9 राज्यों — ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और दिल्ली — के 10 पायलट जिलों में पहल लागू होगी।
राज्यों के साथ 'प्रतिबद्धता ज्ञापन (एमओसी)' पर हस्ताक्षर होंगे; ऐप-आधारित मैपिंग और मॉनिटरिंग सिस्टम से निगरानी की जाएगी।
नियमित स्कूल न लौट सकने वाले बच्चों के लिए एनआईओएस और राज्य मुक्त विद्यालयों के ज़रिए ओडीएल का विकल्प दिया जाएगा।

शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग (डीओएसईएल) के सचिव संजय कुमार की अध्यक्षता में 16 मई 2025 को नई दिल्ली में एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें 14-18 वर्ष आयु वर्ग के स्कूल न जाने वाले बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। नवीनतम पीएलएफएस (आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण) अनुमानों के अनुसार, इस समय देश में 2 करोड़ से अधिक बच्चे इस आयु वर्ग में स्कूल नहीं जाते। इस पहल के पहले चरण में 9 राज्यों के 10 पायलट जिलों में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) के माध्यम से कार्यक्रम लागू किया जाएगा।

बैठक में कौन शामिल हुए और क्या तय हुआ

बैठक में डीओएसईएल की संयुक्त सचिव प्राची पांडे, एनआईओएस के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा, सचिव कर्नल शकील अहमद, शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, विभिन्न राज्य सरकारों के प्रतिनिधि और चिन्हित पायलट जिलों के जिला कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट उपस्थित रहे। बैठक में यह तय किया गया कि पहल के औपचारिक शुभारंभ से पहले एनआईओएस फैसिलिटेटर्स का नामांकन, स्टार्टर किट का वितरण, प्रारंभिक सर्वेक्षण और बच्चों का शुरुआती नामांकन पूरा किया जाएगा।

स्कूल छोड़ने के कारण और समस्या की गंभीरता

सचिव संजय कुमार ने बताया कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कक्षा एक में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 62 ही कक्षा 12 तक पहुँच पाते हैं — यानी लगभग 38% बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। उन्होंने कहा कि आर्थिक मजबूरियाँ, घरेलू जिम्मेदारियाँ और आजीविका से जुड़ी चुनौतियाँ इसके प्रमुख कारण हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हर बच्चे को कम से कम माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा और स्थानीय आर्थिक अवसरों के अनुरूप रोजगारपरक कौशल मिलना चाहिए।

NIOS और ओपन लर्निंग की भूमिका

एनआईओएस के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्रा ने इस पहल को शैक्षिक समावेशन का एक 'जन-आंदोलन' बताया, जिसका उद्देश्य लचीले एवं समावेशी शैक्षिक माध्यमों के ज़रिए बच्चों को सीखने के अवसरों से फिर से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनौती उन बच्चों तक पहुँचने की है जो शिक्षा प्रणाली से पूरी तरह कट चुके हैं। कर्नल शकील अहमद ने संचालनात्मक ढाँचे पर विस्तृत प्रस्तुति दी, जिसमें ऐप-आधारित मैपिंग एवं मॉनिटरिंग सिस्टम, प्रोत्साहन तंत्र और जिला-स्तरीय एकीकरण रणनीतियाँ शामिल थीं। जो बच्चे नियमित स्कूलों में वापस नहीं लौट सकते, उनके लिए ओपन और डिस्टेंस लर्निंग (ओडीएल) व्यवस्था के तहत एनआईओएस और राज्य मुक्त विद्यालयों का विकल्प दिया जाएगा।

पायलट जिले और कार्यान्वयन योजना

पहले चरण में ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और दिल्ली के उन जिलों को चुना गया है जहाँ स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या सर्वाधिक है। इन राज्यों के साथ 'प्रतिबद्धता ज्ञापन' (एमओसी) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। पायलट जिलों से प्राप्त अनुभव के आधार पर कार्यक्रम को बाद में पूरे देश में विस्तार दिया जाएगा। संयुक्त सचिव प्राची पांडे ने कहा कि इस समस्या को मिशन मोड में हल किया जा रहा है और डेटा-आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा, जिसमें अंतिम छोर तक पहुँचने पर विशेष ध्यान होगा।

आगे की राह

बैठक का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि कोई भी बच्चा शिक्षा प्रणाली से बाहर न रहे। भाग लेने वाले सभी राज्यों और जिला प्रशासनों ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया और प्रासंगिक डेटा साझा करने तथा संचालन संबंधी दिशानिर्देशों को मजबूत बनाने में योगदान देने पर सहमति जताई। यह पहल भारत में शैक्षिक समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है, बशर्ते जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन उतना ही सुदृढ़ हो जितनी नीतिगत मंशा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी हर सरकार में नई 'पहल' की घोषणाएँ होती रहती हैं। असली परीक्षा यह है कि क्या इस बार ऐप-आधारित मॉनिटरिंग और एमओसी जैसे तंत्र केवल कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाएंगे या जमीनी स्तर पर बदलाव लाएंगे। गौरतलब है कि ड्रॉपआउट के मूल कारण — आर्थिक विवशता और बाल श्रम — शिक्षा विभाग के अकेले दायरे से बाहर हैं; बिना श्रम, सामाजिक कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्रालयों के समन्वय के, यह 'जन-आंदोलन' एक और अधूरी कोशिश बनकर रह सकता है।
RashtraPress
16 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिक्षा मंत्रालय की यह नई पहल क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
यह पहल 14-18 वर्ष आयु वर्ग के स्कूल-बाहर बच्चों को NIOS और राज्य मुक्त विद्यालयों के माध्यम से फिर से शिक्षा से जोड़ने की रणनीति है। इसका उद्देश्य हर बच्चे को कम से कम माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर की शिक्षा और रोजगारपरक कौशल उपलब्ध कराना है।
भारत में कितने बच्चे स्कूल नहीं जाते?
नवीनतम पीएलएफएस अनुमानों के अनुसार, 14-18 वर्ष आयु वर्ग के 2 करोड़ से अधिक बच्चे इस समय स्कूल नहीं जाते। इसके अलावा, कक्षा 1 में दाखिल हर 100 बच्चों में से केवल 62 ही कक्षा 12 तक पहुँच पाते हैं।
इस पहल के पायलट चरण में कौन-से राज्य और जिले शामिल हैं?
पहले चरण में ओडिशा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और दिल्ली के कुल 10 जिलों को चुना गया है, जहाँ स्कूल-बाहर बच्चों की संख्या सर्वाधिक है। इन राज्यों के साथ 'प्रतिबद्धता ज्ञापन (एमओसी)' पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।
NIOS की भूमिका इस पहल में क्या होगी?
एनआईओएस उन बच्चों के लिए ओपन और डिस्टेंस लर्निंग (ओडीएल) का विकल्प प्रदान करेगा जो नियमित स्कूलों में वापस नहीं लौट सकते। एनआईओएस फैसिलिटेटर्स की तैनाती, ऐप-आधारित मैपिंग-मॉनिटरिंग और स्टार्टर किट वितरण इस प्रक्रिया के प्रमुख घटक हैं।
बच्चे स्कूल क्यों छोड़ देते हैं और इसे कैसे रोका जाएगा?
डीओएसईएल सचिव संजय कुमार के अनुसार, आर्थिक मजबूरियाँ, घरेलू जिम्मेदारियाँ और आजीविका से जुड़ी चुनौतियाँ स्कूल छोड़ने के मुख्य कारण हैं। इसे रोकने के लिए डेटा-आधारित पहचान, जिला-स्तरीय समन्वय और रोजगारपरक कौशल प्रशिक्षण को शिक्षा से जोड़ा जाएगा।
राष्ट्र प्रेस
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